बांध ने बदली रावी की रफ्तार, पांच गुना सिमट गया नदी का जलक्षेत्र

आईआईटी गांधीनगर के अध्ययन में पाया गया कि रणजीत सागर बांध के बाद रावी नदी के प्राकृतिक बहाव में बड़ा बदलाव आया है
बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।
बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on: 
सारांश
  • आईआईटी गांधीनगर के अध्ययन में खुलासा, रणजीत सागर बांध के बाद रावी नदी के प्राकृतिक बहाव में बड़ा बदलाव आया।

  • रावी नदी का मध्यिका जलप्रवाह 296 से घटकर 221 घन मीटर प्रति सेकंड रह गया, करीब 25 फीसदी की गिरावट।

  • बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।

  • नदी में पानी का फैलाव घटने से बाढ़ क्षेत्र के कई हिस्सों में घास और झाड़ियों की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

  • शोधकर्ताओं ने नदी बचाने के लिए प्राकृतिक जलप्रवाह, गाद के परिवहन, बाढ़ क्षेत्रों और रेत खनन पर नियंत्रण को जरूरी बताया।

नदी को स्वस्थ मानने के लिए अक्सर दो चीजें काफी समझी जाती हैं - बहता हुआ पानी और दोनों किनारों पर हरियाली। लेकिन नदी की असली सेहत इससे कहीं ज्यादा गहरी है। पानी कितना बह रहा है, किस मौसम में बह रहा है, अपने साथ कितनी गाद और रेत ले जा रहा है और बाढ़ के दौरान आसपास के मैदानों तक कितना फैल रहा है - ये सभी बातें नदी के जीवन का हिस्सा हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर (आईआईटीजीएन) के शोधकर्ताओं ने रावी नदी पर किए गए एक अध्ययन में इसी बदलती सेहत की पड़ताल की है। अध्ययन के मुताबिक, रणजीत सागर बांध (थीन बांध) के निर्माण और संचालन के बाद नदी के बहाव और उसके बाढ़ क्षेत्र में पानी की उपलब्धता में बड़ा बदलाव आया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नदी के सतही जल का क्षेत्रफल करीब पांच गुना घट गया।

बांध से बदली नदी की चाल

रणजीत सागर बांध जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सीमा पर रावी नदी पर बनाया गया है। इसका उद्देश्य सिंचाई, बिजली उत्पादन और पानी की उपलब्धता को नियंत्रित करना है। बांध इंसानी जरूरतों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन नदी के प्राकृतिक व्यवहार पर इनका असर भी पड़ता है। यह अध्ययन नेक्स्ट सस्टेनेबिलिटी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

बांध पानी को रोकते और नियंत्रित तरीके से छोड़ते हैं। इससे नदी में आने वाली बाढ़ और कम पानी वाले मौसम का प्राकृतिक क्रम बदल सकता है। इतना ही नहीं, बांध के जलाशय में रेत और गाद का बड़ा हिस्सा जमा हो जाता है। नतीजतन, नीचे की ओर बहने वाली नदी को पहले जितनी तलछट नहीं मिलती। इससे नदी की गहराई, चौड़ाई और बहाव का रास्ता तक बदल सकता है।

यह भी पढ़ें
सूखती नदियों की नई कहानी: पानी बांटने का सही तरीका बचा सकता है सबकी प्यास
बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।

25 फीसदी घटा पानी का बहाव

आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने 1980 से 2019 तक के दैनिक जलप्रवाह के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसके साथ करीब तीन दशकों की उपग्रह तस्वीरों की मदद से नदी और उसके बाढ़ क्षेत्र में पानी तथा वनस्पति के बदलाव को समझा।

अध्ययन में अप्रैल और मई के महीनों को खास तौर पर चुना गया, ताकि मानसून से जुड़ा अतिरिक्त पानी विश्लेषण को प्रभावित न करे।

आंकड़े बताते हैं कि 1980 से 2000 के दौरान रावी का औसत मध्यिका जलप्रवाह 296 घन मीटर प्रति सेकंड था। 2001 से 2019 के बीच यह घटकर 221 घन मीटर प्रति सेकंड रह गया। यानी नदी के बहाव में करीब 25 फीसदी की कमी आई।

पांच गुना सिकुड़ा जलक्षेत्र

उपग्रह तस्वीरों ने नदी में आए बदलाव की एक और गंभीर तस्वीर दिखाई। 1992 और 1998 की तस्वीरों में बाढ़ क्षेत्र में पानी का फैलाव काफी स्पष्ट था। लेकिन 2003, 2009 और 2019 की तस्वीरों में पानी का यह नेटवर्क काफी कम दिखाई दिया।

यह भी पढ़ें
तपते पहाड़: हिमालयी नदियां बदल रही हैं अपनी दिशा, भारी जान-माल के नुकसान की आशंका
बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।

अध्ययन के मुताबिक, सतही जल का अनुमानित औसत क्षेत्रफल 17.35 वर्ग किलोमीटर से घटकर महज 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया। यह करीब 80 फीसदी की गिरावट है।

इसका असर केवल नदी तक सीमित नहीं रह सकता। बाढ़ के पानी पर निर्भर कृषि भूमि, आर्द्रभूमियों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी यह चिंता का विषय है। हालांकि, अध्ययन ने कृषि पर वास्तविक प्रभाव का प्रत्यक्ष आकलन नहीं किया।

पानी घटा, घास और झाड़ियां बढ़ीं

अध्ययन का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिन हिस्सों में सक्रिय जल क्षेत्र घटा, वहां वनस्पति बढ़ती दिखाई दी। पहली नजर में यह अच्छी खबर लग सकती है। लेकिन नदी के बाढ़ क्षेत्र में हरियाली का बढ़ना हमेशा बेहतर पर्यावरण का संकेत नहीं होता।

जब नदी का पानी बार-बार आसपास के मैदानों में नहीं पहुंचता, तो वहां घास, झाड़ियां और दूसरे पौधे आसानी से उगने लगते हैं। इससे बाढ़ क्षेत्र धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है और नदी से उसका जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है।

यह भी पढ़ें
नदियां बन रही हैं ग्रीनहाउस गैसों का नया स्रोत: वैज्ञानिकों की चेतावनी
बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।

शोधकर्ताओं ने इसे एक पगडंडी के उदाहरण से समझाया है। जिस रास्ते पर लोगों का आना-जाना बंद हो जाता है, वहां धीरे-धीरे घास उग आती है। बाद में उस रास्ते पर चलना भी मुश्किल हो जाता है। बाढ़ क्षेत्र के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है।

रेत खनन ने बढ़ाई चुनौती

शोध में रेत खनन और दूसरी मानवीय गतिविधियों के असर को भी देखा गया। उच्च गुणवत्ता वाली उपग्रह तस्वीरों की मदद से कृत्रिम गड्ढों और नदी के रास्ते में हुए बदलावों की पहचान की गई। हालांकि, पूरे बाढ़ क्षेत्र में ये बदलाव एक जैसे नहीं थे।

शोधकर्ताओं का कहना है कि नदी की सेहत सुधारने के लिए केवल पानी की मात्रा पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। पानी का प्राकृतिक बहाव, तलछट का परिवहन, जमीन के इस्तेमाल और रेत खनन जैसे पहलुओं को एक साथ समझना होगा।

नदी को सिर्फ पानी नहीं, उसका प्राकृतिक प्रवाह भी चाहिए

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि बांधों से मिलने वाले लाभ और नदी की पारिस्थितिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। इसके लिए बांधों से पर्यावरण के अनुकूल जलप्रवाह बनाए रखना, तलछट के बहाव को समझना, अनियंत्रित रेत खनन पर रोक लगाना और बाढ़ क्षेत्रों का संरक्षण करना अहम होगा।

यह भी पढ़ें
रिसते भूजल से बेहिसाब मात्रा में निकल रही हैं ग्रीनहाउस गैसें: शोध
बांध बनने के बाद नदी का सतही जलक्षेत्र 17.35 से घटकर 3.46 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी पांच गुना कमी।

रावी की कहानी दुनिया की कई नदियों की कहानी भी है। कोलोराडो, मेकांग, मरे और यांग्त्जी जैसी नदियां भी बांधों, तलछट के दोहन और जमीन के बदलते इस्तेमाल की चुनौतियों से जूझ रही हैं।

संदेश साफ है- नदी को बचाने के लिए सिर्फ उसके पानी को बचाना काफी नहीं। नदी को नदी बने रहने देना भी जरूरी है।