

2026 की भीषण गर्मी ने भारत को ऐसे ‘हीट ट्रैप’ में बदल दिया है, जहां दिन ही नहीं, रातें भी लोगों के लिए जानलेवा साबित होने लगी हैं। नए क्लाइमामीटर विश्लेषण के मुताबिक, इंसानी गतिविधियों से बढ़ते जलवायु परिवर्तन ने इस बार की लू को पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक बना दिया।
दिल्ली, अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि बांदा में पारा 48 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। कई इलाकों में तापमान सामान्य से 8 डिग्री तक अधिक रहा।
साफ आसमान, सूखे मौसम और लंबे समय तक बने उच्च दबाव ने गर्मी को और भयावह बना दिया। अस्पतालों में हीटस्ट्रोक के मरीज बढ़े, बिजली की मांग ने रिकॉर्ड तोड़े और करोड़ों लोगों का जनजीवन इससे प्रभावित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, इस भीषण गर्मी से करीब 4.4 करोड़ लोग और 32 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं।
विशेषज्ञों ने चेताया है कि बढ़ती नमी, गर्म रातें, सूखी मिट्टी, कटते पेड़ और तेजी से फैलते कंक्रीट के शहर भारत को ‘दमघोंटू गर्मी’ की ओर धकेल रहे हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब हीटवेव पहले की तुलना में ज्यादा लंबी, उमस भरी और जानलेवा हो चुकी हैं। यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है।
जब दिन का पारा सामान्य से 8 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर चला जाए, रातें भी ठंडी होना बंद हो जाएं और अस्पतालों के वार्ड हीटस्ट्रोक के मरीजों से भरने लगें, तो समझ लीजिए कि कुदरत हमें आखिरी चेतावनी दे रही है।
भारत में इस साल अप्रैल में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला जब गर्मी और लू की मार ने करोड़ों लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह इंसानी गलतियों का ही नतीजा है जिसने भारत में अप्रैल में पड़ी भीषण गर्मी को और ज्यादा खतरनाक बना दिया।
इस बारे में जारी नए क्लाइमामीटर विश्लेषण के मुताबिक, इंसानों की वजह से बढ़ते जलवायु परिवर्तन ने अप्रैल 2026 के दौरान भारत में गर्मी और लू को पहले से और ज्यादा खतरनाक बना दिया है। इसकी वजह से देश के हिस्सों में गर्मी का दबाव बढ़ गया।
45 डिग्री का टॉर्चर: भट्टी की तरह सुलगते भारत के शहर
रिपोर्ट के अनुसार 24 से 28 अप्रैल के बीच गर्मी का असर सबसे ज्यादा देखने को मिला। इस दौरान भारत के बड़े शहरों में जो भीषण लू के थपेड़े चले, उसने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया।
इसकी वजह से दिल्ली, अहमदाबाद और लखनऊ जैसे बड़े शहर बुरी तरह प्रभावित रहे, जहां तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक था। आसपास के कई इलाकों में तो पारा इससे भी अधिक दर्ज किया गया।
साफ आसमान, सूखे मौसम और लंबे समय तक बने उच्च दबाव के कारण गर्मी और लू की स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गई। इससे उत्तर और पश्चिम भारत पर गहरा असर पड़ा। मौसम इस कदर बिगड़ा कि सुबह से ही सड़कों पर तेज तपिश महसूस होने लगी, अस्पतालों में हीटस्ट्रोक और लू के मरीज बढ़ने लगे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन को हीट अलर्ट जारी करने के साथ-साथ आपात कदम भी उठाने पड़े। इस दौरान बढ़ती गर्मी के बीच कूलिंग की जरूरतों के चलते बिजली की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
दांव पर करोड़ों जिंदगियां: पेट से अर्थव्यवस्था तक मौसम की सीधी मार
विश्लेषण में पुष्टि की गई है कि इस जानलेवा गर्मी की वजह से देश में करीब 4.4 करोड़ लोग और 34,113 करोड़ डॉलर (करीब 32 लाख करोड़ रुपए) की आर्थिक गतिविधियां सीधे तौर पर प्रभावित हुईं। वैज्ञानिकों का भी कहना है कि यह केवल सामान्य गर्मी नहीं, बल्कि इंसानों की गलतियों से पनपे जलवायु परिवर्तन से और ज्यादा खतरनाक हुई लू का असर है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि इस दौरान लखनऊ जैसे शहरों में गर्मी से बीमार होने वाले मरीजों की संख्या में 30 से 40 फीसदी का उछाल देखा गया।
कई जगहों पर लू और हीटस्ट्रोक से मौतों की खबरें भी सामने आईं। घरों और दफ्तरों को ठंडा रखने की जद्दोजहद में देश में बिजली की मांग ने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार कम बर्फबारी वाले सूखे सर्द मौसम ने भी गर्मी को और तेज करने में भूमिका निभाई।
क्या बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून से बढ़ जाएगी महंगाई
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बढ़ती गर्मी और अनियमित मानसून महंगाई को पांच फीसदी से ऊपर धकेल सकते हैं, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन पर काम कर रहे संगठन क्लाइमेट ट्रेंड्स ने भी अपनी नई रिपोर्ट "व्हाई इंडियाज हीटवेव्स फील मोर ब्रूटल दैन बिफोर" में भारत के एक डरावने भविष्य की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में गर्मी अब सिर्फ जिस्म झुलसाने वाली तपिश नहीं रही, बल्कि एक ऐसा 'दमघोंटू जाल' बनती जा रही है, जिससे बच निकलने के सारे रास्ते धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के बांदा में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जबकि देश के कई हिस्सों में रात का पारा भी 30 डिग्री के करीब बना हुआ है। यानी अब सूरज ढलने के बाद भी लोगों को राहत नहीं मिल रही। क्लाइमेट ट्रेंड्स का रिपोर्ट में कहना है भारत में लू अब पहले की तुलना में ज्यादा लंबी, उमस भरी और जानलेवा हो चुकी है।
दिनभर के तपते जिस्म को रात में भी नहीं मिल रही राहत
बढ़ती नमी, गर्म रातें, सूखी मिट्टी और तेजी से फैलते कंक्रीट के शहर मिलकर देश को एक विशाल ‘हीट ट्रैप’ में बदल रहे हैं। इस बदलते संकट का सबसे क्रूर चेहरा झुलसाती रातें हैं।
बीते दशक में भारत का रात का न्यूनतम तापमान करीब 0.21 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की रफ्तार से बढ़ा है, जिससे दिनभर के तपते जिस्म और घरों को रात में भी ठंडक नसीब नहीं हो रही।
रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि भारत का 'कोर हीटवेव जोन' यानी सबसे प्रभावित क्षेत्र अब पहले से ज्यादा बड़ा और खतरनाक हो चुका है। इसमें राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से शामिल हैं। यहां लू की आवृत्ति और अवधि दोनों बढ़ रही हैं।
ब्रिटेन के शेफील्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हाओसु तांग के मुताबिक, यह घटना दिखाती है कि, “भारत में भीषण गर्मी अब तेजी से सामाजिक और आर्थिक खतरे में बदल रही है। यह सिर्फ मौसम की मार नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला है। मानसून से पहले पड़ने वाली भीषण गर्मी से मजदूरों के काम करने की क्षमता घट रही है, जल संकट गहरा रहा है और बिजली की मांग बढ़ रही है।“
क्यों पहले से क्रूर हो रही है गर्मी और लू
उन्होंने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन के साथ लू की घटनाएं और तेज होंगी, जिससे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और आर्थिक गतिविधियां बड़े स्तर पर प्रभावित हो सकती हैं।
विश्लेषण में अप्रैल 2026 में पड़ी भीषण गर्मी और लू से जुड़े मौसमीय हालात की तुलना पिछले वर्षों में पड़ी ऐसी ही गर्मी की घटनाओं से की गई।
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि अब ऐसी हीटवेव की घटनाएं बीते दशकों की तुलना में करीब 2 डिग्री ज्यादा गर्म माहौल में हो रही हैं। इससे खतरनाक गर्मी पड़ने की आशंका काफी बढ़ गई है। रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि इसके पीछे प्राकृतिक उतार-चढ़ाव की भूमिका सीमित रही, जबकि मुख्य वजह जीवाश्म ईंधनों का जलना और उसकी वजह से वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि है।
यह निष्कर्ष पिछले शोधों से भी मेल खाते हैं, कि जब पहले से बढ़ा तापमान लगातार साफ आसमान और सूखे मौसम के साथ मिल जाता है, तो लू और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। अध्ययन यह भी पुष्टि करता है कि जलवायु परिवर्तन उन मौसमीय परिस्थितियों को बदल रहा है, जिनमें लू पैदा होती हैं।
यह सही है कि पहले भी लू चलती थी, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन की वजह से उनका असर ज्यादा खतरनाक हो गया है। यानी जिस मौसम में लू बनती है, उसका “बेस तापमान” ही पहले से ज्यादा गर्म हो चुका है। इसी कारण आज लू की घटनाएं पहले से ज्यादा लंबी, तेज और जानलेवा साबित हो रही हैं।
हीट एक्शन प्लान, उत्सर्जन में कटौती: क्या कुछ हैं समाधान
फ्रांस के आईपीएसएल-सीएनआरएस से जुड़े वैज्ञानिक डेविड फरांडा का कहना है, जीवाश्म ईंधनों का उपयोग भारत में गर्मी और लू को और ज्यादा विनाशकारी बना रहा है। उन्होंने चेताया कि यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं हुई तो दुनिया के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हीट स्ट्रेस लगातार बढ़ता जाएगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह लू केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के उस खतरनाक भविष्य की चेतावनी है, जहां लंबे, अधिक तीव्र और जानलेवा गर्मी के दौर सामान्य बनते जा रहे हैं।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े नेवेन फुकर का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, "दिन में बेहद ऊंचे तापमान और रात में भी गर्मी बने रहने से लोगों को राहत नहीं मिल पाई, जिससे शरीर पर लगातार हीट स्ट्रेस बढ़ता गया। इसका सबसे ज्यादा असर बाहर काम करने वाले मजदूरों, गरीबों, बुजुर्गों, बच्चों और उन लोगों पर पड़ रहा है, जिनके पास ठंडी जगहों या कूलिंग सुविधाओं की पहुंच नहीं है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि ऐसे हालात से निपटने के लिए हीट एक्शन प्लान, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली और सभी लोगों के लिए कूलिंग सुविधाओं की उपलब्धता बेहद जरूरी है। साथ ही, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना भी अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
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