विकास की भेंट चढ़ती नदियां: भारत सहित दुनिया भर में अवैध खनन से बिगड़ रही सेहत

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि रेत खनन को वैज्ञानिक ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया तो कई नदियों का प्राकृतिक संतुलन स्थाई रूप से बिगड़ सकता है।
कितना सही है नदियों से बेतहाशा होता खनन; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
कितना सही है नदियों से बेतहाशा होता खनन; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
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सारांश
  • भारत सहित दुनिया भर में विकास की बढ़ती रफ्तार अब नदियों के अस्तित्व पर भारी पड़ने लगी है।

  • एक नए वैश्विक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि निर्माण कार्यों के लिए रेत और बजरी का दोहन प्रकृति की पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक गति से हो रहा है, जिससे नदियों का प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है।

  • रिपोर्ट के अनुसार, हर वर्ष लगभग 5,000 करोड़ टन रेत और बजरी निकाली जा रही है, जबकि इसके बनने में लाखों वर्ष लगते हैं। भारत, जो रेत और बजरी का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, वहां हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों में अनियंत्रित व अवैध खनन के कारण नदी तल गहरा होना, तटों का कटाव, भूजल स्तर में गिरावट, जल गुणवत्ता में कमी और जैव विविधता का नुकसान जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं।

  • अध्ययन ने यह भी उजागर किया कि अधिकांश देशों के पास खनन की वास्तविक मात्रा का विश्वसनीय डेटा तक उपलब्ध नहीं है, जिससे प्रभावी नियंत्रण मुश्किल हो गया है।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल कड़े कानून पर्याप्त नहीं हैं; वैज्ञानिक निगरानी, पारदर्शी प्रबंधन, वैकल्पिक निर्माण सामग्री और नदी घाटी आधारित खनन नीति ही नदियों को बचा सकती है।

  • चेतावनी स्पष्ट है—यदि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो भविष्य में सबसे बड़ी कीमत नदियों और उन पर निर्भर करोड़ों लोगों को चुकानी पड़ेगी।

गगनचुंबी इमारतों, एक्सप्रेसवे और स्मार्ट शहरों का सपना जिस 'रेत' की नींव पर खड़ा हो रहा है, उसका बेतहाशा होता दोहन भारत सहित दुनिया भर में नदियों के वजूद के लिए खतरा बनता जा रहा है।

इस बारे में वैश्विक स्तर पर की गई एक नई रिसर्च से पता चला है कि नदियों से रेत इतनी तेजी से निकाली जा रही है कि प्रकृति उसकी भरपाई नहीं कर पा रही। सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए इस वैश्विक अध्ययन ने चेताया है कि कई नदियों में तो हर साल जितनी रेत और बजरी निकाली जा रही है, वह प्राकृतिक रूप से जमा होने वाली मात्रा से कई गुणा अधिक है।

दोहन की रफ्तार इतनी ज्यादा है कि प्रकति उस रफ्तार से दोबारा रेत बना ही नहीं पा रही।

यह अध्ययन 26 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक व्यापक समीक्षा पर आधारित है जिसमें प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कोलकाता से जुड़े शोधकर्ता प्रियांक प्रवीण पटेल भी शामिल थे। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल रिव्यूज ऑफ जियोफिजिक्स में प्रकाशित हुए हैं।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 1974 से अब तक प्रकाशित 411 वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, अनियंत्रित रेत खनन केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह नदी किनारे रहने वाले करोड़ों लोगों की सुरक्षा, आजीविका और भविष्य से जुड़ा संकट भी बन चुका है।

अवैध खनन को जन्म दे रही है साल दर साल बढ़ती मांग

आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में हर साल करीब 5,000 करोड़ टन रेत और बजरी निकाली जा रही है, जबकि इसे बनने में लाखों वर्षों का समय लगता है। देखा जाए तो यह दुनिया में सबसे अधिक खनन की जाने वाली सामग्री है, जिसके खनन की मात्रा जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल और गैस) से भी अधिक है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने भी अपनी रिपोर्ट में चेताया है कि 2060 तक निर्माण क्षेत्र में रेत की मांग 45 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है, जिससे नदियां, समुद्री तट, डेल्टा और जैव विविधता पर गंभीर संकट गहरा सकता है।

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अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के हवाले से अध्ययन में भी जानकारी दी है कि 2000 से 2024 के बीच कंक्रीट बनाने के लिए रेत और बजरी की वैश्विक मांग लगातार बढ़ी है। यह मांग जो कभी 2000 में 1,174 करोड़ टन थी, वो 2024 में बढ़कर 2803 करोड़ टन तक पहुंच गई।

मतलब कि इस दौरान मांग में 138 फीसदी से भी अधिक की वृद्धि हुई है। हालांकि स्पष्ट कर दें कि ये आंकड़े सभी स्रोतों से प्राप्त कुल रेत और बजरी की मांग को दर्शाते हैं, सिर्फ नदियों से खनन की गई रेत और बजरी की मात्रा को नहीं।

इसी तरह वैश्विक रुझानों पर नजर डालें तो चीन कंक्रीट निर्माण के लिए रेत और बजरी का दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता है। 2023 में वहां नई इमारतों, सड़कों और पुलों के निर्माण के लिए 607 करोड़ टन रेत और 810 करोड़ टन बजरी का उपयोग हुआ।

वहीं भारत इस मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर रहा। देश में कंक्रीट निर्माण के लिए हर साल 126 करोड़ टन रेत और 168 करोड़ टन बजरी की मांग रही, जिसके लिए बड़े पैमाने पर नदियों से भी रेत का दोहन किया जा रहा है।

अध्ययन में खुलासा हुआ है कि रेत के बेतहाशा दोहन से नदी का तल गहरा होने लगता है, किनारे कमजोर पड़ते हैं, भूजल का स्तर गिरता है, पानी की गुणवत्ता खराब होती है और तटीय क्षेत्रों में समुद्री खारा पानी अंदर तक पहुंचने लगता है। इसका असर पुलों, सड़कों और इमारतों के साथ-साथ कृषि, मत्स्य पालन और नदी पर निर्भर समुदायों की रोजी-रोटी पर भी पड़ता है।

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भारत में बेहद गंभीर है समस्या

भारत में इस समस्या पर प्रकाश डालते हुए उत्तर-पश्चिम भारत की हिमालयी नदियों का जिक्र किया गया है, जिनकी तलहटी वाले क्षेत्रों में बजरी का अत्यधिक दोहन गंभीर समस्या बन गया है।

इसके कारण नदियों में तलछट का प्राकृतिक प्रवाह बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नतीजतन, नदी की चौड़ाई घट रही है, तल गहरा हो रहा है, नदी का मुख्य प्रवाह स्थिर हो रहा है, तल पर मोटे पत्थरों की परत जम रही है और नदियों की प्राकृतिक भौगोलिक विविधता में तेजी से कमी आ रही है। रिसर्च के मुताबिक भारत में रेत का अधिकतर खनन प्रायद्वीपीय नदियों से होता है। मानसून खत्म होने के बाद इन नदियों का तल सूखकर दिखाई देने लगता है, जिससे वहां से रेत निकालना आसान हो जाता है।

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इसी तरह भारत की मयूराक्षी नदी पर पिछले 50 वर्षों के अध्ययन से पता चला कि बढ़ते रेत खनन ने नदी के प्राकृतिक स्वरूप को गंभीर रूप से बदल दिया है। खनन के कारण नदी की कई धाराएं खत्म हो गईं और उसका रास्ता पहले की तुलना में ज्यादा सीधा और संकरा हो गया। वहीं, जिन हिस्सों में खनन हुआ वहां नदी का तल अधिक गहरा और असंतुलित पाया गया, जिससे नदी की स्थिरता और प्राकृतिक प्रवाह पर नकारात्मक असर पड़ा है।

इसी तरह, उत्तर-पश्चिम भारत में हिमालय की तलहटी से बहने वाली गौला नदी पर हुए एक अध्ययन में भी रेत खनन के गंभीर असर सामने आए हैं। शोध के अनुसार, 1976 से 2021 के बीच 45 वर्षों में यह नदी कई धाराओं वाली, तलछट से भरपूर नदी से बदलकर संकरी और गहरी धारा में तब्दील हो गई।

इस दौरान नदी के बीच बनने वाले वनस्पति वाले रेतीले टापू कम होते गए, नदी की प्राकृतिक बनावट बिगड़ती गई और उसकी भौगोलिक विविधता में लगातार गिरावट आई है।

इसी तरह एक अन्य अध्ययन में भी पुष्टि हुई है कि सतलुज नदी में बढ़ते रेत खनन ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह, तटों की स्थिरता और तलछट के संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

इसके कारण नदी के किनारों पर कटाव बढ़ा है, बाढ़ का खतरा गहराया है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हुआ है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि सतलुज में रेत खनन को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया और लगातार निगरानी नहीं रखी गई, तो आने वाले वर्षों में नदी की प्राकृतिक संरचना और उससे जुड़े पर्यावरण पर और भी गंभीर असर पड़ सकते हैं।

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स्टडी से पता चला है कि दक्षिण भारत के कुछ इलाकों में ऐसे प्रभाव देखे गए हैं, जहां रेत खनन के कारण भूजल स्तर गिरा और पानी में लवणता बढ़ गई है। इसी तरह तेलंगाना और केरल की नदियों पर हुई निगरानी में पाया गया कि रेत खनन वाले क्षेत्रों में पानी लंबे समय तक मटमैला बना रहा और उसके पीएच स्तर में भी लगातार उतार-चढ़ाव देखा गया। इसी तरह अजय, कावेरी, में भी खनन से नदियों को पहुंचे नुकसान के उदाहरण सामने आए हैं।

सरकारों के पास पर्याप्त आंकड़े ही नहीं

रिसर्च के मुताबिक चिंता की बात यह है कि अधिकांश देशों के पास यह बुनियादी जानकारी तक नहीं है कि कहां और कितनी मात्रा में रेत का खनन हो रहा है। समीक्षा किए गए अध्ययनों में महज 27 फीसदी ने खनन की वास्तविक मात्रा का आकलन किया, जबकि 69 फीसदी अध्ययन इसके दुष्प्रभावों पर केंद्रित थे।

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ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि "जिस समस्या को मापा नहीं जाएगा, उसका समाधान भी संभव नहीं होगा।" इसलिए सरकारों को उपग्रह, ड्रोन, सोनार सर्वे और नदी सर्वेक्षण जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से खनन पर लगातार निगरानी रखनी चाहिए।

मेकांग, कोल्लीडम ने दिखाई खतरे की तस्वीर

अध्ययन में मेकांग नदी का उदाहरण देते हुए बताया गया कि वहां करीब 5 करोड़ मीट्रिक टन रेत निकाली गई, जबकि अनुमति केवल 2 करोड़ मीट्रिक टन की थी। यानी तय सीमा से 150 फीसदी अधिक खनन हुआ और कुल निकाली गई रेत का करीब 60 फीसदी अवैध था।

भारत में भी अवैध रेत खनन की तस्वीर बेहद चिंताजनक है। अध्ययन में दक्षिण भारत की कोल्लीडम नदी का जिक्र करते हुए लिखा है कि यह नदी भी अवैध रेत खनन का बड़ा केंद्र बन चुकी है। यहां कई जगहों पर खनन का वास्तविक क्षेत्र लाइसेंस में तय सीमा से 10 से 30 गुणा तक बड़ा पाया गया। कुल मिलाकर, जितनी रेत निकाली गई, वह खनन कंपनियों द्वारा बताई गई मात्रा से कई गुणा अधिक थी।

क्या सिर्फ कागजों पर हैं कानून

गौरतलब है कि भारत में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2020 में रेत खनन को लेकर एक व्यापक नीति जारी की थी। इसमें ड्रोन से निगरानी, रेत के स्रोतों की पहचान, निकाली गई रेत की भरपाई (रिप्लेनिशमेंट), पर्यावरणीय मंजूरी के बाद नियमित निगरानी, पर्यावरण ऑडिट और अवैध खनन पर रोक जैसे कई उपाय सुझाए गए थे।

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हालांकि, अध्ययन के मुताबिक कागजों पर सख्त नियम होने के बावजूद रेत खनन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया है। इसकी वजह केवल कमजोर निगरानी या कानून का ढीला पालन नहीं, बल्कि कई मामलों में राजनीतिक और स्थानीय हितों का प्रभाव भी माना जाता है।

इसका उदाहरण देते हुए अध्ययन में टाइम्स ऑफ इंडिया के हवाले से बताया गया है कि राजस्थान की बनास नदी इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां कथित रेत माफिया को राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2017 में लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद अवैध रेत खनन पूरी तरह नहीं रुक सका।

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भारत में अवैध रेत और बजरी खनन की स्थिति यह है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनगिनत बार संज्ञान लिए गए हैं और उसकी रोकथाम के लिए आदेश जारी करने पड़े हैं। सुवर्णरेखा, बालदा, खन्नौत, महानदी, खारुन, यमुना, गंगा, बावनथड़ी, महानदी, खारी, कलदिया जैसी कई नदियों में अवैध खनन के मामले सामने आए हैं, जो स्थिति की गंभीरता को उजागर करते हैं।

क्या है समाधान?

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि रेत खनन को पूरी नदी घाटी के स्तर पर प्रबंधित किया जाना चाहिए। जितनी रेत नदी प्राकृतिक रूप से दोबारा जमा कर सकती है, उसी के आधार पर खनन की सीमा तय हो। साथ ही, निर्माण कार्यों में रेत का अधिक दक्ष उपयोग, रीसायकल निर्माण सामग्री, पुनर्चक्रित कांच और अन्य वैकल्पिक सामग्रियों को बढ़ावा देकर नदियों पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सकता है।

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यह सही है कि रेत विकास की बुनियादी जरूरत है, लेकिन यदि इसे प्रकृति की क्षमता से अधिक गति से निकाला जाता रहा तो इसकी सबसे बड़ी कीमत नदियां और उन पर निर्भर करोड़ों लोग चुकाएंगे। अध्ययन स्पष्ट करता है कि सतत विकास का रास्ता केवल निर्माण बढ़ाने में नहीं, बल्कि नदियों को जीवित और संतुलित रखने में भी है।

देखा जाए तो आज नदियों से निकाली जा रही हर ट्रॉली रेत केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं ले जा रही, बल्कि उनके भविष्य का एक हिस्सा भी साथ ले जा रही है। यदि यही सिलसिला जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में बहती नदियां नहीं, बल्कि गहरे गड्ढों, कटते किनारों और बिखरते पारिस्थितिकी तंत्र की कहानी मिलेगी।

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