

साल 2032 तक प्रति व्यक्ति दलहन खपत 8.6 किलोग्राम सालाना होने का अनुमान है, जो बढ़ती वैश्विक जागरूकता दर्शाता है।
विश्व में लगभग 73.3 करोड़ लोग खाद्य असुरक्षा से प्रभावित हैं, जिनके लिए दलहन सस्ता, टिकाऊ और पोषक समाधान प्रदान करते हैं।
दलहन प्रोटीन, फाइबर, आयरन और आवश्यक खनिजों से भरपूर होते हैं, जो हृदय स्वास्थ्य सुधारने और कुपोषण घटाने में सहायक हैं।
अन्य प्रोटीन स्रोतों की तुलना में दलहन कम पानी का उपयोग करते हैं और मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन बढ़ाते हैं।
दलहन की खेती रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाती है, जैव विविधता बढ़ाती है और किसानों के लिए कम लागत वाला विकल्प है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने साल 2016 में खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष मनाया था। इसकी सफलता को देखते हुए और यह समझते हुए कि दलहन 2030 सतत विकास एजेंडा को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, संयुक्त राष्ट्र ने 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस (वर्ल्ड पल्सेस डे) के रूप में घोषित किया।
दलहन में चना, राजमा, मसूर, उड़द, मूंग और मटर जैसे खाद्य पदार्थ शामिल हैं। ये छोटे दिखने वाले बीज पोषण, स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था - चारों के लिए बेहद उपयोगी हैं।
दलहन: पोषण का सस्ता और मजबूत स्रोत
दलहन पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम, जिंक, फोलिक एसिड और कई आवश्यक विटामिन पाए जाते हैं। शाकाहारी और वीगन लोगों के लिए दलहन प्रोटीन का सबसे अच्छा स्रोत माने जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब दलहन को अनाज (जैसे चावल या गेहूं) के साथ खाया जाता है, तो प्रोटीन की गुणवत्ता और भी बेहतर हो जाती है। यही कारण है कि भारत में दाल-चावल, राजमा-चावल और चना-रोटी जैसे भोजन सदियों से खाए जाते रहे हैं।
भारत और दलहन
भारत में दलहन हर घर के भोजन का हिस्सा हैं। दाल के बिना भोजन अधूरा माना जाता है। दलहन न केवल स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं, बल्कि सस्ते और आसानी से उपलब्ध भी हैं। इससे गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को भरपूर पोषण मिलता है।
हालांकि कुछ लोग दलहन खाने के बाद गैस या पेट में भारीपन की शिकायत करते हैं। लेकिन सही तरीके से भिगोकर, पकाकर और मसालों के साथ सेवन करने से यह समस्या कम की जा सकती है।
वैश्विक खपत और भविष्य
अनुमान है कि 2032 तक प्रति व्यक्ति दलहन खपत 8.6 किलोग्राम सालाना हो जाएगी। यह दर्शाता है कि दुनिया भर में लोग धीरे-धीरे दलहन के महत्व को समझ रहे हैं।
विश्व दलहन दिवस केवल भोजन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य प्रणाली को मजबूत करने का भी प्रतीक है।
भूख और खाद्य सुरक्षा में भूमिका
आज दुनिया में लगभग 73.3 करोड़ लोग खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में दलहन भूख से लड़ने का एक प्रभावी साधन हैं। ये सस्ते, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले और पेट भरने वाले खाद्य पदार्थ हैं।
दलहन में मौजूद फाइबर और प्रोटीन लंबे समय तक ऊर्जा देते हैं। नियमित रूप से दालें खाने से कोलेस्ट्रॉल कम होता है और हृदय रोग का खतरा घटता है।
पर्यावरण के लिए वरदान
दलहन केवल मानव स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद लाभकारी हैं। अन्य प्रोटीन स्रोतों की तुलना में दलहन को कम पानी की आवश्यकता होती है।
दलहन की एक खास विशेषता यह है कि ये हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम हो जाती है। इससे खेती की लागत घटती है और पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
किसानों और जैव विविधता को लाभ
दलहन की खेती से मिट्टी का कटाव कम होता है, जैव विविधता बढ़ती है और कीटों का प्रकोप भी घटता है। बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के समय में दलहन किसानों के लिए एक सस्ता, टिकाऊ और सुरक्षित विकल्प हैं।
छोटे से दिखने वाले दलहन वास्तव में बहुत बड़े फायदा पहुंचाते हैं। ये स्वास्थ्य सुधारते हैं, भूख से लड़ते हैं, किसानों को सहारा देते हैं और पर्यावरण की रक्षा करते हैं।
विश्व दलहन दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भविष्य का भोजन महंगा या जटिल नहीं, बल्कि सरल, पौष्टिक और टिकाऊ हो सकता है। सच में, भोजन का भविष्य छोटा, गोल और मजबूत यानी दलहन है।