बेंगलुरु: भारी बारिश में कहां जाएगा पानी? नाले के दोनों ओर बनी दीवारों पर एनजीटी ने उठाए सवाल

ट्रिब्यूनल ने पूछा कि जब बारिश का पानी ही नाले तक नहीं पहुंचेगा, तो फिर बरसाती नाले को बनाने का औचित्य क्या रह जाएगा।
बेंगलुरु: भारी बारिश में कहां जाएगा पानी? नाले के दोनों ओर बनी दीवारों पर एनजीटी ने उठाए सवाल
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सारांश
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दो अलग-अलग मामलों में स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अधूरे जवाब या बिना वैज्ञानिक आधार के किए गए निर्माण स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

  • बेंगलुरु में मदिवाला झील से जुड़े बरसाती नाले के दोनों ओर बनाई गई रिटेनिंग वॉल पर ट्रिब्यूनल ने सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि बारिश का पानी ही नाले तक नहीं पहुंच पाएगा, तो फिर ऐसे स्टॉर्म वाटर ड्रेन का उद्देश्य क्या रह जाएगा।

  • एनजीटी ने बीबीएमपी से निर्माण की वैज्ञानिक और कानूनी वैधता पर विस्तृत जवाब मांगा है, साथ ही झील की मूल सीमा और संभावित अतिक्रमण की भी जांच कराने को कहा है।

  • वहीं, उत्तर प्रदेश के बागपत में अवैध खनन मामले में ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार की अधूरी और बिना शपथपत्र वाली रिपोर्ट को खारिज कर कड़ी नाराजगी जताई।

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल औपचारिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि अवैध खनन रोकने, पर्यावरणीय क्षति की भरपाई, बंद खदानों के पुनर्वास और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का ठोस ब्योरा पेश करना होगा।

  • ये दोनों मामले इस बात का संकेत हैं कि एनजीटी अब पर्यावरणीय मामलों में जवाबदेही, वैज्ञानिक योजना और प्रभावी अनुपालन पर पहले से कहीं अधिक सख्त रुख अपना रहा है।

बेंगलुरु में मदिवाला झील से जुड़े एक बरसाती नाले के दोनों किनारों पर बनाई गई रिटेनिंग वॉल को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

ट्रिब्यूनल ने पूछा है कि यदि नाले के दोनों ओर जमीन से ऊपर तक दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, तो क्या इससे बारिश का पानी नाले में पहुंचने से नहीं रुक जाएगा? अगर ऐसा है, तो फिर बरसाती नाले को बनाने का उद्देश्य ही कैसे पूरा होगा?

15 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) को चार सप्ताह के भीतर इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। यह मामला बेंगलुरु के कोडिचिक्कनहल्ली स्थित वकील मरीना हाउसिंग सोसाइटी के पास मदिवाला झील से जुड़े बरसाती नाले में सीवेज छोड़े जाने से जुड़ा है।

क्या है पूरा मामला?

सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि यदि नाले के दोनों ओर जमीन से ऊपर तक रिटेनिंग वॉल बनाई गई है, तो इससे बारिश का पानी नाले में प्रवेश करने से रुक सकता है। ऐसे में बीबीएमपी को स्पष्ट करना होगा कि इस निर्माण से नाले का मूल उद्देश्य प्रभावित तो नहीं हो रहा है।

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अदालत ने यह भी याद दिलाया कि पिछली सुनवाई में बेंगलुरु शहरी जिले के उपायुक्त को पुराने राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करने और यह बताने का निर्देश दिया गया था कि झील की मूल सीमा क्या थी तथा कहीं अतिक्रमण तो नहीं हुआ है। यह रिपोर्ट भी चार सप्ताह के भीतर दाखिल करने को कहा गया है।

इस बीच, बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड (बीडब्ल्यूएसएसबी) ने 23 मार्च 2026 की कार्रवाई रिपोर्ट के साथ तस्वीरें दाखिल की हैं। तस्वीरों में झील के किनारे बह रहे नाले के दोनों ओर बनी हुई दीवारें दिखाई देती हैं।

एनजीटी ने अतिक्रमण पर भी मांगा जवाब

वहीं, 14 जुलाई 2026 को दाखिल अपने हलफनामे में बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका ने कहा कि रिटेनिंग वॉल का निर्माण स्टॉर्म वाटर ड्रेन परियोजना का हिस्सा है।

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निगम के अनुसार, करीब 2.5 किलोमीटर लंबी आरसीसी रिटेनिंग वॉल नाले के दोनों किनारों पर बनाई गई है ताकि बारिश के पानी का प्रवाह व्यवस्थित रहे और भारी बारिश के दौरान आसपास के निचले इलाकों में जलभराव न हो। बीबीएमपी का दावा है कि यह निर्माण झील की मौजूदा सीमा के अनुरूप किया गया है और इससे झील के क्षेत्रफल में कोई कमी नहीं आई है।

हालांकि, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की जनवरी 2025 की रिपोर्ट एक अलग तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार, बरसाती नाले और वकील मरीना लेआउट के बीच सीवेज को कॉलोनी और मदिवाला झील में जाने से रोकने के लिए दोनों ओर रिटेनिंग वॉल बनाई गई थी।

लेकिन समय के साथ यह बरसाती नाला ऊपरी क्षेत्रों से आने वाले सीवेज का मुख्य रास्ता बन गया। इसी कारण इसकी चौड़ाई बढ़ाकर 15 से 20 मीटर तक करनी पड़ी, ताकि बढ़ते सीवेज प्रवाह को संभाला जा सके।

ऐसे में अब मामले की अगली सुनवाई के दौरान यह तय होगा कि बेंगलुरु को बाढ़ से बचाने का दावा करने वाली यह दीवार, पर्यावरण और जल निकासी के लिए मददगार है या कोई नई मुसीबत।

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उत्तर प्रदेश: अधूरी रिपोर्ट पर एनजीटी ने जताया असंतोष, बागपत अवैध खनन मामले में मांगा पूरा जवाब

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में धड़ल्ले से चल रहे अवैध खनन पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने 14 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश के भू-विज्ञान एवं खनन निदेशालय द्वारा पेश रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए इस पर गहरा असंतोष जताया है।

एनजीटी ने रिपोर्ट की खामियों को उजागर करते हुए कहा कि निदेशक की ओर से दाखिल यह रिपोर्ट न तो एफिडेविट के रूप में प्रस्तुत की गई और न ही उस पर निदेशक या किसी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर थे।

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कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस रिपोर्ट में अवैध खनन को रोकने के लिए दिए गए पिछले निर्देशों, अब तक की गई कार्रवाई और 'बागपत जिला टास्क फोर्स' की भूमिका और उनके द्वारा उठाए कदमों को लेकर कोई ठोस या पूरी जानकारी नहीं दी गई है। इस पर एनजीटी ने खनन निदेशक को तत्काल सभी आवश्यक जानकारियों के साथ एक नई और मुकम्मल अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है।

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश में बागपत जिले के सांकरौद गांव में कथित अवैध खनन से जुड़ा है, जिस पर एनजीटी लगातार निगरानी बनाए हुए है।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने 10 अप्रैल 2026 को दाखिल अपने शपथपत्र का भी उल्लेख किया। बोर्ड ने बताया कि नवंबर 2025 में नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी 'स्मार्ट मार्ट स्टोर्स' से 4,63,563 रुपए का पर्यावरणीय मुआवजा वसूला जा चुका है।

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस राशि का इस्तेमाल मावीकलां से अलीपुर गांव के बीच 5 किलोमीटर के बांध क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पौधारोपण के लिए किया जाए। यूपीपीसीबी को जल्द ही इस पौधारोपण की प्रगति रिपोर्ट भी कोर्ट में सौंपनी होगी।

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पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान पर सख्त रुख अपनाते हुए एनजीटी ने खनन निदेशक और बागपत के जिलाधिकारी को आदेश दिया है कि वे 'माइन क्लोजर प्लान' के तहत आवंटित फंड का उपयोग कर अवैध खदानों को तुरंत बंद करने की प्रक्रिया पूरी करें।

साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर इस काम में खर्च होने वाली राशि की वसूली दोषी खनिकों से की जाए। प्रशासन को इस पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले कोर्ट में दाखिल करनी होगी।

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