तपते पहाड़: हिमालयी नदियां बदल रही हैं अपनी दिशा, भारी जान-माल के नुकसान की आशंका

हिमालय में बढ़ते तापमान से नदियों का बहाव अस्थिर, ग्लेशियर पिघलने और जमीन कमजोर होने से नदियों के रास्ते तेजी से बदल रहे हैं
वैज्ञानिकों ने पाया कि हिमालयी नदियों का बहाव पिछले 40 वर्षों में अधिक तेज और अनिश्चित हो गया है
वैज्ञानिकों ने पाया कि हिमालयी नदियों का बहाव पिछले 40 वर्षों में अधिक तेज और अनिश्चित हो गया हैफोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • हिमालयी नदियां तेजी से अपना रास्ता बदल रही हैं, ग्लेशियर पिघलने और तापमान बढ़ने से नदी प्रवाह अस्थिर हो रहा है

  • वैज्ञानिकों ने पाया कि हिमालयी नदियों का बहाव पिछले 40 वर्षों में अधिक तेज और अनिश्चित हो गया है

  • ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय में बर्फ पिघलने और जमीन कमजोर होने से नदियां अधिक कटाव और बाढ़ पैदा कर रही हैं

  • अध्ययन में खुलासा हुआ कि हिमालयी नदियां अचानक अपना मार्ग बदल रही हैं, जिससे आसपास के क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं

  • हिमालयी नदी प्रणाली में अस्थिरता बढ़ी है, जिससे नीचे के क्षेत्रों में बाढ़, कटाव और ढांचागत नुकसान का खतरा बढ़ा

हिमालय केवल ऊंचे पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह एशिया की बड़ी नदियों का स्रोत भी है। यहां की बर्फ, ग्लेशियर और जमी हुई जमीन धीरे-धीरे पिघलकर नदियों को पानी देती है। इन नदियों पर भारत, नेपाल, भूटान, चीन और बांग्लादेश जैसे देशों के करीब दो अरब लोग निर्भर हैं। खेती, पीने का पानी, बिजली उत्पादन और उद्योग सब कुछ इन नदियों से जुड़ा है। इसलिए हिमालयी नदियों का स्थिर रहना बहुत जरूरी माना जाता है।

नए अध्ययन में बड़ा खुलासा

हाल ही में “साइंस” नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में यह पाया गया है कि पिछले 40 वर्षों में हिमालयी नदियां तेजी से अपनी धाराएं बदल रही हैं। यह अध्ययन 1980 से 2020 तक उपग्रह तस्वीरों और जमीन पर किए गए निरीक्षणों के आधार पर किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, नदियों का रास्ता भी अधिक तेजी से बदल रहा है।

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नदियों की बदलती चाल

अध्ययन में 1000 से अधिक नदी मोड़ों का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि नदियों का बहाव पहले की तुलना में लगभग एक-तिहाई अधिक तेज हो गया है। कुछ जगहों पर नदियां अपने पुराने रास्ते छोड़कर नया रास्ता बना रही हैं। कई बार नदी अचानक अपनी दिशा बदल लेती है और नया चैनल बना लेती है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक “अवुल्शन” कहते हैं। इसके अलावा कई जगह नदी अपने घुमावदार हिस्सों को काटकर छोटा रास्ता बना लेती है, जिससे बाढ़ और कटाव बढ़ जाता है

तापमान बढ़ने का असर

हिमालय में तापमान दुनिया के औसत से लगभग दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। इसके कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और जमीन के अंदर जमी हुई बर्फ भी कमजोर हो रही है। इससे नदियों में अधिक पानी और गाद (रेत और मिट्टी) आने लगा है। पानी और गाद की यह बढ़ोतरी नदियों की ताकत को बढ़ाती है, जिससे वे अपने किनारों को आसानी से काटने लगती हैं।

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नदी किनारों का कमजोर होना

जब जमीन में जमी हुई बर्फ पिघलती है, तो नदी किनारे कमजोर हो जाते हैं। इससे नदियों का बहाव स्थिर नहीं रहता और वे आसानी से अपनी दिशा बदल लेती हैं। हिमालय के कई हिस्सों में पेड़-पौधों की कमी भी है, जिससे मिट्टी और भी जल्दी बह जाती है। इसके कारण नदी किनारे टूटने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

आर्कटिक क्षेत्र से तुलना

वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि हिमालयी नदियां आर्कटिक क्षेत्रों की नदियों से अलग व्यवहार कर रही हैं। आर्कटिक में कुछ पौधे नदी किनारों को स्थिर रखते हैं, लेकिन हिमालय में ऊंचाई वाले इलाकों में वनस्पति बहुत कम है। इसलिए यहां नदी किनारे अधिक कमजोर हैं और बदलाव तेजी से होता है।

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नीचे के इलाकों पर खतरा

हिमालयी नदियों का यह बदलता स्वरूप नीचे के इलाकों के लिए खतरा बन सकता है। इससे बाढ़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं, खेत बह सकते हैं, सड़कें और पुल टूट सकते हैं और गांवों को नुकसान हो सकता है। नदी के साथ आने वाली अधिक मिट्टी और पत्थर जलविद्युत परियोजनाओं और बांधों के लिए भी समस्या पैदा कर सकते हैं।

भविष्य की चुनौती

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति आगे और गंभीर हो सकती है यदि जलवायु परिवर्तन की गति ऐसे ही बढ़ती रही। इसलिए जरूरी है कि नदियों के बदलते व्यवहार को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाएं। पुल, सड़क, बांध और बस्तियों की योजना बनाते समय यह समझना होगा कि नदियां अब पहले की तरह स्थिर नहीं रहीं।

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यह अध्ययन बताता है कि हिमालयी नदियां अब जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से बदल रही हैं। यह बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समय रहते सावधानी और योजना बनाना बहुत जरूरी हो गया है।

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