ग्लोबल वार्मिंग का नया चेहरा: कीट बन रहे कमजोर कड़ी

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो सीमित सहनशक्ति वाले कीट सबसे पहले प्रभावित होंगे और इसका असर पूरी पारिस्थितिकी पर पड़ेगा।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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  • नई स्टडी में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के चलते अमेजन जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में करीब आधे कीट जानलेवा गर्मी की चपेट में आ सकते हैं।

  • जर्नल नेचर में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, कीटों की सीमित ताप सहनशक्ति और धीमी अनुकूलन क्षमता उन्हें तेजी से बदलती जलवायु के सामने बेहद कमजोर बना रही है। चूंकि ये नन्हे जीव परागण, पोषक चक्र और खाद्य श्रृंखला की रीढ़ हैं, ऐसे में इन पर बढ़ता संकट पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को गहरे खतरे में डाल सकता है।

जब प्रकृति के सबसे छोटे जीव भी गर्मी से हारने लगें, तो समझ लीजिए खतरा कितना बड़ा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, धरती के बढ़ते तापमान का असर अब सबसे नन्हे जीवों पर भी साफ दिखने लगा है।

एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि अमेजन जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले करीब आधे कीट आने वाले समय में जानलेवा गर्मी का सामना कर सकते हैं। यानी बढ़ती तपिश ने उन्हें उनकी सहनशक्ति की आखिरी सीमा तक धकेल दिया है, जहां से उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।

जर्मनी के वुर्जबर्ग और ब्रेमेन विश्वविद्यालयों से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में चेताया है कि पतंगे, मक्खियां और भृंग (बीटल) जैसे कीटों की गर्मी सहने की क्षमता उतनी मजबूत नहीं है, जितना पहले माना जाता था। ऐसे में बढ़ता तापमान उनके लिए घातक साबित हो सकता है।

मैदानी इलाकों में खतरा ज्यादा

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कुछ कीड़े थोड़े समय के लिए अपनी गर्मी सहने की क्षमता बढ़ा सकते हैं। लेकिन मैदानी और गर्म इलाकों में रहने वाली अधिकांश प्रजातियों में यह क्षमता लगभग न के बराबर है। यानी जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, ये कीट जल्दी ही अपनी सीमा पार कर जाएंगे।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित हुए हैं।

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पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर मंडरा रहा खतरा

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो इसका असर सिर्फ कीटों तक सीमित नहीं रहेगा।

ये नन्हे जीव प्रकृति की रीढ़ हैं, ये परागण करते हैं, मृत जीवों को सड़ाकर मिट्टी को जीवन देते हैं और पूरी खाद्य श्रृंखला को थामे रखते हैं। ऐसे में अगर इनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर सकता है।

शरीर की बनावट ही बन रही कमजोरी

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अलग-अलग कीट समूहों में गर्मी सहने की क्षमता में बड़ा अंतर है।

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वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसकी मुख्य वजह उनके शरीर में मौजूद प्रोटीन की संरचना और ताप सहने की क्षमता है। चूंकि ये गुण विकास की लम्बी प्रक्रिया में तय हुए हैं और आसानी से नहीं बदलते। यही कारण है कि कीटों की गर्मी सहने की क्षमता उनकी जीवविज्ञान में गहराई से जुड़ी है, इसलिए वे बदलती जलवायु के साथ खुद को तेजी से नहीं ढाल पा रहे।

अमेजन में हालात सबसे ज्यादा गंभीर

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर वैश्विक तापमान इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो अमेजन क्षेत्र में रहने वाली करीब आधी कीट प्रजातियां ‘घातक गर्मी’ के दबाव में आ सकती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के करीब 70 फीसदी जीव कीट हैं और इनमें से ज्यादातर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहते हैं। इसके बावजूद, इनके ताप सहने की क्षमता पर अब तक बहुत कम अध्ययन हुआ है।

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इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 2,000 से अधिक कीट प्रजातियों पर शोध किया है। इसके लिए 2022-23 के दौरान अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के विभिन्न इलाकों जैसे ठंडे पहाड़ी जंगलों से लेकर गर्म वर्षावनों और सवाना तक से आंकड़े जुटाए गए। साथ ही, कीटों के जीन का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की गई कि कौन-सी प्रजातियां गर्मी को बेहतर झेल सकती हैं और इसके पीछे क्या वजह है।

जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ इंसानों या बड़े जानवरों की समस्या नहीं रहा। यह उन नन्हे जीवों तक पहुंच चुका है, जिन पर पूरी प्रकृति टिकी है। ऐसे में अगर कीट डगमगाए, तो उसके झटके पूरी पारिस्थितिकी पर महसूस होंगे।

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