

हिमस्खलन केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रशासन और समुदाय की तैयारी से जान और संपत्ति सुरक्षित रखी जा सकती है।
ब्लैटन में समय पर चेतावनी और निकासी ने बड़े हिमस्खलन के बावजूद जान-माल का नुकसान कम किया।
चमोली में तैयारी और चेतावनी की कमी के कारण समान हिमस्खलन से भारी जनहानि हुई।
जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर अस्थिरता हिमालय में हिमस्खलन की घटनाओं को तेजी और अप्रत्याशित बना रही है।
सतर्क प्रशासन, स्थानीय निवासियों की जागरूकता से हिमस्खलन जैसी आपदाओं को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।
हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय शोध में कहा गया है कि हिमालय जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाले हिमस्खलन के हादसे केवल उनकी ताकत या आकार पर निर्भर नहीं करते। बल्कि ये काफी हद तक सतर्कता और निगरानी प्रणाली पर भी निर्भर करते हैं। शोध में यह दिखाया गया है कि यदि प्रशासन और स्थानीय निवासी समय से तैयार हों और सही चेतावनी प्रणाली मौजूद हो, तो बड़े जानलेवा हिमस्खलन से भी बचा जा सकता है।
कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरमेंट पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में दो बड़े हिमस्खलनों की तुलना की गई। पहला हिमस्खलन 2021 में भारत के चमोली जिले में हुआ, जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए। दूसरा हिमस्खलन 2025 में स्विट्जरलैंड के ब्लैटन गांव में आया।
ब्लैटन का हिमस्खलन चमोली जितना बड़ा और खतरनाक था, लेकिन वहां जान-माल का नुकसान बहुत कम हुआ। दोनों घटनाओं का रूप लगभग समान था, लेकिन परिणामों में बड़ा अंतर था। शोधकर्ताओं ने पाया कि इसका मुख्य कारण सतर्कता और तैयारी का स्तर था।
ब्लैटन में स्थानीय प्रशासन और समुदाय पहले से ही हिमस्खलन के खतरे को समझकर तैयार थे। वहां लगातार ढलानों की निगरानी की जाती थी और स्पष्ट निकासी योजनाएं बनाई गई थीं। वहां के निवासियों को समय-समय पर चेतावनी और जानकारी दी जाती थी।
जब खतरे के संकेत बढ़े, तो प्रशासन तुरंत निकासी प्रक्रिया शुरू कर सका और अधिकांश लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंच गए। इसके विपरीत, चमोली में ऐसी कोई निगरानी या तैयारी नहीं थी। प्रशासन और स्थानीय लोग चेतावनी संकेतों को नहीं पहचान पाए और कोई स्पष्ट निकासी योजना भी नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि वहां भारी जनहानि हुई।
शोध में कहा गया है कि पर्वतीय आपदाएं केवल प्राकृतिक घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि यह प्रशासन और शासन प्रणाली की परीक्षा भी होती हैं। चमोली की घटना ने दिखाया कि चेतावनी को नजरअंदाज करने से क्या परिणाम हो सकते हैं, जबकि ब्लैटन ने यह सिद्ध किया कि सही तैयारी से सबसे खतरनाक घटनाओं से भी लोगों को बचाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, पर्माफ़्रोस्ट यानी स्थायी जमी मिट्टी कमजोर हो रही है और अत्यधिक बारिश जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे हिमालयी ढलान और ग्लेशियर वाले इलाकों में बड़े हिमस्खलन और बर्फ-पत्थर की चोटियां अस्थिर हो रही हैं और हिमस्खलन अधिक बार और अप्रत्याशित रूप से होने लगे हैं। लेकिन अभी भी हिमालय में आपदा प्रबंधन प्रणाली पुराने तरीकों पर आधारित है, जो तेजी से बदलते खतरे के अनुरूप नहीं हैं।
शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि हिमस्खलन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए प्रशासन और स्थानीय निवासियों को पहले से तैयार रहना होगा। इसका मतलब है कि खतरों की पहचान की जाए, निगरानी प्रणाली स्थापित की जाए, लोगों को चेतावनी और शिक्षा दी जाए, और आपातकालीन निकासी की स्पष्ट योजना हो।
स्थानीय अधिकारियों को अधिकार होना चाहिए कि खतरे की स्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सकें। इसके अलावा, समुदाय को भी पूर्व तैयारी, अभ्यास और जागरूकता के माध्यम से सतर्क रखा जाए।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि हिमालय में कई आपदाएं जानलेवा नहीं बननी चाहिए। यदि प्रशासन और समुदाय समय पर सतर्क और तैयार रहें, तो बड़े हिमस्खलन भी सुरक्षित तरीके से पार किए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि तैयारी की लागत किसी बड़ी आपदा के नुकसान की तुलना में बहुत कम है।
इस शोध से यह साबित होता है कि हिमालय और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक घटनाओं का आकार यह तय नहीं करता कि वे जानलेवा होंगी या नहीं। असली अंतर तय करता है कि प्रशासन और स्थानीय लोग कितने सतर्क और तैयार हैं। यदि चेतावनी प्रणाली, निगरानी और तैयारी मजबूत हो, तो बड़े हिमस्खलन भी केवल एक प्राकृतिक घटना रह सकते हैं, जो मानव जीवन और संपत्ति के लिए खतरा नहीं बनती।
इसलिए अब यह समय है कि हिमालयी राज्य, विकास सहयोगी और स्थानीय समुदाय मिलकर सतर्कता और आपदा-प्रबंधन को अपनाएं। हिमस्खलन के खतरे को केवल प्राकृतिक घटना न मानकर, इसे सही तैयारी और प्रशासनिक रणनीति के साथ नियंत्रित किया जा सकता है।