सूखती नदियों की नई कहानी: पानी बांटने का सही तरीका बचा सकता है सबकी प्यास

सूखे में नदियों का पानी बांटने की नई तरकीब, दक्षिण कोरिया के अध्ययन में खुलासा, सही प्रबंधन से बढ़ेगा आर्थिक लाभ, किसानों को मुआवजा देकर सबकी प्यास बुझाने की उम्मीद
पानी बचाने वाले किसानों और उद्योगों को आर्थिक मुआवजा देकर सहयोग बढ़ाया जा सकता है और जल संकट का असर घटाया जा सकता है।
पानी बचाने वाले किसानों और उद्योगों को आर्थिक मुआवजा देकर सहयोग बढ़ाया जा सकता है और जल संकट का असर घटाया जा सकता है।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on: 
सारांश
  • सूखे के दौरान नदी के पानी का न्यायपूर्ण बंटवारा करने से किसानों, उद्योगों और आम लोगों को राहत मिल सकती है।

  • दक्षिण कोरिया की योंगसान नदी पर हुए अध्ययन में पानी प्रबंधन की नई व्यवस्था से आर्थिक लाभ बढ़ने के संकेत मिले।

  • नदी के ऊपरी हिस्से में पानी की कटौती करने से निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को बेहतर जलापूर्ति मिल सकती है।

  • पानी बचाने वाले किसानों और उद्योगों को आर्थिक मुआवजा देकर सहयोग बढ़ाया जा सकता है और जल संकट का असर घटाया जा सकता है।

  • बढ़ती पानी की मांग और गंभीर सूखे के बीच सफल जल प्रबंधन के लिए निगरानी, स्पष्ट नियम और आपसी सहयोग बेहद जरूरी हैं।

नदी बहती है तो खेतों में हरियाली मुस्कुराती है, कारखानों के पहिए घूमते हैं और घरों के नलों से पानी आता है। लेकिन जब सूखा पड़ता है, तो यही नदी सबकी जरूरतें पूरी करने में कमजोर पड़ने लगती है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पानी कम हो, तो किसे कितना पानी मिले? क्या नदी के किनारे पहले से मौजूद

लोग ज्यादा पानी ले लें और दूर बैठे लोगों के हिस्से में केवल इंतजार आए?

‘वॉटर रिसोर्सेज रिसर्च’ पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस समस्या का दिलचस्प समाधान सुझाया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पानी की कमी से लड़ने के लिए केवल खपत घटाना काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि पानी का बंटवारा समझदारी और इंसाफ के साथ हो।

ऊपर वालों की सुविधा, नीचे वालों की परेशानी

नदी का पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है। ऐसे में नदी के ऊपरी हिस्से में रहने वाले किसान और उद्योग आसानी से पानी निकाल सकते हैं। अगर वे अपने तय अधिकार के अनुसार लगातार पानी लेते रहें, तो नीचे की ओर बसे लोगों तक पहुंचते-पहुंचते नदी का पानी काफी कम हो सकता है।

कागजों पर पानी बांटने के नियम भले ही बराबरी की बात करें, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग हो सकती है। जिसे पानी तक पहले पहुंच मिलती है, वह अपनी जरूरत पूरी कर लेता है, जबकि दूसरे लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है। सूखे के दिनों में यह असमानता और भी गंभीर हो जाती है।

यह भी पढ़ें
तपते पहाड़: हिमालयी नदियां बदल रही हैं अपनी दिशा, भारी जान-माल के नुकसान की आशंका
पानी बचाने वाले किसानों और उद्योगों को आर्थिक मुआवजा देकर सहयोग बढ़ाया जा सकता है और जल संकट का असर घटाया जा सकता है।

दक्षिण कोरिया की नदी से मिला नया रास्ता

इस समस्या को समझने के लिए अमेरिका की नॉर्थ कैरोलाइना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दक्षिण-पश्चिम दक्षिण कोरिया के योंगसान नदी बेसिन का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने करीब 30 वर्षों के आंकड़ों का कंप्यूटर मॉडल के जरिए विश्लेषण किया।

उन्होंने दो स्थितियों की तुलना की। पहली स्थिति में नदी से पानी लेने वाले लोग अपनी तय सीमा तक पानी निकालते रहे। दूसरी स्थिति में सूखे की गंभीरता बढ़ने के साथ पानी निकालने पर पाबंदियां भी सख्त होती गईं।

इस व्यवस्था में नदी के ऊपरी और बीच के हिस्सों में पानी लेने वालों को ज्यादा कटौती करनी पड़ सकती थी, ताकि नीचे रहने वाले लोगों तक भी पर्याप्त पानी पहुंच सके। बेहद गंभीर हालात में पानी निकालने पर पूरी तरह रोक लगाने का विकल्प भी मॉडल में शामिल था।

पानी बचाने वालों को मिलेगा मुआवजा?

अब सवाल यह है कि अगर किसी किसान या उद्योग से पानी कम इस्तेमाल करने को कहा जाए, तो वह ऐसा क्यों करेगा? पानी कम मिलने का मतलब फसल का नुकसान, उत्पादन में कमी और कमाई पर असर भी हो सकता है।

यह भी पढ़ें
नदियां बन रही हैं ग्रीनहाउस गैसों का नया स्रोत: वैज्ञानिकों की चेतावनी
पानी बचाने वाले किसानों और उद्योगों को आर्थिक मुआवजा देकर सहयोग बढ़ाया जा सकता है और जल संकट का असर घटाया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने इस चुनौती का भी रास्ता तलाशा। उन्होंने जांचा कि क्या पानी के बेहतर बंटवारे से होने वाला अतिरिक्त आर्थिक फायदा उन लोगों को मुआवजा देने के लिए पर्याप्त हो सकता है, जिन्हें अपने इस्तेमाल में कटौती करनी पड़ेगी।

अध्ययन के मॉडल में नई व्यवस्था लागू करने से कुल आर्थिक लाभ करीब 40 लाख डॉलर बढ़ गया। हालांकि इस फायदे का बंटवारा सभी लोगों के बीच बराबर नहीं था। नदी के नीचे रहने वालों को बेहतर जलापूर्ति से लाभ मिला, जबकि ऊपर के कुछ उपयोगकर्ताओं को नुकसान उठाना पड़ सकता था।

ऐसे में पानी के शुल्क में छूट देना या गंभीर सूखे के दौरान आर्थिक सहायता देना उपयोगी उपाय हो सकते हैं। यानी जो लोग दूसरों के लिए पानी बचाएं, उन्हें भी कुछ राहत मिले। इससे सहयोग करना मजबूरी नहीं, बल्कि फायदे का सौदा बन सकता है।

हर किसी को बराबर देना ही समाधान नहीं

अध्ययन की एक अहम सीख यह भी है कि पानी का बंटवारा बिल्कुल बराबर कर देना हमेशा सबसे अच्छा रास्ता नहीं होता। अगर कुछ किसानों या उद्योगों पर जरूरत से ज्यादा पाबंदियां लगा दी जाएं, तो उनके लिए सहयोग करना मुश्किल हो सकता है।

यह भी पढ़ें
रिसते भूजल से बेहिसाब मात्रा में निकल रही हैं ग्रीनहाउस गैसें: शोध
पानी बचाने वाले किसानों और उद्योगों को आर्थिक मुआवजा देकर सहयोग बढ़ाया जा सकता है और जल संकट का असर घटाया जा सकता है।

इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें नीचे रहने वालों को पानी मिले, ऊपर के लोगों पर भी अनुचित बोझ न पड़े और नदी से मिलने वाला कुल आर्थिक लाभ बना रहे। सही संतुलन ही इस व्यवस्था की असली ताकत है।

रास्ता अच्छा, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अगर पानी की मांग बढ़ जाए और कृषि जलाशयों से कम पानी छोड़ा जाए, तो आपसी सहयोग बनाए रखना कठिन हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में पानी बचाने वालों को मुआवजा देने के लिए पर्याप्त अतिरिक्त आर्थिक लाभ भी नहीं बचता।

फिलहाल यह अध्ययन कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है। असल जिंदगी में किसान और उद्योग ऐसी पाबंदियां स्वीकार करेंगे या नहीं, मुआवजे का पैसा कहां से आएगा और पानी के इस्तेमाल की निगरानी कैसे होगी, इन सवालों के जवाब अभी तलाशने बाकी हैं।

फिर भी संदेश साफ है। पानी की कमी से निपटने के लिए सिर्फ नल बंद करना या खपत घटाना ही काफी नहीं। जरूरत इस बात की भी है कि पानी सब तक पहुंचाने के नियम निष्पक्ष हों और लोग एक-दूसरे का साथ देने के लिए तैयार हों। आखिर नदी किसी एक की नहीं होती। उसका पानी तभी सबके काम आएगा, जब उसे लेने का हक निभाने के साथ दूसरों की जरूरत का भी ख्याल रखा जाएगा।