शहरों में बच्चों के लिए सुरक्षित स्थानों की कमी: डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ की रिपोर्ट

दुनिया की महज 44 फीसदी शहरी आबादी ही खुले सार्वजनिक स्थान के पास रह रही है। गरीब देशों में तो यह आंकड़ा महज 30 फीसदी ही है, जहां लाखों बच्चों के पास खेलने और सांस लेने की सुरक्षित जगह नहीं है।
प्रदूषण, तेज ट्रैफिक, भीड़ और जलवायु से जुड़ी आपदाएं बच्चों की आजादी और विकास को लगातार सीमित कर रही हैं। फोटो: आईस्टॉक
प्रदूषण, तेज ट्रैफिक, भीड़ और जलवायु से जुड़ी आपदाएं बच्चों की आजादी और विकास को लगातार सीमित कर रही हैं। फोटो: आईस्टॉक
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समय के साथ दुनिया में तेजी से फैलते शहर बच्चों के लिए सिकुड़ते जा रहे हैं। ऊंची इमारतों के बीच बच्चों की दुनिया लगातार छोटी होती जा रही है। हालात यह हैं कि कंक्रीट के जंगल में खेलने, दौड़ने और खुलकर सांस लेने की जगहें लगातार शहरी नक्शों से गायब हो रही हैं।

इसी चिंता के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनिसेफ और संयुक्त राष्ट्र पर्यावास एजेंसी ने एक नई वैश्विक गाइड जारी की है, जो शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाने की जरूरत पर जोर देती है। इस गाइड में सरकारों और नेताओं से अपील की गई है कि वे शहरी विकास से जुड़ी योजनाएं बनाते समय बच्चों को केंद्र में रखें, क्योंकि सार्वजनिक स्थान बच्चों के स्वास्थ्य, विकास और बेहतर भविष्य के लिए बेहद जरूरी हैं।

गाइड बताती है कि अच्छी तरह डिजाइन किए गए पार्क, सड़कें और खुले मैदान बच्चों को सुरक्षित तरीके से चलने, खेलने, सीखने और प्रकृति से जुड़ने का मौका देते हैं। साथ ही ये जगहें शहरों को ज्यादा समावेशी, सुरक्षित और जलवायु-अनुकूल भी बनाती हैं।

बढ़ते शहर, सिमटता बचपन

वैश्विक स्तर पर महज 44 फीसदी शहरी आबादी ही किसी खुले सार्वजनिक स्थान के पास रहती है। कम और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति कहीं ज्यादा खराब है, जहां यह आंकड़ा 30 फीसदी ही दर्ज किया गया है। यानी लाखों बच्चे ऐसे शहरों में रह रहे हैं, जहां उनके पास खेलने या खुलकर सांस लेने के लिए भी पर्याप्त सुरक्षित जगह नहीं है।

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प्रदूषण, तेज ट्रैफिक, भीड़ और जलवायु से जुड़ी आपदाएं बच्चों की आजादी और विकास को लगातार सीमित कर रही हैं। फोटो: आईस्टॉक

प्रदूषण, तेज ट्रैफिक, भीड़ और जलवायु से जुड़ी आपदाएं बच्चों की आजादी और विकास को लगातार सीमित कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ अच्छी तरह से बनाई गई सार्वजनिक जगहें बच्चों को सुरक्षित तरीके से चलने, खेलने, सीखने और प्रकृति से जुड़ने का मौका देती हैं।

डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य निर्धारक, संवर्धन और रोकथाम विभाग के निदेशक डॉक्टर एटियेन क्रूग का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “सुरक्षित और समावेशी सार्वजनिक स्थान तक पहुंच बच्चों के स्वास्थ्य, विकास, सीखने और सामाजिक रिश्तों से सीधे जुड़ी है। यह बच्चों का अधिकार है।“

बच्चों के लिए शहर बनाने की राह

गाइड टू क्रिएटिंग अर्बन पब्लिक स्पेसेज फॉर चिल्ड्रन’ सरकारों, शहरी योजनाकारों और साझेदारों को ऐसे सार्वजनिक स्थान बनाने में मदद करने के लिए तैयार की गई है, जो बच्चों के अनुकूल हों। यह वैश्विक शोध, विशेषज्ञों की राय, बच्चों से हुई बातचीत और अलग-अलग देशों के शहरी अनुभवों पर आधारित है।

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डब्ल्यूएचओ की तकनीकी प्रमुख (अर्बन हेल्थ) डॉक्टर नाथाली रोबेल का कहना है, “यह गाइड दिखाती है कि बच्चों को केंद्र में रखकर बनाए गए शहर न सिर्फ खेलने के अधिकार को पूरा करते हैं, बल्कि 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित और सुलभ सार्वजनिक स्थानों के लक्ष्य को भी तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं।“

यह गाइड ‘स्पेसेस’ नाम के एक व्यावहारिक ढांचे पर आधारित है, जिसमें सुरक्षा, खेल-कूद, पहुंच, बाल स्वास्थ्य, समानता और प्रकृति की सुरक्षा पर जोर दिया गया है।

इस गाइड में शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाने के लिए ठोस और व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि ट्रैफिक को धीमा किया जाए, पैदल चलने के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए जाएं और स्कूलों व पार्कों तक बच्चों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किए जाएं। सड़कों, आंगनों, मोहल्लों और सार्वजनिक इमारतों सहित हर तरह की जगहों में खेलने के मौके जोड़े जाएं।

गाइड सबसे ज्यादा जरूरत वाले इलाकों जैसे झुग्गी बस्तियों, घनी आबादी और कम आय वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देने पर जोर देती है।

साथ ही साफ हवा, छाया, ठंडक, सुरक्षित सामग्री और बेहतर कचरा प्रबंधन जैसे पर्यावरण और स्वास्थ्य मानकों को पूरा करने की भी बात इसमें कही गई है। समानता और समावेशन बढ़ाने के लिए सार्वभौमिक डिजाइन और समुदाय की भागीदारी को जरूरी बताया गया है।

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प्रदूषण, तेज ट्रैफिक, भीड़ और जलवायु से जुड़ी आपदाएं बच्चों की आजादी और विकास को लगातार सीमित कर रही हैं। फोटो: आईस्टॉक

इसके अलावा हरे भरे क्षेत्रों और जल संरचनाओं का विस्तार कर शहरों को जलवायु बदलाव और आपदाओं के प्रति ज्यादा मजबूत बनाने की भी सिफारिश की गई है।

शहरी विकास की दौड़ में पीछे छूटते बच्चे

आंकड़े बताते हैं कि आज दुनिया की 55 फीसदी से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है और 2050 तक यह आंकड़ा 68 फीसदी तक पहुंच सकता है। अनुमान है कि इस दौरान सबसे तेज शहरीकरण विकासशील देशों में होगा। यानी आने वाले वर्षों में ये शहर तय करेंगे कि करोड़ों बच्चों का बचपन कैसा होगा।

यह सिर्फ एक चुनौती नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मौका भी है कि हम शहरों को इस तरह गढ़ें, जहां बच्चों का स्वास्थ्य सुरक्षित रहे, उन्हें खेलने और खुलकर जीने की जगह मिले और उनका भविष्य मजबूत बन सके।

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गाइड साफ तौर पर बताती है कि शहरों का भविष्य सिर्फ इमारतों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि बच्चों की मुस्कान से तय होगा। अगर शहरी योजनाएं बच्चों को केंद्र में रखकर बनाई जाएंगी, तो शहर ज्यादा सुरक्षित, स्वस्थ और पर्यावरण-अनुकूल बनेंगे। बच्चों के बिना शहर अधूरे हैं।

ऐसे में आज लिए गए फैसले ही तय करेंगे कि आने वाला कल बच्चों के लिए सचमुच सुरक्षित और रहने लायक होगा या नहीं।

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