

एक नए वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि बढ़ता इंसानी शोर दुनिया भर में पक्षियों के जीवन पर गंभीर असर डाल रहा है।
ट्रैफिक, निर्माण कार्य, हवाई जहाजों और मशीनों की लगातार आवाज पक्षियों के संवाद, भोजन खोजने, खतरे पर प्रतिक्रिया और रहने की जगह चुनने की क्षमता को प्रभावित कर रही है।
शोध के अनुसार, शोर के कारण पक्षियों का व्यवहार प्रभावित होता है, वे अधिक सतर्क रहने लगते हैं और भोजन का समय घट जाता है, जिससे बच्चों की वृद्धि धीमी पड़ सकती है।
ध्वनि प्रदूषण उनके प्रजनन, अंडों की सुरक्षा और चूजों के जीवित रहने की संभावना को भी कम कर रहा है। साथ ही, तनाव हार्मोन में बदलाव से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घकालिक जीवन पर खतरा बढ़ता है।
अध्ययन में 150 से अधिक शोधों और 160 प्रजातियों के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर शोर प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो पक्षियों का कलरव और प्रकृति की चहचहाहट भविष्य में इंसानी शोर में गुम हो सकती है।
कभी सुबह के सन्नाटे में पक्षियों की चहचहाहट सुनकर लगता था कि प्रकृति बोल रही है। लेकिन अब शहरों का शोर इतना बढ़ गया है कि इनके बीच पक्षियों का कलरव धीरे-धीरे दबता जा रहा है। कारों के इंजन, हॉर्न, हवाई जहाजों की गड़गड़ाहट और मशीनों की लगातार आवाज अब सिर्फ इंसानों की परेशानी नहीं, बल्कि पक्षियों के लिए भी खतरा बन चुकी है।
पक्षियों के लिए आवाज केवल ध्वनि नहीं, बल्कि उनकी भाषा है, जो उन्हें खतरे का संकेत देती है और जीवन का रास्ता दिखाती है।
इस सम्बन्ध में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के नेतृत्व में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि ट्रैफिक, निर्माण और अन्य मानव गतिविधियों से होने वाला शोर पक्षियों के व्यवहार, शारीरिक गतिविधियों और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहा है। इस अध्ययन के नतीजे जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी बायोलॉजिकल साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने मेटा-विश्लेषण की मदद ली है। इसमें कई अलग-अलग शोधों के निष्कर्षों को जोड़कर यह समझने की कोशिश की गई कि शोर का पक्षियों पर कुल मिलाकर क्या असर पड़ता है।
गौरतलब है कि 1970 के बाद से पक्षियों की संख्या में बेहद तेज गिरावट दर्ज की गई है। अकेले उत्तरी अमेरिका में ही विभिन्न प्रजातियों के करीब 300 करोड़ प्रजनन योग्य पक्षी गायब हो चुके हैं। वैसे तो भूमि विकास, वन विनाश और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल जैसी मानव गतिविधियों का असर साफ दिखाई देता है, लेकिन यह नया अध्ययन दर्शाता है कि ध्वनि प्रदूषण भी पक्षियों के जीवन और उनके हमारे साथ टिके रहने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
कैसे शोर से बदल रहा पक्षियों का व्यवहार
अध्ययन में 1990 के बाद से प्रकाशित 150 से ज्यादा शोधों का विश्लेषण किया है, जिसमें छह महाद्वीपों और पक्षियों की 160 प्रजातियों को शामिल किया गया। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि शोर से उनके संवाद करने के तरीके, भोजन खोजने की क्षमता, आक्रामक व्यवहार, खतरे पर प्रतिक्रिया और यहां तक कि रहने के लिए स्थान चुनने की आदतें भी बदल जाती हैं।
निष्कर्ष पर प्रकाश डालते हुए अध्ययन से जुड़ी पमुख शोधकर्ता नताली मैडेन का कहना है, "इंसानी शोर पक्षियों के जीवन से जुड़े कई पहलुओं में बदलाव कर रहा है, और कुछ बदलाव सीधे तौर पर उनके जीवित रहने की क्षमता से जुड़े हैं।
नतीजे दर्शाते हैं कि कुछ पक्षी शोर भरे क्षेत्रों में ज्यादा जोर से गाते हैं या अपने सुर और समय में बदलाव करते हैं, ताकि उनकी आवाज सुनाई दे सके। लेकिन इसका असर सिर्फ गीतों तक सीमित नहीं रहता। शोर से उनका जोखिम भरा व्यवहार भी बदल जाता है। इस दौरान पक्षी ज्यादा सतर्क रहने लगते हैं, जिससे भोजन खोजने का समय कम हो जाता है। कम भोजन मिलने से खासकर छोटे बच्चों की वृद्धि धीमी पड़ सकती है।
शोध में पाया गया कि उनके भोजन से जुड़ा व्यवहार सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। कई पक्षी खाने के पास आने में ज्यादा समय लेते हैं या बार-बार खाना छोड़ देते हैं। तेज शोर वाले इलाकों में उनका आक्रामक व्यवहार भी बदल जाता है।
आवाज पर टिकी है पक्षियों की पूरी दुनिया
वैज्ञानिकों के मुताबिक, संवाद पर पड़ने वाला असर सबसे गंभीर है, क्योंकि पक्षियों की पूरी दुनिया आवाज पर टिकी होती है। आवाज ही उन्हें साथी खोजने, खतरे की चेतावनी देने और माता-पिता व बच्चों के बीच संपर्क बनाए रखने में मदद करती है।
नताली का इस बारे में कहना है “पक्षी ध्वनि संकेतों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहते हैं। वे गीतों से अपने साथी को ढूंढते हैं, आवाजों से शिकारी के बारे में चेतावनी देते हैं और चूजे भूख लगने पर माता-पिता को पुकारते हैं। लेकिन अगर वातावरण में लगातार तेज शोर हो, तो क्या वे अपनी ही प्रजाति के संकेतों को सुन पाएंगे?”
अध्ययन से पता चला है कि शोर सिर्फ पक्षियों के व्यवहार को ही नहीं बदलता, बल्कि उनके प्रजनन, विकास और स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डालता है। जिन इलाकों में शोर बहुत ज्यादा होता है, वहां अंडों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है, प्रजनन की सफलता घटती है और कई बार चूजों के उड़ने तक जीवित रहने की संभावना भी कम हो जाती है।
शोध में यह भी पाया गया कि शोर के कारण पक्षियों में हार्मोन के स्तर में बदलाव आने लगता है। कई अध्ययनों में तनाव से जुड़े हार्मोन, जैसे कॉर्टिकोस्टेरोन, को मापा गया। इन हार्मोनों का बढ़ना या घटना, दोनों ही पक्षियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता, शरीर की ऊर्जा प्रणाली और लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना को नुकसान पहुंचा सकता है।
युवा पक्षियों के लिए शोर और भी खतरनाक है। छोटे चूजे तेज आवाज वाले घोंसलों से भाग नहीं सकते। बचपन में मिलने वाला यह तनाव उनके विकास को प्रभावित कर सकता है और इसके प्रभाव वयस्क होने तक बने रह सकते हैं।
बढ़ रही नई चुनौतियां
शोर से पक्षियों का आवास चुनने का तरीका भी बदल जाता है। कई पक्षी शोर वाले इलाकों से दूर रहने लगते हैं या वहां घोंसले कम बनाते हैं। इससे वे नए क्षेत्रों में जाने को मजबूर हो सकते हैं, जहां उन्हें नई प्रतिस्पर्धा और नए खतरों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पक्षियों की सभी प्रजातियां शोर पर एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं देतीं। उनकी जीवनशैली और आवास यह तय करता है कि वे शोर से कितना प्रभावित होंगे।
घोंसले का प्रकार भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। जो पक्षी खुले घोंसले बनाते हैं, उनमें विकास और आवास स्थान बदलने के अलग असर दिखे, जबकि पेड़ों के खोखलों या बंद जगहों में घोंसला बनाने वाले पक्षियों पर प्रभाव कुछ अलग था। इसी तरह पक्षियों का आवास भी महत्वपूर्ण है। जो प्रजातियां पर्णपाती जंगलों, मिश्रित वनों या घास के मैदानों में रहती हैं, उनके हार्मोन में बदलाव अपेक्षाकृत कम देखे गए।
शोध में सामने आया है कि जो पक्षी पेड़ों के खोखलों या बंद जगहों में घोंसला बनाते हैं, उनमें खुले घोंसले बनाने वाले पक्षियों की तुलना में विकास पर नकारात्मक असर ज्यादा दिखा। इसी तरह, शहरों में रहने वाले पक्षियों में तनाव से जुड़े हार्मोन का स्तर आमतौर पर उन पक्षियों से अधिक पाया गया जो शहरी इलाकों से बाहर रहते हैं।
इसके अलावा, पक्षियों के भोजन से जुड़ी आदतें भी असर डालती हैं। उदाहरण के लिए जो पक्षी कई तरह का भोजन खा सकते हैं, वे भोजन का समय घटने पर भी बेहतर ढल जाते हैं, जबकि केवल एक खास भोजन पर निर्भर प्रजातियों के लिए यह ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
शोर को कम करना ही है बचाव
अध्ययन के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर नील कार्टर का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है कि "भले ही शोर पक्षियों के लिए कई तरह की समस्याएं पैदा कर रहा हो, लेकिन इस समझ को सकारात्मक बदलाव में बदला जा सकता है।"
उनके मुताबिक मेटा-विश्लेषण में सामने आया है कि शोर के प्रभाव कुछ हद तक अनुमानित हैं। और अगर हम इन प्रभावों का अनुमान लगा सकते हैं, तो हम उन्हें कम कर सकते हैं, रोक सकते हैं और कई मामलों में उलट भी सकते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है इससे बचाव के पहले ही तकनीकी समाधान मौजूद हैं। जैसे कि इमारतों में ऐसे मैटीरियल और तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं जो पक्षियों को खिड़कियों से टकराने से बचाती हैं, वैसे ही हम अपने शहरों और घरों को शोर कम करने के लिए ढाल सकते हैं।
कार्टर के अनुसार, “यह तकनीकी रूप से संभव है कि हम शोर को नियंत्रित करें। कई बार जैव विविधता के नुकसान बड़े और असंभव लगते हैं, लेकिन सही तकनीक और जागरूकता के साथ इसे रोका जा सकता है।“
शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि वनों को बचाने, शोर कम करने वाली सड़कें, ध्वनि अवरोधक और बेहतर शहरी योजना की मदद से पक्षियों पर शोर के असर को कम किया जा सकता है।
आज संकट सिर्फ पक्षियों के गीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके पूरे जीवन चक्र पर मंडरा रहा है। इंसानी शोर उनके संवाद, भोजन, प्रजनन और जीवित रहने की क्षमता को लगातार कमजोर कर रहा है। अगर ध्वनि प्रदूषण यूं ही बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब सुबह की चहचहाहट इतिहास बन जाएगी और प्रकृति की यह आवाज हमेशा के इंसानी शोर में गुम हो जाएगी। ऐसे में पक्षियों का कलरव बचाना सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण और भविष्य की भी रक्षा है।