

धरती पर कीटों की दुनिया हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा विशाल हो सकती है। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए एक नए अध्ययन ने दावा किया है कि पृथ्वी पर कीटों की कुल प्रजातियां 1.4 करोड़ से 2 करोड़ के बीच हो सकती हैं, जबकि अब तक विज्ञान केवल करीब 60 लाख प्रजातियों का अनुमान लगाता रहा है।
हैरानी की बात यह है कि इनमें से सिर्फ 12 लाख प्रजातियों की ही पहचान हो पाई है। यानी प्रकृति में करोड़ों ऐसे छोटे जीव अब भी मौजूद हो सकते हैं, जिनका न नाम दर्ज है, न वैज्ञानिक रिकॉर्ड।
पीएनएएस में प्रकाशित यह अध्ययन कोस्टा रिका के एक संरक्षित जंगल में 40 वर्षों से जुटाए गए आंकड़ों, 16 लाख से अधिक कीटों की डीएनए बारकोडिंग और बेहद सूक्ष्म परजीवी ततैयों के विश्लेषण पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यह आंकड़ा भी अंतिम नहीं, बल्कि न्यूनतम अनुमान हो सकता है।
यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है, जब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, रासायनिक खेती और आवास विनाश के कारण दुनिया भर में कीटों की संख्या तेजी से घट रही है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अनगिनत प्रजातियां शायद हमारी पहचान में आने से पहले ही हमेशा के लिए खत्म हो जाएं। यह अध्ययन सिर्फ एक वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने की तत्काल चेतावनी भी है।
धरती पर रेंगते, उड़ते, पत्तों के नीचे छिपे और फूलों के आसपास मंडराते कीटों की दुनिया हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा विशाल है। पिछले चार दशकों से विज्ञान जगत एक ऐसे आंकड़े को सच मानकर बैठा था, जिसने प्रकृति को देखने का हमारा नजरिया तय कर दिया था।
दुनिया भर के विशेषज्ञों का मानना था कि इस धरती पर कीड़े-मकोड़ों की करीब 60 लाख प्रजातियां मौजूद हैं। यह संख्या अपने आप में विशाल थी और हमें यह दिलासा देती थी कि हम पृथ्वी के ताने-बाने को काफी हद तक समझ चुके हैं।
लेकिन विज्ञान जगत की एक नई बेहद हैरान कर देने वाली खोज ने इस पुराने यकीन को झकझोर कर रख दिया है। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस विषय पर एक नया अध्ययन किया है। इस अध्ययन में खुलासा हुआ है कि धरती पर मौजूद कीटों की प्रजातियों की असली संख्या 1.4 से 2 करोड़ के बीच हो सकती है।
यानी हम जिस रहस्य को सुलझा हुआ मान रहे थे, वह हमारी कल्पना से दो से तीन गुणा ज्यादा बड़ा और गहरा है।
यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है, जब दुनिया भर में कीटों की घटती संख्या को लेकर चिंता बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हम यह तक नहीं जानते कि धरती पर कितनी प्रजातियां हैं, तो उन्हें बचाने की कोशिशें भी अधूरी रह जाएंगी।
इस अध्ययन के नतीजे जर्नल प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए हैं।
अब तक महज 12 लाख प्रजातियों को ही मिली है पहचान
बता दें कि वैज्ञानिक अब तक दुनिया भर में कीटों की करीब 12 लाख प्रजातियों की पहचान कर चुके हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी प्रजातियां मौजूद नहीं हैं। असल चिंता यही है कि प्रकृति में अभी भी अनगिनत कीट प्रजातियां ऐसी हैं, जिनका न तो नाम रखा गया है और न ही उनका वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार हुआ है।
इसका सीधा सा अर्थ यह है कि करोड़ों ऐसी नन्हीं जिंदगियां हमारे ठीक बगल में सांस ले रही हैं, जो गुमनाम हैं।
अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में कीट-विज्ञान की सहायक प्रोफेसर लौरा मेलिसा गुजमैन के मुताबिक, “हम उन जिंदगियों की रक्षा कभी नहीं कर सकते जिनके वजूद के बारे में हमें भनक तक न हो। आज दुनिया भर से कीटों की आबादी में भारी गिरावट की खबरें आ रही हैं, जिसे वैज्ञानिकों ने ‘इंसेक्ट एपोकैलिप्स' नाम दिया है।"
सच कहें तो यह सोचना भी बेहद पीड़ादायक है कि न जाने कितनी प्रजातियां हमारे जानने, समझने और उन्हें नाम देने से पहले ही इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो रही हैं।
क्यों होती है कीटों में इतनी विविधता?
कीटों की दुनिया इतनी विशाल और विविध होने के पीछे कई वजहें हैं। बहुत-से कीट अपने जीवन के अलग-अलग चरणों में पूरी तरह बदल जाते हैं। जैसे एक इल्ली पत्तियां खाती है, लेकिन वही आगे चलकर तितली या पतंगा बनकर फूलों का रस पीती है। यानी एक ही जीव अपने जीवन में अलग-अलग आवास और भोजन का उपयोग कर सकता है।
इसके अलावा, ज्यादातर कीट आकार में बहुत छोटे होते हैं। यही वजह है कि वे बेहद सीमित जगहों में भी बड़ी संख्या में रह सकते हैं और समय के साथ अलग-अलग प्रजातियों में बंटते चले जाते हैं।
कोस्टा रिका के जंगल से मिला बड़ा सुराग
इस नए अनुमान तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों ने कोस्टा रिका के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित एक संरक्षित वन क्षेत्र 'एरिया दे कंजर्वेसिओन गुआनाकास्ते' के आंकड़ों का सहारा लिया। करीब 650 वर्ग मील में फैले इस क्षेत्र में पिछले 40 वर्षों से कीटों का गहन अध्ययन और संग्रह किया जा रहा है। शोधकर्ताओं ने खास तौर पर 'माइक्रोगैस्ट्रिना' नाम के बेहद छोटे परजीवी ततैयों के एक समूह का अध्ययन किया।
ये ततैये अपने अंडे इल्लियों के शरीर के भीतर देते हैं। बाद में इनके लार्वा उसी इल्ली के शरीर के अंदर पलते हैं और बाहर निकलते हैं।
वैज्ञानिकों ने इन ततैयों के कुल 21,669 नमूने जुटाए। हैरानी की बात यह रही कि इनमें से करीब एक-तिहाई प्रजातियां सिर्फ एक बार ही दर्ज हुईं, जो इस बात का संकेत है कि वहां अब भी बहुत कुछ छिपा हुआ है।
16 लाख कीटों के डीएनए ने खोला राज
इस अध्ययन में लगाए गए 15 प्रमुख ट्रैपों में 16 लाख से अधिक कीट फंसे। वैज्ञानिकों ने इन सभी का डीएनए बारकोडिंग के जरिए विश्लेषण किया। यह एक ऐसी तकनीक है, जिसमें आनुवंशिक कोड के छोटे हिस्से को पढ़कर अलग-अलग प्रजातियों की पहचान की जाती है। जांच में इन ट्रैपों से करीब 54,000 अलग-अलग कीट प्रजातियां दर्ज की गईं।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने माइक्रोगैस्ट्रिना ततैयों की ज्ञात और अब तक अज्ञात प्रजातियों के अनुपात का विश्लेषण किया। इसी आधार पर उन्होंने पूरे वन क्षेत्र में मौजूद कीटों की कुल संभावित प्रजातियों का अनुमान लगाया। नतीजों से पता चला कि केवल इसी जंगल में करीब 3.33 लाख कीट प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं।
एक जंगल से पूरी दुनिया तक का अनुमान
अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि एक जंगल से मिले आंकड़ों के आधार पर पूरी पृथ्वी के कीटों की संख्या का अनुमान कैसे लगाया जाए। इसके लिए शोधकर्ताओं ने पेड़ों की प्रजातियों को पैमाना बनाया। दुनिया भर में पेड़ों की करीब 73,000 प्रजातियां पाई जाती हैं, जबकि अध्ययन वाले इस वन क्षेत्र में इनकी संख्या 1,200 से 1,500 के बीच है।
इसी अनुपात को आधार बनाकर वैज्ञानिकों ने वहां दर्ज कीट विविधता को वैश्विक स्तर पर विस्तार दिया और पृथ्वी पर कीट प्रजातियों की कुल संख्या का अनुमान लगाया। इस गणना के बाद जो तस्वीर सामने आई, वह बेहद चौंकाने वाली थी। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि धरती पर कीटों की कुल प्रजातियों की संख्या 1.4 करोड़ से 2 करोड़ प्रजातियों के बीच हो सकती है।
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह आंकड़ा भी अंतिम नहीं है, बल्कि न्यूनतम अनुमान है। वजह यह है कि जमीन पर लगाए गए ट्रैप जंगल की ऊपरी छतरी यानी कैनोपी तक नहीं पहुंच पाते, और कई तरह के कीट ऐसे भी हैं जो इन जालों में फंसते ही नहीं। ऐसे में कीटों की संख्या इस अनुमान से भी अधिक हो सकती है।
चिंता का विषय है कीटों की घटती संख्या
यह निष्कर्ष इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि हाल के वर्षों में 'इंसेक्ट एपोकैलिप्स' यानी कीटों की तेजी से घटती दुनिया को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई हैं। जलवायु परिवर्तन, आवास का विनाश, रासायनिक उर्वरक, आक्रामक प्रजातियां और प्रदूषण जैसे कारणों से कीटों की आबादी पर गहरा असर पड़ा है। कुछ अध्ययनों के मुताबिक, दुनिया के करीब 40 फीसदी कीटों की संख्या घट रही है।
ऐसे में खतरा सिर्फ इतना नहीं कि कीट कम हो रहे हैं। बड़ा खतरा यह है कि शायद कई प्रजातियां ऐसी भी हों, जो हमारे उन्हें जानने से पहले ही खत्म हो जाएं।
दरअसल, यह अध्ययन केवल कीटों की संख्या का नया अनुमान भर नहीं देता, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ाता है। यह याद दिलाता है कि धरती पर जीवन की दुनिया हमारी समझ से कहीं अधिक विशाल, जटिल और नाजुक है, और अगर हमने अभी भी इसे बचाने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो इसकी अनगिनत परतें हमारी आंखों के सामने हमेशा के लिए ओझल हो सकती हैं।