

दो पर्यावरणीय मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप ने नदी संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े गंभीर सवालों को सामने रखा है।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में यमुना नदी के बहाव क्षेत्र में कथित अवैध मोरंग खनन और नदी की धारा को प्रभावित करने के आरोपों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार, प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जवाब मांगा है।
आरोप है कि कई खदानों में नियमों की अनदेखी कर नदी के भीतर मशीनों से खनन किया गया, जिससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जैव विविधता और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा। एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को दो महीने में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
वहीं, तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित चिन्नावेदमपट्टी झील के पास प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को उचित राहत के लिए एनजीटी जाने की स्वतंत्रता दी है।
अदालत ने पहले स्पष्ट किया था कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना एसटीपी का संचालन नहीं किया जा सकता। दोनों मामले पर्यावरणीय संतुलन, जल स्रोतों की सुरक्षा और नियामकीय अनुपालन की अहमियत को रेखांकित करते हैं।
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में यमुना तट और जलधारा के बीच चल रहे कथित अवैध खनन के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।
ट्रिब्यूनल ने इस मामले को पर्यावरण और नदी के अस्तित्व के लिए बेहद गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और फतेहपुर के जिला प्रशासन से दो महीने के भीतर जवाब तलब किया है। इस मामले में अगली सुनवाई 7 सितंबर 2026 को होगी।
नदी की धारा रोककर निकाला जा रहा मोरंग
याचिका में आरोप लगाया गया है कि फतेहपुर जिले में पर्यावरण कानूनों और खनन नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हुए यमुना तट और सक्रिय जलधारा के भीतर मशीनों से मोरंग (रेत) का खनन किया जा रहा है। इससे नदी का प्राकृतिक स्वरूप बदल रहा है और आसपास के गांवों के पर्यावरण और जैव विविधता पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
याचिका के अनुसार, ललौली थाना क्षेत्र स्थित कोर्रा मोरंग खदान में यमुना की सक्रिय धारा से सीधे खनन किया जा रहा है। वहीं, किशुनपुर थाना क्षेत्र की संगोलीपुर मड़ियान खदान में भी नदी के भीतर बहाव क्षेत्र और किनारे मशीनों से खनन कर रेत निकाली जा रही है, जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो रहा है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि 2025 में ओती खदान में भी नियमों को ताक पर रखकर खनन किया गया था। इसकी शिकायत स्थानीय प्रशासन से की गई, लेकिन प्रशासन ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
सबसे गंभीर आरोप मंझिल गांव की खदान को लेकर लगाए गए हैं, जहां पट्टाधारक ने कथित रूप से अवैध खनन को आसान बनाने के लिए यमुना नदी की धारा को अस्थाई रूप से रोक दिया। इससे नदी का प्राकृतिक मार्ग बदल गया और पर्यावरण को व्यापक क्षति पहुंची। इन आरोपों के समर्थन में याचिकाकर्ता ने तस्वीरें भी ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत की हैं।
स्थानीय स्तर पर नहीं हुई कार्रवाई
याचिकाकर्ता ने बताया कि इन सभी मामलों की शिकायत स्थानीय प्रशासन से कई बार की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने 6 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश पर्यावरण विभाग के सचिव, खनन एवं भूविज्ञान निदेशक, फतेहपुर के जिलाधिकारी, जिला खनन अधिकारी तथा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर दो महीने के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
चिन्नावेदमपट्टी झील के पास एसटीपी निर्माण पर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, जानिए क्या है पूरा मामला
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले की उत्तरी तालुका में बन रहे 50 लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस मामले में कोर्ट ने याचिका का इस छूट के साथ निपटारा कर दिया है कि याचिकाकर्ता अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
इस याचिका में 30 मई 2025 को जल संसाधन विभाग द्वारा जारी सरकारी आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी। साथ ही, संबंधित अधिकारियों को चिन्नावेदमपट्टी झील या उसके आसपास सीवेज छोड़ने तथा एसटीपी के निर्माण और संचालन पर रोक लगाने की भी अपील की गई थी।
इससे पहले की सुनवाई में, हाईकोर्ट ने अधिकारियों से इस मामले पर जवाब मांगा था। साथ ही कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए थे कि तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) की अनुमति के बिना इस सीवेज प्लांट का संचालन नहीं किया जाएगा।
कोर्ट में क्या हुआ?
29 जून 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 6 मई 2026 को एसटीपी के संचालन के लिए सहमति (कंसेंट) प्रदान कर दी है।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कानून के अनुसार उचित राहत के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता दी जाए। अदालत ने यह अनुमति देते हुए याचिका का निपटान कर दिया है।