

नदियों का तापमान बढ़ने और ऑक्सीजन घटने से वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है।
कृषि और शहरी प्रदूषण से नदियों में सूक्ष्मजीव सक्रिय होकर कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड पैदा कर रहे हैं।
किट वैज्ञानिकों के अनुसार 2002 से 2022 तक नदियों से लगभग 1.5 अरब टन सीओ2 के बराबर गैसें उत्सर्जित हुईं।
मशीन लर्निंग और सैटेलाइट डेटा से 5,000 से अधिक नदी बेसिनों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का वैश्विक विश्लेषण किया गया।
प्रदूषण घटाकर और जल प्रबंधन सुधारकर नदियों को फिर से स्वस्थ बनाकर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।
जर्मनी के कार्ल्सरूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (किट) के वैज्ञानिकों ने एक नई रिसर्च में बताया है कि दुनिया भर की नदियां अब सिर्फ पानी का स्रोत या जीवन का आधार नहीं रह गई हैं, बल्कि वे धीरे-धीरे ग्रीनहाउस गैसों का एक बड़ा स्रोत बनती जा रही हैं। यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। शोध में पाया गया है कि पिछले 20 सालों में नदियों का तापमान बढ़ा है, उनमें ऑक्सीजन कम हुई है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ा है।
नदियों पर बढ़ता दबाव
नदियां मानव जीवन और प्रकृति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। वे न केवल पीने के पानी का स्रोत हैं, बल्कि खेती, उद्योग और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित करती हैं। लेकिन अब कृषि, उद्योग और शहरों से आने वाला प्रदूषण नदियों पर भारी दबाव डाल रहा है। शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि नदियां अब जलवायु परिवर्तन में भी अहम भूमिका निभा रही हैं और वे खुद एक बड़ी समस्या बनती जा रही हैं।
कैसे बनती हैं ग्रीनहाउस गैसें
नदियों में जब खेतों से उर्वरक, गंदा पानी और जैविक कचरा मिलता है, तो उसमें मौजूद कार्बन और पोषक तत्व छोटे-छोटे सूक्ष्मजीवों द्वारा टूटते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें बनती हैं। ये सभी गैसें वातावरण में गर्मी बढ़ाती हैं और ग्लोबल वार्मिंग को तेज करती हैं। गर्म पानी में यह प्रक्रिया और भी तेजी से होती है, जिससे समस्या और बढ़ जाती है।
नई तकनीक से मिला वैश्विक विश्लेषण
इस शोध में वैज्ञानिकों ने पहली बार दुनिया भर की नदियों की स्थिति का इतने बड़े स्तर पर अध्ययन किया है। उन्होंने 1,000 से अधिक नदियों से मिले आंकड़ों का उपयोग किया और उपग्रह (सैटेलाइट) से मिली जानकारी को भी जोड़ा। इसके बाद मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से उन इलाकों का भी विश्लेषण किया गया जहाँ सीधे आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। इस तरह 2002 से 2022 तक का पूरा वैश्विक डेटा तैयार किया गया।
नदियों में तेजी से हो रहे बदलाव
अध्ययन में पाया गया कि दुनिया भर की नदियों में कई बड़े बदलाव हो रहे हैं। पानी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जबकि ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही है। इसका सीधा असर जलजीवों और पूरी नदी प्रणाली पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, नदियों में ऑक्सीजन की कमी हर दशक में तेजी से बढ़ रही है, जो झीलों और महासागरों की तुलना में भी अधिक है।
इसके साथ ही नदियों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी लगातार बढ़ रही है। यह एक गंभीर संकेत है कि नदियां अब जलवायु परिवर्तन में योगदान देने लगी हैं।
कितना बड़ा है असर
शोध के अनुसार, 2002 से 2022 के बीच नदियों से लगभग 1.5 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित हुईं। यह मात्रा बहुत बड़ी है और इसे पहले वैश्विक ग्रीनहाउस गैस बजट में पूरी तरह शामिल नहीं किया गया था। इसका मतलब है कि वास्तविक जलवायु प्रभाव पहले से अधिक गंभीर हो सकता है।
कृषि और शहरीकरण मुख्य कारण
वैज्ञानिकों ने बताया कि जिन क्षेत्रों में कृषि और शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है, वहां नदियों की स्थिति सबसे अधिक खराब है। खेतों से बहकर आने वाले रसायन और शहरों का गंदा पानी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। इससे सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ जाती है और गैसों का उत्पादन तेज हो जाता है। इस तरह कई नकारात्मक प्रक्रियाएं एक साथ मिलकर नदियों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का केंद्र बना रही हैं।
समाधान की उम्मीद
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्थिति स्थायी नहीं है। यदि नदियों में प्रदूषण को कम किया जाए, रसायनों का उपयोग नियंत्रित किया जाए और जल प्रबंधन बेहतर किया जाए, तो नदियां फिर से स्वस्थ हो सकती हैं। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, नदियों की रक्षा करना वास्तव में जलवायु परिवर्तन से लड़ने का एक प्रभावी तरीका है।
यह अध्ययन हमें यह समझाता है कि नदियां केवल प्राकृतिक जल स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं। यदि उन्हें प्रदूषण से बचाया जाए, तो वे पृथ्वी को ठंडा रखने में मदद कर सकती हैं। लेकिन यदि उनका शोषण जारी रहा, तो वे जलवायु परिवर्तन को और तेज कर सकती हैं।