बारापुला नाले में सीवर टेपिंग पर गंभीर सवाल: जमीनी हकीकत और जल बोर्ड के दावों में बड़ा अंतर

दिल्ली जल बोर्ड की स्टेटस रिपोर्ट में जिन स्थानों पर सीवर टेपिंग पूरी होने का दावा किया गया था, वहां सर्वे में खुलेआम सीवर बहता मिला, जिससे दिल्ली जल बोर्ड के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर
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  • बारापुला नाले में सीवर टेपिंग को लेकर दिल्ली जल बोर्ड के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर सामने आया है।

  • दिल्ली जल बोर्ड की स्टेटस रिपोर्ट में जिन स्थानों को ट्रैप बताया गया था, वहां निजामुद्दीन वेस्ट एसोसिएशन द्वारा किए गए स्वतंत्र सर्वे में खुलेआम सीवर बहता मिला। इस मामले में एसोसिएशन ने एनजीटी में दाखिल हलफनामे में जल बोर्ड की रिपोर्ट को “गलत और भ्रामक” बताया है।

  • केवल तीन स्थानों की जांच में ही इतनी गड़बड़ी मिलने के बाद बाकी ट्रैपिंग पॉइंट्स की स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिससे ट्रिब्यूनल के सामने पेश की गई जानकारी की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हो गया है।

बारापुला नाले में सीवर को जाने से रोकने के दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिन स्थानों पर जल बोर्ड ने सीवर टेपिंग पूरी होने का दावा किया था, वहां की वास्तविक स्थिति इन दावों से बिल्कुल अलग पाई गई है।

निजामुद्दीन वेस्ट एसोसिएशन द्वारा 28 मार्च 2026 को दाखिल ऑब्जेक्शन एफिडेविट में कहा गया रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेज साफ दिखाते हैं कि दिल्ली जल बोर्ड द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दी गई जानकारी “गलत, भ्रामक और जमीनी स्थिति से मेल नहीं खाती” है। एसोसिएशन ने जिन तीन ट्रैपिंग पॉइंट्स का स्वतंत्र सर्वे किया, वहां जल बोर्ड के दावों के विपरीत खुलेआम सीवर बहता मिला। इससे आशंका पैदा हो गई है कि बाकी स्थानों पर भी इसी तरह की गड़बड़ियां हो सकती हैं।

क्या था दिल्ली जल बोर्ड का दावा?

गौरतलब है कि दिल्ली जल बोर्ड ने 1 जनवरी 2026 को अदालत में अपना हलफनामे/स्टेटस रिपोर्ट सबमिट की थी। इस रिपोर्ट में बारापुला नाले में गिरने वाले सभी सब-ड्रेन आउटफॉल को तय समयसीमा में ट्रैप करने की योजना दी गई थी, ताकि पक्का हो सके बिना ट्रीट हुआ सीवर बारापुला नाले में न जाए।

इसके पहले और सबसे जरूरी कदम के तौर पर जल बोर्ड ने “सोर्स पर ड्रेन टेपिंग” की नीति अपनाई, ताकि सीवर का गंदा पानी शुरुआत में ही स्टॉर्म वॉटर ड्रेन में जाने से रोका जा सके। डीजेबी के अनुसार, 15 ड्रेनों को सफलतापूर्वक ट्रैप किया जा चुका है। इसके बाद 20 मार्च 2026 की स्टेटस रिपोर्ट में दिल्ली जल बोर्ड ने दावा किया कि बारापुला नाला क्षेत्र में 17 ड्रेनों की टेपिंग हो चुकी है, जिससे अब बिना ट्रीट सीवर का पानी नदी तंत्र में नहीं जा रहा है।

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वहीं आवेदकों ने कहा कि उन्होंने ट्रैपिंग पॉइंट्स की वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्वतंत्र रूप से फील्ड सर्वे किया।

स्वतंत्र सर्वे में क्या मिला?

एफिडेविट में जानकारी दी गई है कि आवेदक दिल्ली जल बोर्ड द्वारा बताए 15 ट्रैपिंग पॉइंट्स में से केवल तीन का ही निरीक्षण कर सके। लेकिन इन तीनों स्थानों पर जो स्थिति मिली, वह जल बोर्ड की स्टेटस रिपोर्ट में किए गए दावों से पूरी तरह अलग थी। इससे ट्रिब्यूनल के सामने पेश की गई जानकारी की सटीकता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

रिपोर्ट में एक जनवरी 2026 की डीजेबी स्टेटस रिपोर्ट के आधार पर आवेदकों द्वारा किए गए स्वतंत्र सर्वे के निष्कर्ष विस्तार से बताए गए हैं।

सबसे पहले ए-ब्लॉक, वसंत विहार के मामले में दिल्ली जल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यहां “सीवर का कोई बहाव नहीं है, केवल बरसात में पानी आता है।“

लेकिन आवेदकों द्वारा 24 मार्च 2026 को ली गई तस्वीरों में साफ दिखा कि मार्च में, यानी बिना बारिश के भी, सीवर का पानी खुलेआम बह रहा था। नाले के पास कचरा या मलबा फेंकने से रोकने के लिए वहां कोई फेंसिंग या बैरियर भी नहीं लगा था। ऐसे में कचरा फेंकने की पूरी गुंजाइश बनी हुई है।

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दूसरा मामला नेहरू एकता कैंप, आर के पुरम का है। इस बारे में दिल्ली जल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यहां की ड्रेन “डीजेबी की सीवर लाइन में ट्रैप” कर दी गई है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग मिली। 24 मार्च 2026 को फील्ड निरीक्षण के दौरान ली गई तस्वीरों में साफ दिखा कि सीवर का पानी अब भी खुलेआम नाले में बह रहा है।

तीसरा मामला वसंत विहार के कूली कैंप का है। जल बोर्ड ने इस बारे में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यह ड्रेन भी “डीजेबी सीवर लाइन में ट्रैप” कर दी गई है।

लेकिन जांच में पाया गया कि कम्युनिटी टॉयलेट का सीवर सीधे नाले में गिर रहा है। हालांकि नाले के किनारे बनाई गई दीवार से कचरा फेंकना कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन कई जगह दीवार टूटी हुई है या ग्रिल फेंसिंग नहीं है, जिसके कारण उन जगहों पर अब भी कचरा नाले में डाला जा रहा है।

ऐसे में तीन स्थानों पर ही जल बोर्ड के दावों और जमीनी हकीकत में इतना अंतर मिलने के बाद बाकी ट्रैपिंग पॉइंट्स की स्थिति पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। आवेदकों का कहना है कि इससे ट्रिब्यूनल के सामने पेश की गई जानकारी की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा होता है।

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