

शहरी नदियां, झीलें और तालाब खाद्य सुरक्षा और आजीविका के महत्वपूर्ण स्रोत साबित हो रहे हैं।
महिलाएं, बुजुर्ग और हाशिये पर रहने वाले समुदाय सबसे अधिक भोजन संग्रहण में शामिल पाए गए।
भोजन खोजने (फोरेजिंग) से लोगों को पोषण, अतिरिक्त आय, सांस्कृतिक जुड़ाव और सामुदायिक सहयोग जैसे बड़े लाभ मिलते हैं।
प्रदूषण और अव्यवस्था के बावजूद भारतीय शहरों के जल स्रोत अभी भी कई परिवारों का सहारा बने हुए हैं।
शोध सुझाव देता है कि शहरी योजना में नीले क्षेत्रों को टिकाऊ खाद्य तंत्र और सामाजिक समावेशन के हिस्से के रूप में शामिल करना चाहिए।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच शहरों में मौजूद नदियां, झीलें, तालाब और अन्य जल स्रोत-जिन्हें “अर्बन ब्लू स्पेसेज” या शहरी नीले क्षेत्र कहा जाता है। अक्सर केवल प्राकृतिक सुंदरता या पर्यावरणीय संपदा के रूप में देखे जाते हैं। लेकिन हाल ही में गौटिंगेन और कसेल विश्वविद्यालयों के नेतृत्व में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने यह दिखाया है कि ये नीले क्षेत्र शहरों के खाद्य तंत्र को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
अध्ययन भारत के चार बड़े शहरों बेंगलुरु, मुंबई, कोच्चि और कोलकाता में किया गया, जहां शोधकर्ताओं ने 1,200 लोगों से आमने-सामने बातचीत कर यह समझने की कोशिश की कि शहरों के जल स्रोतों से भोजन जुटाने की परंपरा आज भी कितनी व्यापक है और इसका समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
शहरी जल स्रोतों से मिलने वाला भोजन
अध्ययन में पाया गया कि झीलों, नदियों और तालाबों से लोग विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ जुटाते हैं। इनमें मछलियां, केकड़े, घोंघे, क्लैम, जलीय पौधे, जंगली बेर, मशरूम और फूल शामिल थे।
शोधकर्ताओं ने भोजन इकट्ठा करने वालों को तीन समूहों में बांटा -
दुर्लभ
कभी-कभार
नियमित
हर समूह का उद्देश्य और अनुभव अलग था, लेकिन सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह था कि भोजन एकत्र करने में सबसे अधिक सक्रिय महिलाएं, बुजुर्ग लोग और हाशिये पर रहने वाले समुदाय थे। ये लोग न केवल भोजन जुटाते थे बल्कि उसे पकाते, परिवार के साथ बांटते और कई बार बाजार में बेचकर अतिरिक्त आय भी हासिल करते थे।
भोजन खोजने वाले क्यों महत्वपूर्ण है
नेचर सिटीज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, कभी-कभार भोजन खोजने वाले या फोरेजिंग करने वालों की प्रेरणा अक्सर घर या सामुदायिक बगीचों तक पहुंच से जुड़ी थी। वे प्रकृति के साथ समय बिताने और सांस्कृतिक जुड़ाव को महत्व देते थे।
दूसरी ओर “नियमित” फोरेजिंग करने वाले लोग इस गतिविधि में पोषण, अतिरिक्त आय, सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक संबंधों की वजह से शामिल थे। कई प्रतिभागियों के पास औपचारिक रोजगार भी था, फिर भी वे अपने परिवार के भोजन को सहारा देने और समुदाय में भोजन साझा करने के लिए जलस्रोतों से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर थे।
इससे स्पष्ट होता है कि फोरेजिंग सिर्फ भोजन जुटाने का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक रिश्ते बनाने, संस्कृति को आगे बढ़ाने और कठिन समय में आर्थिक सुरक्षा देने का तरीका भी है।
प्रदूषण के बावजूद नीले क्षेत्र का महत्व
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि भले ही शहरों के जल स्रोतों में प्रदूषण और अवैध निर्माण जैसी समस्याएं बढ़ रही हों, फिर भी ये स्थान कई समुदायों की आजीविका और भोजन व्यवस्था को बनाए रखने में मदद कर रहे हैं।
शोध पत्र में गोतिंगन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि शहरी जल स्रोत केवल पारिस्थितिक संपदा नहीं हैं, बल्कि ये पोषण, आजीविका और सामाजिक कल्याण के भी प्रमुख आधार हैं। उनके अनुसार भविष्य की शहरी योजना में केवल जल की गुणवत्ता सुधारने पर ही नहीं, बल्कि इन क्षेत्रों को टिकाऊ खाद्य प्रणालियों का हिस्सा बनाने पर भी ध्यान देना चाहिए।
नीले क्षेत्रों और स्वस्थ शहरों का संबंध
पिछले कई दशकों में तेजी से हुए शहरी विकास, प्रदूषण और औद्योगिक विस्तार के कारण शहरों की नदियां और झीलें काफी प्रभावित हुई हैं। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि यदि इन्हें सही तरीके से संरक्षित और प्रबंधित किया जाए, तो ये केवल जैव विविधता बढ़ाने और पर्यावरण सुधारने में ही मदद नहीं करेंगे, बल्कि खाद्य सुरक्षा और सामाजिक समावेशन को भी मजबूत बनाएंगे।
नीले क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन से -
हाशिये पर रहने वाले समुदायों को सुरक्षित भोजन मिलेगा
लोग परंपरागत खाद्य ज्ञान को आगे बढ़ा सकेंगे
प्रकृति के साथ जुड़ाव बढ़ेगा
और शहर अधिक स्वस्थ व टिकाऊ बन पाएंगे
आज जब शहरों में हरित और नीले क्षेत्रों को तेजी से कम किया जा रहा है, यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि जल स्रोत केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं हैं, वे शहरों की धड़कन हैं।
शोध में यह साफ कहा गया है कि शहरी जल स्रोतों को केवल प्रदूषण नियंत्रण या सौंदर्यीकरण की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। इन्हें ऐसे स्थानों के रूप में समझा जाना चाहिए जो भोजन, आय, संस्कृति और समुदाय में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
यदि नगर नियोजन में नीले क्षेत्रों को केंद्रीय स्थान दिया जाए, तो भारत जैसे देशों में यह एक अधिक समावेशी, टिकाऊ और स्वस्थ शहरी भविष्य की ओर एक बड़ा कदम होगा।