पेड़ों की अनदेखी कीमत: भारत में हर साल 235 लाख करोड़ की पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान कर रहे हैं जंगल

भारत में हर साल जंगल करीब 70 करोड़ टन सीओ₂ को सोख लेते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया का आर्थिक मूल्य करीब 6.5 लाख करोड़ रुपए आंका गया है।
पेड़ों की अनदेखी कीमत: भारत में हर साल 235 लाख करोड़ की पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान कर रहे हैं जंगल
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सारांश
  • भारत के जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि देश की “अदृश्य अर्थव्यवस्था” की रीढ़ हैं। एक नए अध्ययन के अनुसार, ये वन हर साल लगभग 2.5 लाख करोड़ डॉलर (करीब 235 लाख करोड़ रुपये) की पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करते हैं, ऐसी संपदा जो बाजार में नहीं दिखती, लेकिन जीवन के हर पहलू को सहारा देती है।

  • जंगल हर साल करीब 70 करोड़ टन सीओ₂ सोखकर जलवायु संकट से रक्षा करते हैं, जिसका आर्थिक मूल्य लगभग 6.5 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। साथ ही, ये जल चक्र को संतुलित करते हैं, मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखते हैं, बाढ़-भूस्खलन से बचाते हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं।

  • भारत में करीब 27.5 करोड़ लोग जंगलों पर निर्भर हैं, जबकि 10 करोड़ से अधिक लोग सीधे वन-आधारित कामों से जुड़े हैं। नॉन-टिम्बर फॉरेस्ट प्रोडक्ट्स अकेले 1.75 लाख करोड़ रुपये की आय देते हैं, जो ग्रामीण भारत की जीवनरेखा है। देश के कुल भू-भाग का लगभग 21.8 फीसदी हिस्सा जंगलों से ढका है, जो केवल पर्यावरण नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, कृषि और जीवन सुरक्षा का “प्राकृतिक इंश्योरेंस सिस्टम” है।

  • अध्ययन का साफ संदेश है, जंगलों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राकृतिक पूंजी के रूप में देखना होगा। इन्हें न बचाया गया तो जल संकट, मिट्टी का क्षरण और जलवायु आपदाएं भविष्य को गहरे खतरे में डाल सकती हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि जंगल सिर्फ लकड़ी और हरियाली ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के अदृश्य स्तंभ भी हैं?

इस बारे में भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि भारत में जंगल हर साल 2.5 लाख करोड़ डॉलर यानी करीब 235 लाख करोड़ रुपए की पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। देखा जाए तो यह वो दौलत है जो न बाजार में दिखती है, न बैलेंस शीट में दर्ज होती है, लेकिन हमारी सांसों, पानी, खेती और जीवन को हर दिन सहारा देती है। यह एक ऐसी अदृश्य संपदा है जिस पर हमारा आज और कल दोनों टिका है।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में प्रति हेक्टेयर जंगल हर साल औसतन 31,001 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 29 लाख रुपए के बराबर पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करते हैं। यानी, जो जंगल “मुफ्त” लगते हैं, वे असल में भारत की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक हैं।

जंगल: सिर्फ पेड़ नहीं, “इकोनॉमिक इंजन”

इसका अर्थ है कि देश का हर पेड़ और हर जंगल चुपचाप अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और आजीविका को मजबूत आधार दे रहा है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन सबसे बड़ा योगदान देते हैं, जो अकेले ही हर साल लगभग 70,300 करोड़ डॉलर (करीब 66 लाख करोड़ रुपए) की सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

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गौरतलब है कि पारिस्थितिक सेवाएं वे प्राकृतिक लाभ हैं जो जंगल, नदियां, मिट्टी और जैव विविधता बिना किसी प्रत्यक्ष लागत के मानव समाज को प्रदान करती हैं। इन सेवाओं में जलवायु नियंत्रण, वर्षा चक्र का संतुलन, हवा और पानी का शुद्धिकरण, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, कार्बन अवशोषण, तथा जैव विविधता का संरक्षण शामिल है।

यह अध्ययन इंस्टिट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज, आईसीएफआरई - इंस्टिट्यूट ऑफ फारेस्ट प्रोडक्टिविटी, रांची, डार्विन यूनिवर्सिटी (ऑस्ट्रेलिया) और स्टेट फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट, चेन्नई से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल एंड सस्टेनेबिलिटी इंडीकेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन 45 से अधिक शोधों के विश्लेषण पर आधारित है, जो बताता है कि जंगल हमें ऐसे फायदे देते हैं, जिन्हें हम सीधे पैसे में नहीं मापते, लेकिन उनका असर कहीं ज्यादा गहरा होता है। यह जंगल, बारिश और जल चक्र को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।

बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं से बचाते हैं। वातावरण में मौजूद कार्बन को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को धीमा करते हैं। साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ईंधन, चारा और खाद के रूप में सहारा देते हैं।

आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत के कुल भू-भाग का करीब 21.8 फीसदी हिस्सा जंगलों से ढका है। यहां विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं, जिनमें मैंग्रोव, अल्पाइन, समशीतोष्ण, शुष्क और आर्द्र पर्णपाती वन, उष्णकटिबंधीय वर्षावन और सदाबहार वन शामिल हैं। यह विविधता भारत की समृद्ध प्राकृतिक विरासत को दर्शाती है।

27.5 करोड़ जिंदगियों का आधार

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में वनों की अहम भूमिका है, जो देश के कुल जीडीपी में करीब डेढ़ फीसदी का योगदान दे रहे हैं। है। इसका अर्थ है कि वनों से जुड़े कार्य, जैसे लकड़ी, वन उत्पाद और अन्य सेवाएं, देश की आर्थिक गतिविधियों को महत्वपूर्ण रूप से सहारा देते हैं। कुल मिलाकर, इस क्षेत्र का आर्थिक मूल्य करीब 150 लाख करोड़ रुपए आंका गया है, जो स्पष्ट करता है कि जंगल केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का भी एक मजबूत आधार हैं।

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अध्ययन में यह भी सामने आया है कि देश में करीब 27.5 करोड़ लोगों की जीविका जंगलों से जुड़ी है, जबकि 10 करोड़ से अधिक लोग सीधे वन आधारित कामों में लगे हैं। यानी जंगल महज पेड़ नहीं, बल्कि वे करोड़ों लोगों की आजीविका, रोजगार और ग्रामीण जीवन की मजबूत रीढ़ भी हैं।

प्रकृति का यह योगदान चुपचाप लेकिन बेहद गहराई से देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को संभाले हुए है।

जल, कृषि और जीवन का ‘इंश्योरेंस सिस्टम’

वन हमें लकड़ी, भोजन, औषधियां, कार्बन भंडारण और पर्यटन जैसी अनगिनत सेवाएं देते हैं। खास तौर पर हर साल भारत में वनों से मिलने वाले गैर-लकड़ी वन उत्पाद जैसे शहद, बांस और औषधीय पौधे अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान करते हैं। इन उत्पादों से करीब 1.75 लाख करोड़ रुपए की वार्षिक आय होती है। यह महज एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह आय सीधे तौर पर करीब 30 करोड़ ग्रामीणों के जीवन को सहारा देती है।

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पानी के मामले में भी जंगल जीवनदायिनी भूमिका निभाते हैं। अध्ययन में रिपोर्ट ऑन द स्टेटस ऑफ एनवायरनमेंट इन इंडिया 2019 के हवाले से बताया गया है कि जल संरक्षण और नियमन से हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपए का लाभ मिलता है। यह योगदान खासकर कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है।

ऐसे में अगर जंगल नहीं रहे तो नदियां सूखने लगेंगी, खेत बंजर हो जाएंगे और जीवन कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाएगा।

हर साल सोख रहे 70 करोड़ टन कार्बन

आपको जानकर हैरानी होगी कि ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है, तब भारत के ये जंगल हर साल करीब 70 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) को अपने भीतर सोख लेते हैं।

इस प्राकृतिक प्रक्रिया का आर्थिक मूल्य करीब 6.5 लाख करोड़ रुपए आंका गया है। यह दर्शाता है कि जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि जलवायु संतुलन की एक मजबूत ढाल हैं। वास्तव में, ये जंगल हमारे लिए एक “प्राकृतिक ऑक्सीजन बैंक” की तरह काम करते हैं, जो पृथ्वी को सांस लेने योग्य बनाए रखते हैं।

इसी तरह भारत में जंगल मृदा संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, इस सेवा का कुल मूल्य करीब 53.6 करोड़ अमेरिकी डॉलर आंका गया है, जबकि औसतन यह 4.4 डॉलर प्रति हेक्टेयर है। हालांकि यह मूल्य अलग-अलग प्रकार के जंगलों और उनके क्षेत्रों के अनुसार बदलता रहता है। इससे स्पष्ट होता है कि जंगल मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने और भू-संरक्षण में भी अहम योगदान देते हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि इन सेवाओं का सही मूल्यांकन नहीं होने के कारण जंगलों को अक्सर “कम उपयोगी” मानकर उद्योग या विकास परियोजनाओं के लिए बिना सोचे समझे काट दिया जाता है। यही वजह है कि नीति निर्माण में जंगलों की असली कीमत शामिल नहीं हो पाती और पर्यावरणीय नुकसान बढ़ता जाता है।

विकास बनाम विनाश

अध्ययन ने यह भी चेताया है कि तेजी से होते शहरीकरण और कृषि विस्तार से जंगलों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में अगर इन प्राकृतिक सेवाओं को नजरअंदाज किया गया, तो जल संकट बढ़ सकता है, मिट्टी की गुणवत्ता गिर सकती है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पहले से अधिक विनाशकारी हो सकते हैं।

ऐसे में विशेषज्ञों के अनुसार, पारिस्थितिक सेवाओं का आर्थिक मूल्यांकन बेहद आवश्यक है, ताकि प्रकृति द्वारा दिए जा रहे अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण योगदान को समझा जा सके। उनका कहना है कि जंगलों को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि “प्राकृतिक पूंजी” के रूप में देखा जाना चाहिए, जो देश की अर्थव्यवस्था और जीवन-व्यवस्था दोनों की नींव है।

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साथ ही, नीति-निर्माण में पर्यावरणीय लाभों को भी समुचित रूप से शामिल किया जाना चाहिए, ताकि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

सच कहें तो जंगलों को बचाना सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और भविष्य की सुरक्षा का भी सवाल है। अगर आज हमने इनकी असली कीमत नहीं समझी, तो आने वाले पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

 एक अमेरिकी डॉलर = 94.15 भारतीय रुपए

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