प्रकृति की बिगड़ती ताल: जलवायु परिवर्तन से बदल रहा फूलों का ‘कैलेंडर’

दो सदियों के रिकॉर्ड बताते हैं धरती के गर्म होने के साथ उष्णकटिबंधीय जंगलों में फूल अब अपने तय मौसम से भटकने लगे हैं। इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है
पौधों, कीटों और जानवरों के बीच रिश्ते बेहद खास और नाजुक होते हैं। ऐसे में समय का थोड़ा-सा भी बदलाव पूरे खाद्य जाल को प्रभावित कर सकता है; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
पौधों, कीटों और जानवरों के बीच रिश्ते बेहद खास और नाजुक होते हैं। ऐसे में समय का थोड़ा-सा भी बदलाव पूरे खाद्य जाल को प्रभावित कर सकता है; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • दो सदियों के रिकॉर्ड और 8,000 से अधिक फूलों के विश्लेषण पर आधारित नए अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय जंगलों में फूलों के खिलने का समय लगातार बदल रहा है।

  • हर दशक में औसतन दो दिन का यह बदलाव अब कई जगह हफ्तों और महीनों तक पहुंच चुका है, जिससे पौधों, परागण करने वाले कीटों, पक्षियों और जानवरों के बीच सदियों से बना पारिस्थितिक तालमेल बिगड़ने लगा है।

  • निष्कर्ष बताते हैं कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र भी जलवायु परिवर्तन से अछूते नहीं हैं, और यह बदलती ‘प्रकृति की घड़ी’ जैव-विविधता तथा खाद्य श्रृंखला के लिए गंभीर चेतावनी है।

प्रकृति की अपनी एक लय होती है। फूल खिलते हैं, मधुमक्खियां आती हैं, फल लगते हैं और फिर जीवन आगे बढ़ता है। लेकिन अब बदलती जलवायु के साथ यह लय गड़बड़ाने लगी है। स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब महज तापमान या पिघलते ग्लेशियरों तक सीमित नहीं। इसका प्रभाव धरती के सबसे जैव-विविध इलाकों में पेड़-पौधों और फूलों पर भी साफ दिखने लगा है।

इस बारे में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि धरती के गर्म होने के साथ उष्णकटिबंधीय इलाकों में फूलों का समय बिगड़ने लगा है।

कई उष्णकटिबंधीय पौधों में अब पहले की तुलना में हफ्तों, यहां तक कि महीनों पहले या बाद में फूल खिल रहे हैं। यानी प्रकृति की घड़ी बदल रही है। भले ही यह बदलाव इतना धीमा है कि हमें आंखों से नहीं दिखता, लेकिन इसके प्रभाव इतने गहरे हैं कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को हिला सकते हैं।

यह अध्ययन अमेरिका के कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों स्काईलर ग्रेव्स और एरिन मैन्जिटो-ट्रिप द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्लोस वन में प्रकाशित हुए हैं।

दो सदियों का रिकॉर्ड, 8,000 फूलों का विश्लेषण

अपनी इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने 1794 से 2024 के बीच संजोए 8,000 से अधिक फूलों के नमूनों का अध्ययन किया। ये नमूने संग्रहालयों और हर्बेरियम (सूखे पौधों के अभिलेखागार) में सुरक्षित रखे गए थे। वैज्ञानिकों ने कुल 33 उष्णकटिबंधीय प्रजातियों को चुना।

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इन प्रजातियों में साल फूल खिलने की अवधि स्पष्ट होती है। शोधकर्ताओं ने इन नमूनों को संजोने की तिथियों को “ऐतिहासिक घड़ी” की तरह इस्तेमाल किया, ताकि यह समझा जा सके कि समय के साथ फूलों के खिलने का पैटर्न कैसे बदल रहा है।

हर दशक दो दिन का बदलाव, लेकिन कुछ मामले चौंकाने वाले

विश्लेषण में सामने आया कि औसतन हर दशक में फूलों के खिलने का समय करीब दो दिन खिसक रहा है। पहली नजर में यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन 100 से 200 वर्षों में यही बदलाव कई हफ्तों में बदल जाता है।

कुछ उदाहरण तो और भी हैरान करने वाले हैं, घाना की ‘रैटलपॉड’ झाड़ियों में 1950 से 1990 के बीच फूलों के खिलने का समय करीब 17 दिन आगे खिसक गया है। वहीं ब्राजील के अमरंथ के पेड़ों में अब 1950 के दशक की तुलना में करीब 80 दिन बाद फूल खिल रहे हैं।

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क्यों है यह बदलाव खतरनाक?

यह बदलाव मामूली नहीं। ये इतने बड़े हैं कि पौधों और उन पर निर्भर जीवों के बीच तालमेल बिगड़ सकता है। फूल खिलना वह क्षण है, जिससे परागण शुरू होता है, फल लगते हैं और पक्षियों-जानवरों का भोजन चक्र चलता है।

लेकिन यदि कोई पौधा उस समय फूल दे जब उसका परागण करने वाले कीट मौजूद ही न हो, तो बीज नहीं बनेंगे। फल कम लगेंगे। इससे उन फलों पर निर्भर पक्षी और जानवर प्रभावित होंगे। नतीजन सालों से इनके बीच मौजूद संतुलन बिखर सकता है।

उष्णकटिबंधीय इलाकों में पौधों, कीटों और जानवरों के बीच रिश्ते बेहद खास और नाजुक होते हैं। ऐसे में समय का थोड़ा-सा भी बदलाव पूरे खाद्य जाल को प्रभावित कर सकता है।

‘सुरक्षित’ नहीं उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

उष्णकटिबंधीय इलाकों में तापमान साल भर करीब-करीब एक समान रहता है, इसलिए पहले माना जाता था कि वहां फूलों के खिलने का समय जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित नहीं होगा। लेकिन यह अध्ययन इस धारणा को गलत साबित करता है।

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अध्ययन में पुष्टि हुई है कि इनमें बदलाव की दर वही है, जो समशीतोष्ण और ठंडे क्षेत्रों में देखी गई है। यानी उष्णकटिबंधीय पौधे भी जलवायु परिवर्तन के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं।

इस शोध की खास बात यह भी है कि वैज्ञानिकों ने सदियों पुराने हर्बेरियम रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया। 1820 में दबाकर रखा गया एक फूल सिर्फ एक नमूना नहीं, बल्कि उस समय के मौसम और पारिस्थितिकी का प्रमाण है। डिजिटल तकनीकों के जरिए अब इन रिकॉर्ड्स को बड़े पैमाने पर विश्लेषित किया जा सकता है। इससे जलवायु, बीमारियों, आक्रामक प्रजातियों और जैव-विविधता से जुड़े कई सवालों के जवाब मिल सकते हैं।

भारत में भी पेड़-पौधों पर पड़ रहा बदलती जलवायु का असर

पिछले कुछ शोधों में भारत में भी इस तरह के बदलाव देखे गए हैं। पेड़ों पर किए कई अध्ययनों में इस बात के सबूत सामने आए हैं कि जलवायु में आता बदलाव पेड़ों पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। दिसंबर 2022 में ऐसा ही कुछ देखा गया था जब दिसंबर के तीसरे सप्ताह से ही तेलंगाना और ओडिशा के आम के पेड़ों में बौरों का आना शुरू हो गया, जो इसके सामान्य समय से कम से कम एक महीना पहले है।

विशेषज्ञों ने इसके लिए बेमौसम बारिश और सामान्य से ज्यादा गर्म होती सर्दियों को जिम्मेवार माना था।

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इसी तरह मार्च 2016 में जर्नल इकोलॉजी एनवायरनमेंट एंड कंजर्वेशन में प्रकाशित एक अन्य शोध से पता चला कि जलवायु में आते बदलावों के चलते आम के पेड़ों में समय से पहले और बाद में बौरों का लगना उसकी एक विशेषता है। एक अन्य रिसर्च से पता चला है कि हिन्दूकुश हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान के साथ देवदार के पेड़ों में 38 फीसदी तक की गिरावट आई है। बता दें कि हिंदुकुश हिमालय वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है।

ऐसी ही एक रिसर्च से पता चला है कि बढ़ते तापमान के साथ पहाड़ों पर मौजूद पेड़ अब पहले से अधिक ऊंचाई की ओर शिफ्ट हो रहे हैं, मतलब की पर्वतीय ट्री लाइन अब ऊंचाई की ओर शिफ्ट हो रही है।

देखा जाए तो उष्णकटिबंधीय क्षेत्र दुनिया की सबसे अधिक जैव-विविधता वाले क्षेत्र हैं, लेकिन इन पर अपेक्षाकृत कम अध्ययन हुआ है। ऐसे में फूलों के समय में आ रहे व्यापक बदलाव संरक्षण प्रयासों के लिए एक चेतावनी है।

संदेश साफ है जंगलों में बदलाव शुरू हो चुका है और यह बदलाव सिर्फ फूलों तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे में प्रकृति की इस बदली ताल को समझना और उसे संभालना बेहद जरूरी हो गया है।

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