

वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा: केंचुए माइक्रोप्लास्टिक खाते हैं, लेकिन ये कण शरीर के ऊतकों में प्रवेश नहीं करते और बाहर निकल जाते हैं।
नए शोध के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक केवल केंचुओं की आंतों तक सीमित रहते हैं और शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं पहुंचते।
कनाडाई वैज्ञानिकों ने पाया कि केंचुए माइक्रोप्लास्टिक को तेजी से बाहर निकाल देते हैं, जिससे शरीर में कोई स्थायी जमा नहीं होता।
उन्नत एक्स-रे तकनीक से पता चला कि माइक्रोप्लास्टिक केंचुओं के शरीर के अंदर ऊतकों में नहीं फैलते, केवल पाचन तंत्र तक रहते हैं।
अध्ययन में स्पष्ट हुआ कि माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण केंचुओं के शरीर में स्थायी रूप से नहीं रहता, बल्कि जल्दी पाचन प्रक्रिया से बाहर निकलता है।
आज पूरी दुनिया में हर साल लगभग चार करोड़ मीट्रिक टन सूक्ष्म प्लास्टिक (माइक्रोप्लास्टिक) पर्यावरण में फैल रहा है। ये छोटे-छोटे प्लास्टिक कण बड़े प्लास्टिक सामानों के टूटने से या कपड़े, पेंट और कॉस्मेटिक्स जैसे उत्पादों से निकलते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि आसानी से मिट्टी, पानी और हवा में मिल जाते हैं और जीवों के शरीर में भी पहुंच सकते हैं।
वैज्ञानिक अभी तक पूरी तरह यह नहीं समझ पाए हैं कि ये कण शरीर के अंदर जाकर केवल पेट तक सीमित रहते हैं या फिर शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंचकर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
केंचुओं पर किया गया अध्ययन
इस सवाल को समझने के लिए कनाडा की एक टीम ने केंचुओं पर अध्ययन किया। केंचुए मिट्टी को उपजाऊ बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए इन्हें पर्यावरण में होने वाले बदलावों का अच्छा संकेतक माना जाता है।
यह शोध ग्वेल्फ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। उन्होंने केंचुओं को ऐसी मिट्टी में रखा जिसमें सामान्य से बहुत अधिक मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद थे। ये प्लास्टिक पॉलीइथिलीन से बने थे, जो दुनिया में सबसे आम प्लास्टिक है। इन कणों का आकार केवल पांच से 20 माइक्रोन था, जो मानव लाल रक्त कोशिका से भी छोटा होता है।
केंचुओं के शरीर में क्या हुआ
शुरुआत में केंचुओं ने मिट्टी के साथ इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को भी खा लिया। लगभग दो हफ्तों में उनके शरीर में प्लास्टिक की मात्रा एक स्थिर स्तर पर पहुंच गई। लेकिन जब इन केंचुओं को साफ मिट्टी में रखा गया, तो उन्होंने लगभग एक दिन के अंदर अपने शरीर से अधिकतर प्लास्टिक बाहर निकाल दिया।
इससे वैज्ञानिकों को यह संकेत मिला कि ये प्लास्टिक केंचुओं के शरीर में जमा नहीं होते, बल्कि उनके पाचन तंत्र से होकर बाहर निकल जाते हैं।
उन्नत तकनीक से हुआ खुलासा
यह समझने के लिए कि प्लास्टिक शरीर के अंदर कहां है, वैज्ञानिकों ने एक्स-रे इमेजिंग तकनीक का उपयोग किया। यह सुविधा कैनेडियन लाइट सोर्स में उपलब्ध है, जो सस्केचवान विश्वविद्यालय के परिसर में स्थित एक अत्याधुनिक वैज्ञानिक केंद्र है।
शोधकर्ताओं ने माइक्रोप्लास्टिक कणों पर एक विशेष पदार्थ (बेरियम) की परत चढ़ाई, जिससे ये एक्स-रे में चमकदार सफेद बिंदुओं के रूप में दिखाई दिए। इस तकनीक की मदद से लगभग 2500 कणों की स्थिति को देखा गया।
स्कैन से साफ पता चला कि सभी माइक्रोप्लास्टिक केवल केंचुओं की आंतों (पेट) में ही रहे और शरीर के अन्य ऊतकों में नहीं पहुंचे। इसका मतलब यह है कि ये कण शरीर में प्रवेश करके भी वहीं तक सीमित रहे और धीरे-धीरे बाहर निकल गए।
शोध के प्रमुख लेखक निकोलस लेटविन ने बताया कि यह केंचुओं के लिए एक अच्छी खबर है, क्योंकि अगर प्लास्टिक शरीर में लंबे समय तक रुकता, तो यह उनके लिए नुकसानदायक हो सकता था। यह शोध वैज्ञानिक पत्रिका एनवायर्नमेंटल टॉक्सिकोलॉजी एंड केमिस्ट्री में प्रकाशित किया गया है।
मानव स्वास्थ्य पर सवाल
शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि यह अध्ययन केवल एक संकेत देता है, लेकिन इससे सीधे निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इंसानों पर भी यही लागू होगा। मनुष्यों का शरीर और पाचन तंत्र केंचुओं से बहुत अलग होता है।
फिर भी वैज्ञानिक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या हमारे शरीर भी माइक्रोप्लास्टिक को बाहर निकाल सकते हैं या कुछ कण शरीर में जमा हो सकते हैं। यह एक महत्वपूर्ण शोध क्षेत्र बनता जा रहा है।
आगे की जरूरत
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी और शोध की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि माइक्रोप्लास्टिक अलग-अलग जीवों और इंसानों पर क्या असर डालते हैं। इसके आधार पर भविष्य में पर्यावरण से जुड़े नियम और नीतियां बनाई जा सकती हैं।
इस अध्ययन ने एक नई तकनीक और नया नजरिया दिया है, जिससे अब सूक्ष्म प्लास्टिक के व्यवहार को जीवित शरीरों के अंदर और बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।