वैश्विक वन्यजीव आबादी में 73% गिरावट व सामाजिक संबंधों के टूटने से बढ़ता विलुप्ति का खतरा

अध्ययन के मुताबिक, ढीले सामाजिक संबंध रखने वाली प्रजातियां घटती आबादी के कारण तेजी से विलुप्ति के गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं
विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार वैश्विक वन्यजीव आबादी में भारी गिरावट से कई सामान्य प्रजातियां भी खतरे में हैं।
विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार वैश्विक वन्यजीव आबादी में भारी गिरावट से कई सामान्य प्रजातियां भी खतरे में हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • कोलोराडो विश्वविद्यालय के शोध में पाया गया कि ढीले सामाजिक संबंध वाली प्रजातियां अधिक विलुप्ति के खतरे में हैं।

  • एली प्रभाव बताता है कि बड़ी आबादी में जानवरों की जीवित रहने और प्रजनन की संभावना बढ़ जाती है।

  • अत्यधिक सामाजिक प्रजातियां सदस्य खोने पर नए समूह बनाकर अपने सामाजिक ढांचे को फिर से मजबूत कर लेती हैं।

  • ढीले सामाजिक जानवर नए साथी खोजने में सक्रिय नहीं होते, जिससे आबादी घटने पर सामाजिक लाभ कम हो जाते हैं।

  • विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार वैश्विक वन्यजीव आबादी में भारी गिरावट से कई सामान्य प्रजातियां भी खतरे में हैं।

इस बात की कल्पना की जाए कि एक बड़ा एस्टेरॉयड (क्षुद्रग्रह) पृथ्वी से टकरा जाए और अधिकांश मानव आबादी नष्ट हो जाए। अगर कुछ लोग बच भी जाएं, तो भी मानव समाज को भारी संकट का सामना करना पड़ेगा। इसका कारण केवल संख्या की कमी नहीं होगा, बल्कि सामाजिक नेटवर्क का टूट जाना भी होगा।

इसी तरह की स्थिति जानवरों की दुनिया में भी देखी जाती है। कई जानवरों के लिए सामाजिक संबंध बहुत जरूरी होते हैं। वे एक-दूसरे की मदद से भोजन ढूंढते हैं, शिकारियों से बचते हैं और अपने बच्चों की परवरिश करते हैं।

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हाल ही में कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक नया अध्ययन किया है। यह अध्ययन ट्रेंड्स इन इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस शोध ने एक पुरानी धारणा को चुनौती दी है।

एली प्रभाव क्या है?

करीब सौ साल पहले वैज्ञानिक वार्डर क्लाइड एली ने बताया था कि जानवर बड़े समूह में बेहतर जीवन जीते हैं। इस विचार को “एली प्रभाव” कहा जाता है। एली प्रभाव का मतलब है कि जब किसी प्रजाति की संख्या अधिक होती है, तो उसके जीवों की जीवित रहने और प्रजनन की संभावना बढ़ जाती है।

उदाहरण के लिए बड़े समूह में शिकारियों को जल्दी देखा जा सकता है। भोजन खोजने में मदद मिलती है। बच्चों की देखभाल में सहयोग मिलता है। इसलिए पहले वैज्ञानिक मानते थे कि जो जानवर बहुत सामाजिक होते हैं, उन्हें संख्या कम होने पर सबसे ज्यादा खतरा होता है।

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अत्यधिक सामाजिक प्रजातियां

कुछ जानवर स्थायी समूह में रहते हैं। जैसे भेड़िये, जंगली कुत्ते और मीर्कैट। ये जानवर हमेशा अपने समूह के साथ रहते हैं। इन प्रजातियों में अगर कुछ सदस्य मर भी जाएं, तो बाकी सदस्य नए साथी खोज लेते हैं। वे नए समूह बना लेते हैं। इस तरह उनका समूह फिर से मजबूत हो जाता है।

यानी इन प्रजातियों में एक तरह की “सुरक्षा व्यवस्था” होती है। वे अपने सामाजिक ढांचे को फिर से बना सकते हैं। इसलिए आबादी घटने पर भी वे जल्दी संभल जाते हैं।

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ढीले सामाजिक संबंध वाली प्रजातियां

अब शोध से पता चला है कि असली खतरा उन प्रजातियों को है जो “ढीले सामाजिक संबंध” बनाती हैं। ऐसे जानवर स्थायी समूह में नहीं रहते। वे कभी-कभी मिलते हैं, साथ भोजन खोजते हैं या साथ बैठते हैं, लेकिन हमेशा एक साथ नहीं रहते।

उदाहरण के रूप में हिरण, गिलहरी, चिड़िया (जैसे चिकाडी) तथा कई कीट प्रजातियां। ये जानवर दोस्त बनाते हैं, लेकिन वे नए दोस्त खोजने के लिए खास प्रयास नहीं करते।

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आबादी घटने का असर

जब इन ढीले सामाजिक जानवरों की संख्या कम होती है, तो उनकी मुलाकातें भी कम हो जाती हैं।

इसका असर इस तरह होता है कि -

  • उन्हें कम जानकारी मिलती है कि भोजन कहां है।

  • शिकारियों के बारे में चेतावनी कम मिलती है।

  • सहयोग कम हो जाता है।

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जब सहयोग कम होता है, तो जीवित रहने की संभावना भी कम हो जाती है। इससे और अधिक जानवर मरते हैं। इस तरह एक “नकारात्मक चक्र” शुरू हो जाता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जब हम किसी आबादी से कुछ जीवों को हटाते हैं, तो हम केवल उनकी संख्या नहीं घटाते, बल्कि उनके द्वारा दिए जाने वाले सामाजिक लाभ भी खत्म कर देते हैं।

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आज के समय में महत्व

विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार पिछले 50 वर्षों में दुनिया की वन्यजीव आबादी लगभग 73 फीसदी तक घट चुकी है। इस गिरावट के कारण जलवायु परिवर्तन, जंगलों के काटे जाने, प्रदूषण, अधिक शिकार आदि शामिल हैं। कई वैज्ञानिक इस समय को “छठा सामूहिक विलुप्ति काल” भी कहते हैं।

अगर ढीले सामाजिक संबंध वाली प्रजातियां ज्यादा संवेदनशील हैं, तो इसका मतलब है कि बहुत सी सामान्य प्रजातियां भी विलुप्ति के खतरे में हो सकती हैं।

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क्या है नया नजरिया?

इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हमें केवल अत्यधिक सामाजिक जानवरों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हमें उन सामान्य और साधारण दिखने वाले जानवरों को भी समझना होगा, जो रोजमर्रा की छोटी-छोटी सामाजिक क्रियाओं पर निर्भर हैं।

पेड़ों पर बैठी चिड़ियों का आपस में बात करना, हिरणों का साथ चरना या गिलहरियों का एक-दूसरे को देखना ये सब छोटी बातें लग सकती हैं। लेकिन जब इन छोटी-छोटी सामाजिक क्रियाओं को जोड़कर देखा जाता है, तो वे पूरी आबादी के भविष्य को तय कर सकती हैं।

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यह शोध हमें सिखाता है कि सामाजिक संबंध केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि जानवरों के लिए भी जीवन का आधार हैं। अगर किसी प्रजाति की संख्या कम हो जाती है, तो केवल संख्या का कम होना ही समस्या नहीं है। असली समस्या सामाजिक नेटवर्क का टूटना है।

इसलिए वन्यजीव संरक्षण के लिए हमें यह समझना होगा कि कौन-सी प्रजातियां सामाजिक संपर्क पर ज्यादा निर्भर हैं। यदि हम समय रहते सही कदम उठाएं, तो हम कई प्रजातियों को विलुप्त होने से बचा सकते हैं। प्रकृति में हर छोटी मुलाकात और हर छोटा संबंध महत्वपूर्ण है। यही संबंध जीवन को आगे बढ़ाते हैं।

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