कृषि

यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
दुनिया एक तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी, सूखे और अनिश्चित मौसम का सामना कर रही है, तो दूसरी तरफ युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में खाद्य बाजारों में कीमतों का बढ़ना केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है, यह करोड़ों परिवारों की रसोई और खाने की थाली पर बढ़ता दबाव है। फोटो: आईस्टॉक
सौराष्ट्र के देवभूमि द्वारका जिले में बारिश न होने के कारण दो माह लेट चने की बुआई करते किसान। फोटो: राजू सजवान
भारत खाद्य तेल की घरेलू जरूरत का करीब 56 प्रतिशत आयात करता है, आत्मनिर्भरता के लिए सरसों उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।
अफ्रीकी देश जहां एक तरफ बड़ी मात्रा में अपने खेतों में कच्चा तंबाकू उगाकर उसका निर्यात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तैयार सिगरेट खरीदने पर पहले से कहीं ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं। रुझानों से पता चला है कि इस अवधि में अफ्रीका का सिगरेट आयात बिल 83.3 करोड़ डॉलर से बढ़कर 177 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया। फोटो: आईस्टॉक
जर्नल वन अर्थ में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च से भी पता चला है कि बढ़ते तापमान के चलते भारत के गेहूं उत्पादन में 6.9 फीसदी तक की गिरावट आ सकती हैं, वहीं इसकी वजह से कीमतों में 36 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि होने का अंदेशा है। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
वी आर ईटिंग द अर्थ पुस्तक के लेखक और अमेरिकी पत्रकार माइकल ग्रुनवाल्ड
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