

धरती पर जीवन की विविधता हमारी कल्पना से कहीं अधिक है। हर साल वैज्ञानिक 16,000 से अधिक नई प्रजातियों की खोज कर रहे हैं, जो जीवन के अनकहे रंगों को उजागर करती हैं।
यह खोज न केवल ज्ञान बढ़ाती है, बल्कि संरक्षण और चिकित्सा के लिए भी महत्वपूर्ण है। डीएनए तकनीक से भविष्य में और भी छिपी प्रजातियां सामने आ सकती हैं।
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि 2015 से 2020 के बीच, हर साल औसतन 16,000 से अधिक नई प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें 10,000 से ज्यादा जानवर (ज्यादातर कीट और अन्य आर्थ्रोपॉड), 2,500 पौधे और 2,000 फफूंद शामिल हैं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भविष्य में मछलियों की 1,15,000 और उभयचरों की 41,000 प्रजातियां सामने आ सकती हैं, जबकि अभी तक मछलियों की महज 42,000, जबकि उभयचरों की 9,000 प्रजातियों की ही खोज हुई है।
उनका यह भी अनुमान है कि पौधों की कुल प्रजातियां पांच लाख से भी अधिक हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नई प्रजातियों की खोज की रफ्तार आगे भी बढ़ती रहेगी। उदाहरण के लिए, अभी तक वैज्ञानिक करीब 11 लाख कीट प्रजातियों की पहचान कर पाए हैं, जबकि कई वैज्ञानिक मानते हैं कि इनकी असल संख्या करीब 60 लाख हो सकती है।
धरती पर जीवन हमारी कल्पना से कहीं अधिक गूढ़ और रहस्यमय है। सच यह है कि जितना हम जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा जीवन अभी भी छिपा हुआ है। करीब 300 साल पहले, स्वीडन के महान प्रकृतिवादी कार्ल लिनियस ने हर जीव को पहचानने और उसे नाम देने का साहसिक प्रयास शुरू किया था। आज उन्हें आधुनिक टैक्सोनॉमी का जनक माना जाता है। अपने जीवनकाल में उन्होंने पौधों और जानवरों की 10,000 से अधिक प्रजातियों का वर्णन किया।
आज, वैज्ञानिक उसी खोज को नई गति दे रहे हैं। हर साल हजारों नई प्रजातियां सामने आ रही हैं, और जीवन के अनकहे रंग धीरे-धीरे उजागर हो रहे हैं।
नई खोजें, नई उम्मीदें
इस कड़ी में यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि वैज्ञानिक हर साल औसतन 16,000 से अधिक नई प्रजातियों की खोज कर रहे हैं। यह अब तक की सबसे तेज रफ्तार है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि पौधों, फफूंद (फंगी), मकड़ियों, मछलियों और उभयचरों जैसे कई जीव समूहों में जैव-विविधता हमारी सोच से कहीं अधिक समृद्ध है। इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर जॉन वाइन्स का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “कुछ वैज्ञानिक मानते थे कि नई प्रजातियों की खोज धीमी पड़ गई है और शायद अब सामने लाने के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं है। लेकिन हमारे शोध के नतीजे इसके बिलकुल उलट हैं, आज हम पहले से कहीं तेजी से नई प्रजातियां खोज रहे हैं और जीवन की विविधता से जुड़े रहस्य उजागर कर रहे हैं।
हर साल सामने आ रही हजारों नई प्रजातियां
अपने अध्ययन में वैज्ञानिकों ने करीब 20 लाख ज्ञात प्रजातियों का विश्लेषण किया है। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि 2015 से 2020 के बीच, हर साल औसतन 16,000 से अधिक नई प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें 10,000 से ज्यादा जानवर (ज्यादातर कीट और अन्य आर्थ्रोपॉड), 2,500 पौधे और 2,000 फफूंद शामिल हैं।
अच्छी खबर यह है कि नई प्रजातियों की खोज की रफ्तार, विलुप्त होने की रफ्तार से कहीं ज्यादा है। अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के मुताबिक हर साल करीब 10 प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, जबकि हजारों नई सामने आ रही हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार ये हजारों नई प्रजातियां सिर्फ सूक्ष्मजीव नहीं हैं, बल्कि इनमें कीट, पौधे, फफूंद और सैकड़ों नए कशेरुकी जीवों भी शामिल हैं।
अभी तो शुरू हुई है कहानी
शोधकर्ताओं ने पाया है कि वैज्ञानिक हर साल अब तक के किसी भी समय की तुलना में अधिक प्रजातियों का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने यह भी अध्ययन किया कि नई प्रजातियां समय के साथ कितनी तेजी से सामने आ रही हैं, ताकि भविष्य में कितनी प्रजातियां खोजी जाएंगी इसका अनुमान लगाया जा सके।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भविष्य में मछलियों की 1,15,000 और उभयचरों की 41,000 प्रजातियां सामने आ सकती हैं, जबकि अभी तक मछलियों की महज 42,000, जबकि उभयचरों की 9,000 प्रजातियों की ही खोज हुई है। उनका यह भी अनुमान है कि पौधों की कुल प्रजातियां पांच लाख से भी अधिक हो सकती हैं।
वाइन्स का कहना है, “अगर कोई एलियन हमसे पूछे कि धरती पर कितनी प्रजातियां हैं, तो हमारे पास इसका पक्का जवाब नहीं होगा।“ उनके मुताबिक अभी हम करीब 25 लाख प्रजातियों को जानते हैं, लेकिन असल संख्या करोड़ों, शायद अरबों में भी हो सकती है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नई प्रजातियों की खोज की रफ्तार आगे भी बढ़ती रहेगी। उदाहरण के लिए, अभी तक वैज्ञानिक करीब 11 लाख कीट प्रजातियों की पहचान कर पाए हैं, जबकि कई वैज्ञानिक मानते हैं कि इनकी असल संख्या करीब 60 लाख हो सकती है। अपने एक पुराने शोध में वाइन्स ने तो यह तक कहा था कि कीट प्रजातियों की कुल संख्या दो करोड़ के आसपास भी हो सकती है।
डीएनए तकनीक से खुलेंगे नए राज
फिलहाल ज्यादातर नई प्रजातियां बाहरी बनावट के आधार पर पहचानी जाती हैं। लेकिन जैसे-जैसे डीएनए और आणविक तकनीक बेहतर होंगी, वैसे-वैसे छिपी हुई (क्रिप्टिक) प्रजातियां भी सामने आएंगी, ऐसे जीव जो दिखने में एक जैसे होते हैं, लेकिन आनुवंशिक रूप से अलग होते हैं।
इससे खासकर बैक्टीरिया और फफूंद की दुनिया में बड़ी खोजें होने की उम्मीद है।
मानवता के लिए क्यों जरूरी है यह खोज?
नई प्रजातियों की खोज सिर्फ ज्ञान बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वाइन्स कहते हैं, “किसी प्रजाति को बचाने के लिए पहले उसका वैज्ञानिक रूप से दर्ज होना जरूरी है। संरक्षण की पहली सीढ़ी ही पहचान है।” इसके अलावा, कई नई प्रजातियां दवाओं और तकनीक के लिए खजाना साबित हो सकती हैं।
वजन घटाने की लोकप्रिय दवाओं में इस्तेमाल होने वाला जीएलपी-1 हार्मोन गिला मॉन्स्टर नामक छिपकली से प्रेरित है। इसी तरह मकड़ियों और सांपों का जहर, कई पौधे और फफूंद- दर्द, कैंसर और अन्य बीमारियों के इलाज में काम आ सकते हैं।
इसी तरह कुछ जीवों की खास क्षमताएं इंसानी तकनीक को भी प्रेरित करती हैं, उदाहरण के लिए गेको छिपकली के “सुपर-चिपकने” वाले पैर, जिनसे दीवारों पर चढ़ने वाले नए पदार्थ विकसित किए जा रहे हैं।
शोधकर्ता अब यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि नई प्रजातियां सबसे ज्यादा किन इलाकों में मिलती हैं, ताकि अनदेखी जैव-विविधता के ‘हॉटस्पॉट’ पहचाने जा सकें। वे यह भी देख रहे हैं कि खोज करने वाले वैज्ञानिकों की पृष्ठभूमि कैसे बदल रही है, क्या अब स्थानीय वैज्ञानिक अपने देशों की प्रजातियां ज्यादा खोज रहे हैं?
वाइन्स कहते हैं, "लिनियस की खोज यात्रा शुरू हुए 300 साल हो गए हैं, लेकिन आज ज्ञात सभी प्रजातियों में से 15 फीसदी महज पिछले दो दशकों में खोजी गई हैं। अभी बहुत कुछ अनजान है, और हर नई खोज हमें धरती की अद्भुत जैव-विविधता को समझने और बचाने के और करीब ले जाती है।”
संदेश साफ है धरती पर जीवन की कहानी अभी अधूरी है। नई प्रजातियों की खोज सिर्फ अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत है, क्योंकि जो जाना जाएगा, वही बचाया जा सकेगा।