

भारत इस समय सिर्फ भीषण गर्मी नहीं, बल्कि बदलती जलवायु के एक खतरनाक दौर का सामना कर रहा है।
उत्तर प्रदेश के बांदा में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जबकि देश के कई हिस्सों में रात का पारा भी 30 डिग्री के करीब बना हुआ है। यानी अब सूरज ढलने के बाद भी लोगों को राहत नहीं मिल रही।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई रिपोर्ट बताती है कि भारत में लू अब पहले की तुलना में ज्यादा लंबी, उमस भरी और जानलेवा हो चुकी है। बढ़ती नमी, गर्म रातें, सूखी मिट्टी और तेजी से फैलते कंक्रीट के शहर मिलकर देश को एक विशाल ‘हीट ट्रैप’ में बदल रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2024 के बीच भारत में रात के तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जबकि उमस और गर्मी के खतरनाक मेल वाले दिनों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।
इस बदलते संकट का सबसे क्रूर चेहरा झुलसाती रातें हैं। बीते दशक में भारत का रात का न्यूनतम तापमान करीब 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की रफ्तार से बढ़ा है, जिससे दिनभर के तपते जिस्म और घरों को रात में भी ठंडक नसीब नहीं हो रही।
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, 'कोर हीटवेव जोन' में लू की अवधि और आवृत्ति दोनों में सांख्यिकीय रूप से भारी इजाफा हुआ है। हवा में औसत आर्द्रता 67.1 फीसदी से बढ़कर 71.2 फीसदी होने के कारण पसीना सूखना बंद हो गया है, जिससे इंसानी शरीर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम फेल हो रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब रात में शरीर को ठंडा होने का समय नहीं मिलता, तो हीट स्ट्रेस और मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब मजदूरों, बुजुर्गों, बच्चों और झुग्गियों में रहने वाले लोगों पर पड़ रहा है। यह सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
देश एक बार फिर भीषण गर्मी की चपेट में है। उत्तर प्रदेश के बांदा में तो पारा 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। राजस्थान से लेकर दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल तक धरती तप रही है। सूरज की तपिश और लू के थपेड़ों से बचकर लोग रात का इंतजार करते हैं, लेकिन अब रातें भी राहत नहीं दे रहीं।
देश के कई हिस्सों में रात का तापमान भी 30 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है। यानी सूरज ढलने के बाद भी शरीर को ठंडक नहीं मिल रही।
एक समय था जब लोग दिनभर की कड़ी धूप के बाद रात में इस उम्मीद में चादर बिछाते थे कि सूरज डूबेगा तो ठंडी हवा के झोंकों से राहत मिलेगी। लेकिन दिन तो दिन अब रातें भी चैन छीन रही हैं। पंखे और कूलर के बावजूद लोगों की नींद टूट रही है, शरीर को पूरा आराम नहीं मिल रहा और सुबह उठने से ही थकान घेर रही है। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और सांस की तकलीफ के मरीज बढ़ रहे हैं।
अब पहले जैसी नहीं रही गर्मी
यह सिर्फ बढ़ते तापमान की कहानी नहीं है। चिंता की बात यह है कि अब भारत में गर्मी पहले से कहीं ज्यादा लंबी, उमस भरी और खतरनाक होती जा रही है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई रिपोर्ट "व्हाई इंडियाज हीटवेव्स फील मोर ब्रूटल दैन बिफोर" भारत के एक डरावने भविष्य की ओर इशारा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में गर्मी अब सिर्फ जिस्म झुलसाने वाली तपिश नहीं रही, बल्कि एक ऐसा 'दमघोंटू जाल' बनती जा रही है, जिससे बच निकलने के सारे रास्ते धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, घर के अंदर तापमान लगातार 24 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहने पर दिल, नींद और शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली पर बुरा असर पड़ता है। लेकिन भारत के करोड़ों लोग अब ऐसी ही गर्म रातों में सोने को मजबूर हैं।
जब रातें ही छीन लें दिनभर का चैन
विशेषज्ञ मानते हैं कि कई बार रात में गर्मी दिन से ज्यादा खतरनाक होती है। जब रात में तापमान कम नहीं होता, तो शरीर को खुद को ठंडा करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता। इसका असर बच्चों, बुजुर्गों, मजदूरों और बीमार लोगों पर सबसे ज्यादा पड़ता है।
भारत में स्थिति किस कदर गंभीर हो चुकी है इसकी पुष्टि रिपोर्ट में साझा आंकड़े भी करते हैं। रुझानों से पता चला है कि भारत में 2010 से 2024 के बीच रात के औसत न्यूनतम तापमान में हर दशक करीब 0.21 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 36 में से 35 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में रातें लगातार गर्म हो रही हैं। सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तराखंड कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में तो यह बढ़ोतरी कहीं ज्यादा तेज है। यही वजह है कि अब लोग सिर्फ दिन में नहीं, रात में भी “हीट स्ट्रेस” झेल रहे हैं।
सबसे ज्यादा खतरे में भारत का 'कोर हीटवेव जोन'
रिपोर्ट के मुताबिक भारत का 'कोर हीटवेव जोन' यानी सबसे प्रभावित क्षेत्र अब पहले से ज्यादा बड़ा और खतरनाक हो चुका है। इसमें राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से शामिल हैं। यहां लू की आवृत्ति और अवधि दोनों बढ़ रही हैं।
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के आंकडों के मुताबिक 1961 से अब तक इन इलाकों में लू की आवृत्ति हर दशक 0.1 दिन बढ़ी है, जबकि इसकी अवधि में प्रति दशक 0.44 दिन की बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह लू की गंभीर घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं।
सुनने में ये आंकड़े भले छोटे लगें, लेकिन मौसम विज्ञान में दशकों के पैमाने पर होने वाले ऐसे बदलाव पूरे समाज में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
इसका असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेती, बिजली की बढ़ती मांग, मजदूरों की काम करने की क्षमता और अस्पतालों पर बढ़ते दबाव तक हर चीज पर दिखाई देता है। यानी मौसम में मामूली दिखने वाला बदलाव धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी, कामकाज और अर्थव्यवस्था की बुनियाद को प्रभावित करने लगता है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, पाकिस्तान के सिंध और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों से आने वाली गर्म और उत्तर-पश्चिमी हवाएं लगातार देश के भीतर तक पहुंच रही हैं। इन हवाओं ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और मध्य भारत को भट्ठी में बदल दिया है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत के मुताबिक, "देश के ऊपर फिलहाल कोई बड़ी मौसमी प्रणाली सक्रिय नहीं है। इसी वजह से रेगिस्तानी गर्म हवाएं लगातार बह रही हैं। पिछले तीन से चार दिनों से लगातार चल रही इन हवाओं के कारण तापमान बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप लू से लेकर भीषण लू तक की स्थिति बनी हुई है।"
"जब दिन गर्म होते हैं और शाम को मानसून से पहले की कोई गतिविधि नहीं होती है, तो ये उच्च तापमान रात के तापमान में भी वृद्धि का संकेत देते हैं।“
उनके मुताबिक मौसम की मौजूदा स्थिति को मई के दौरान सामान्य मौसमी पैटर्न माना जाता है, जो ग्रीष्म ऋतु का चरम भी होता है। पश्चिमी विक्षोभ के आने से ही हमें कुछ राहत मिलेगी, जिससे हवा का पैटर्न बदल जाएगा और जरूरी राहत मिलेगी।
भारत में कहां ज्यादा है खतरा
बता दें कि कोर हीटवेव जोन (सीएचजेड) में देश के वे इलाके शामिल हैं, जहां लू और अत्यधिक गर्मी का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इसमें पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना के साथ-साथ महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, विदर्भ और मध्य महाराष्ट्र तथा आंध्र प्रदेश के तटीय इलाके शामिल हैं।
भारत में लू नई नहीं है, लेकिन अब इसका स्वरूप बदल गया है। पहले गर्मी और लू कुछ दिनों की होती थी, अब यह हफ्तों तक पीछा नहीं छोड़ती। पहले रातें राहत देती थीं, अब वे भी दम घोंटने लगी हैं। इसके पीछे कई वजहें एक साथ काम कर रही हैं।
जलवायु परिवर्तन ने धरती के औसत तापमान को बढ़ा दिया है। नतीजन अब लू पहले से ज्यादा गर्म माहौल में शुरू होती हैं, इसलिए उनका असर भी ज्यादा घातक हो रहा है। ऊपर से शहरों में बढ़ता कंक्रीट, बढ़ती आद्रता से लेकर मिट्टी से गायब होती नमी यह सभी मिलकर बढ़ती गर्मी को और घातक बना रहे यहीं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार, 2015 से 2025 तक के 11 साल दुनिया के सबसे गर्म साल रहे हैं।
2025 के आंकड़ों को देखें तो वैश्विक स्तर पर तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में करीब 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक था। भारत में भी 2025 का औसत तापमान 1991-2020 के औसत से अधिक दर्ज किया गया।
उमस ने गर्मी को बना दिया “अदृश्य खतरा”
यह सही है कि तापमान में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन उसके साथ हवा में बढ़ती नमी भी लोगों को बीमार बना रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक जब हवा में उमस ज्यादा होती है, तो पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता। ऐसे में 40 डिग्री की गर्मी भी 50 डिग्री जैसी महसूस हो सकती है।
रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में 2015 से 2019 के बीच औसत आर्द्रता 67.1 फीसदी थी, जो 2020 से 2024 के बीच बढ़कर 71.2 फीसदी हो गई। इस दौरान दिल्ली, हरियाणा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में नमी में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज हुई है।
यह चार फीसदी का उछाल सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन यह इंसानी शरीर के लिए किसी सजा से कम नहीं है। जब हवा में उमस इतनी ज्यादा हो, तो शरीर का पसीना नहीं सूखता और प्रकृति का दिया हुआ कूलिंग सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाता है।
क्या कहते हैं दिल्ली, राजस्थान के आंकड़े
आंकड़ों दर्शाते हैं कि जहां दिल्ली में इस दौरान 8 अंकों की बढ़ोतरी हुई है। वहीं चंडीगढ़ में 7.7, हरियाणा में 7.7, तेलंगाना में 6.8, उत्तर प्रदेश में 6.5, महाराष्ट्र में 6.4 और राजस्थान में 6.3 अंकों की वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट से पता चला है कि उमस और गर्मी के जानलेवा गठजोड़, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'कंपाउंड हॉट-ह्यूमिड डेज' कहा जाता है, उसमें भी पिछले दशक उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सेंटर फॉर एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के आंकड़ों के मुताबिक जहां 2015 से 2019 के बीच देश ने 14,086 ऐसे बेहद गर्म और चिपचिपे दिन देखे थे, वहीं 2020 से 2024 के बीच यह आंकड़ा बढ़कर 16,970 दिनों पर पहुंच गई।
सालाना आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 2024 ऐसा साल रहा, जब अत्यधिक गर्म और उमस भरे दिनों की संख्या सबसे ज्यादा दर्ज की गई।
उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य इस दोहरी मार को सबसे ज्यादा झेल रहे हैं। यह साबित करता है कि भीषण गर्मी का यह संकट अब केवल तटीय इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विशाल मैदानी भागों को भी अपनी चपेट में ले चुका है। इसका मतलब है कि अब भारत की गर्मी सिर्फ 'सूखी लू' नहीं रही। यह धीरे-धीरे ‘ट्रॉपिकल हीट स्ट्रेस’ में बदल रही है।
इस तबाही को बढ़ाने में हमारे आधुनिक शहरों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारत के शहर अब 'अर्बन हीट आइलैंड' यानी कंक्रीट के बड़े गर्म पिंजरों में तब्दील हो चुके हैं। दिन के समय डामर की सड़कें, कंक्रीट की ऊंची इमारतें और पेड़ों की घटती संख्या सूरज की पूरी गर्मी को सोख लेती हैं।
शहर बन गए हैं “हीट ट्रैप”
रात के समय, ये इमारतें और सड़कें उस गर्मी को धीरे-धीरे वातावरण में छोड़ती हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि भारत के कई शहर अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 2 से 10 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म बने हुए हैं। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है।
इसका मतलब यह है कि गरीब शहरी बस्तियों में रहने वाला वह व्यक्ति, जो दिनभर बाहर काम करता है, उसे रात में भी राहत नहीं मिलती। उसका शरीर अगले दिन की गर्मी शुरू होने से पहले उसके लिए तैयार ही नहीं हो पाता। यही वजह है कि दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, नागपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों में रातें सबसे ज्यादा बेचैन करने वाली बनती जा रही हैं।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक आरती खोसला का इस बारे में कहना है, “भारत में लू अब सिर्फ तापमान की कहानी नहीं रही। बढ़ती उमस, गर्म रातें, तेजी से फैलते शहर और जलवायु परिवर्तन मिलकर इसे ज्यादा लंबा, खतरनाक और थका देने वाला बना रहे हैं।"
रिपोर्ट यह भी बताती है कि सूखी मिट्टी और कम बारिश भी लू को और तीखा बना रहे हैं। जब मिट्टी में नमी नहीं होती तो सूरज की ऊर्जा जमीन को सुखाने के बजाय हवा को और गर्म करने में लगती है। इससे गर्मी और ज्यादा बढ़ जाती है। यह स्थिति एक ऐसा चक्र बना देती है, जो लू को और तीव्र तथा लंबे समय तक कायम रहने में मदद करता है।
भारत में किए हालिया शोध से पता चला है कि लू आने से कई हफ्ते पहले मिट्टी में नमी की कमी, खासकर उत्तर-मध्य भारत में, भीषण गर्मी की तीव्रता को कहीं ज्यादा बढ़ा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, लू शुरू होने से पहले यदि जमीन सूखी हो, तो तापमान तेजी से बढ़ने की आशंका अधिक रहती है।
उत्तरी भारत में मिट्टी की नमी सर्दियों और वसंत के दौरान पश्चिम से आने वाली नमी पर निर्भर करती है। लेकिन जब वातावरण में बदलावों के कारण पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ जाते हैं, तो अरब सागर से आने वाली नमी भी कम हो जाती है। इससे मिट्टी और ज्यादा सूख जाती है, जो लू के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करती है। यानी सूखी जमीन और कमजोर नमी मिलकर लंबे और ज्यादा खतरनाक लू के दौर को बढ़ावा देते हैं।
यह सिर्फ मौसम नहीं, आने वाले भविष्य की चेतावनी है
देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन अब एक ऐसे छिपे दबाव की तरह काम कर रहा है, जो बदलते मौसम, लंबे सूखे, घटती हरियाली और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के असर को और ज्यादा खतरनाक बना रहा है।
इस पूरी वैज्ञानिक बहस और आंकड़ों के मायाजाल के बीच जो सबसे जरूरी चेहरा है, वह एक आम इंसान का है। यह बदलती जलवायु उस दिहाड़ी मजदूर के लिए एक सजा बन चुकी है जो दोपहर की जलती धूप में डामर की सड़क कूटने को मजबूर है।
यह उस रेहड़ी-पटरी वाले की त्रासदी है जिसकी दिनभर की पूंजी, यानी उसकी सब्जियां, चंद घंटों में सूखकर बर्बाद हो जाती हैं। यह उस झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवार की बेबसी है जिसके टिन की छत वाले कमरों में रात को हवा तक नहीं गुजरती और उनके पास इस तपिश से बचने के लिए एक अदद पंखा तक नसीब नहीं है।
आने वाली चुनौती सिर्फ पहले से ज्यादा गर्म होती गर्मियों से बचने की नहीं है, बल्कि ऐसे भविष्य के साथ खुद को ढालने की है, जहां भीषण गर्मी पहले के मुकाबले अधिक बार, ज्यादा उमस भरी और कहीं अधिक बेरहम होगी।