

दुनिया एक ऐसे “साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस” की गिरफ्त में है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन जीवन की बुनियाद को भीतर से कमजोर कर रहा है।
नई रिसर्च बताती है कि पेस्टिसाइड्स, प्लास्टिक, कृत्रिम रसायन और तेजी से बढ़ता तापमान मिलकर इंसानों सहित लगभग सभी प्रजातियों की प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, ये खतरे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ काम करते हुए प्रजनन तंत्र पर लगातार दबाव बना रहे हैं।
इसका असर कई रूपों में सामने आ रहा है, उदाहरण के लिए नर-मादा अनुपात का बिगड़ना, शुक्राणु और अंडों की गुणवत्ता में गिरावट, जन्मजात विकृतियों में वृद्धि और कई प्रजातियों की आबादी में तेजी से कमी जैसी कई चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह प्रभाव एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में और गंभीर होता जाता है।
अध्ययन में कीड़ों से लेकर मछलियों, पक्षियों, समुद्री जीवों और इंसानों तक, हर स्तर पर इसके सबूत मिले हैं। इंसानों में भी ‘फॉरएवर केमिकल्स’ और माइक्रोप्लास्टिक के कारण प्रजनन क्षमता घटने के संकेत मिल रहे हैं।
वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि यदि अभी रसायनों, प्लास्टिक और जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह अदृश्य संकट भविष्य में जीवन के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
दुनिया आज एक ऐसे संकट की ओर बढ़ रही है, जो भले ही आंखों से नजर न आए, लेकिन उसके असर इतने गहरे हैं कि आने वाली पीढ़ियों का अस्तित्व तक दांव पर लग सकता है।
एक नई रिसर्च से पता चला है कि धरती पर जीवन की सबसे बुनियादी शक्ति, 'प्रजनन क्षमता' अब खतरे में है। चिंता की बात है कि महज इंसान ही नहीं, बल्कि दूसरे अन्य छोटे-बड़े जीव जैसे मछलियां, पक्षी, कछुए, कीड़े आदि भी धीरे-धीरे अपनी संतति पैदा करने की क्षमता खो रहे हैं।
प्रतिष्ठित जर्नल एनपीजे इमर्जिंग कंटैमिनेंट्स में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हवा, पानी और भोजन में घुल चुके कृत्रिम रसायन, प्लास्टिक और तेजी से बढ़ता तापमान मिलकर एक ऐसा अदृश्य जाल बुन रहे हैं, जो पूरी जीवित दुनिया के भविष्य को जकड़ रहा है।
जब कमजोर पड़ने लगे जीवन की जड़ें
देखा जाए तो धरती पर इन हानिकारक रसायनों की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि उसने पृथ्वी की सुरक्षित सीमा को पार कर लिया है। इसी तरह बढ़ता तापमान भी नित नई चुनौतियां पैदा कर रहा है। वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि ये दोनों ताकतें अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर काम कर रही हैं, जिससे प्रजनन क्षमता पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने इस बात की भी पुष्टि की है कि यह संकट महज इंसानों तक सीमित नहीं है बल्कि दूसरे जीवों की प्रजनन क्षमता को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
हैरानी की बात है कि यह असर कई रूपों में सामने आ रहा है, उदाहरण के लिए नर-मादा अनुपात का बिगड़ना, अंडों और शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट, जन्म के समय विकृतियों का बढ़ना और कई प्रजातियों की आबादी का तेजी से घटना। विशेषज्ञों के मुताबिक यह कोई अस्थाई समस्या नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा और दीर्घकालिक है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसका असर एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी शिफ्ट होता रहता है।
ऐसे में जब जहरीले रसायन और बढ़ता तापमान एक साथ असर डालते हैं, तो यह संकट और भी गंभीर रूप ले लेता है, जो धीरे-धीरे पूरी जैविक दुनिया के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
हर सांस, हर कौर में जहर
आज हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, जो खाना खाते हैं, और जिस पानी का इस्तेमाल करते हैं, उनमें हजारों रसायन मौजूद होते हैं। समुद्र की गहराइयों में रहने वाले जीवों को छोड़ दें, तो आज दुनिया में कृत्रिम रसायनों से बच पाना करीब-करीब असंभव हो गया है। ये रसायन नष्ट नहीं होते, बल्कि भोजन, हवा और सीधे संपर्क के जरिए हमारे अंदर तक पहुंच जाते हैं और जीवित तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक दुनिया में करीब 1.4 लाख कृत्रिम रसायन मौजूद हैं, जिनमें 1,000 से अधिक ऐसे हैं जिन्हें एंडोक्राइन-डिसरप्टिंग केमिकल्स के रूप में जाना जाता है। इनकी संरचना काफी हद तक हार्मोन जैसी होती है, इसलिए ये शरीर के प्राकृतिक हार्मोन की नकल कर सकते हैं या उनके काम में बाधा डाल सकते हैं।
चूंकि हार्मोन शरीर की कई जरूरी प्रक्रियाओं, जैसे मेटाबॉलिज्म, विकास और प्रजनन को नियंत्रित करते हैं, इसलिए इनमें किसी भी तरह की गड़बड़ी से इन प्रक्रियाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है और जीन स्तर तक बदलाव शुरू हो सकते हैं।
ये रसायन इतने शक्तिशाली होते हैं कि बहुत कम मात्रा में भी शरीर की वृद्धि, मेटाबॉलिज्म और प्रजनन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
सिर्फ एक पीढ़ी तक सीमित नहीं असर
हैरानी की बात है कि इसका असर एक जीव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रजातियों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र तक फैल सकता है। ये रसायन बहुत कम मात्रा में भी बेहद प्रभावशाली होते हैं, इतने कि इनकी मामूली मात्रा भी बड़े बदलाव ला सकती है।
एक तरफ जहां बढ़ता तापमान दुनिया भर में जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहा है। यह पर्यावरणीय दबाव जीवों की प्रजनन क्षमता को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। दूसरी तरफ, बढ़ती गर्मी इन रसायनों के असर को और खतरनाक बना रही है। बढ़ती गर्मी प्रदूषकों की विषाक्तता को बढ़ा देती है, जिससे हानिकारक रसायन जीवों के शरीर में अधिक मात्रा में जमा होने लगते हैं। ऐसे में शरीर पर इनका असर और गहरा हो जाता है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन खतरों का असर सिर्फ मौजूदा पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुंच रहा है और हर पीढ़ी में यह पहले से कहीं ज्यादा गंभीर होता जा रहा है।
हर प्रजाति पर दिखा असर
अध्ययन में कीड़ों से लेकर मछलियों, पक्षियों, सरीसृपों, स्तनधारियों और इंसानों तक, सभी में इस संकट के सबूत मिले हैं। उदाहरण के तौर पर, नावों के पेंट में इस्तेमाल होने वाला एक रसायन घोंघों में “इम्पोसेक्स” नाम की स्थिति पैदा करता है। इसमें मादा घोंघों में नर प्रजनन अंग विकसित होने लगते हैं, जिससे पूरी आबादी बांझ हो सकती है।
इसी तरह, मछलियों में एस्ट्रोजन जैसे असर करने वाले रसायनों के संपर्क से नर मछलियों में मादा जैसे गुण विकसित होने लगते हैं, और कई मामलों में इससे स्थानीय आबादी पूरी तरह खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है।
इसी तरह समुद्री कछुओं जैसे सरीसृप जीव अपने बच्चों का लिंग तय करने के लिए घोंसले के तापमान पर निर्भर होते हैं। लेकिन बढ़ते तापमान के कारण कुछ ग्रीन सी टर्टल आबादियों में करीब सभी बच्चे मादा ही पैदा हो रहे हैं। पक्षी भी इससे अछूते नहीं हैं। डीडीटी जैसे कीटनाशकों के कारण अंडों के छिलके इतने पतले हो गए कि वे सेने के दौरान ही टूटने लगे, जिससे पेरेग्रिन फाल्कन जैसे पक्षियों की बड़ी आबादी प्रभावित हुई।
सील और सी लायन जैसे समुद्री जीव दोहरी मार झेल रहे हैं, एक तरफ घटती समुद्री बर्फ के कारण गर्भपात और समय से पहले जन्म के मामले बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ रसायनों के संपर्क से गर्भाशय में ट्यूमर और गर्भधारण की दर में कमी देखी जा रही है।
इंसानों में दिखने लगे साफ संकेत
इंसानों में भी इसका असर साफ दिख रहा है। पीएफएएस, जिन्हें ‘फॉरएवर केमिकल्स’कहा जाता है, उनके संपर्क से गर्भधारण की संभावना कम हो रही है। साथ ही इसे आईवीएफ के दौरान भ्रूण की खराब गुणवत्ता से भी जोड़ा गया है।
साथ ही, कई अध्ययनों में मानव अंडकोष और वीर्य में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के भी सबूत मिले हैं। रिसर्च दर्शाती है कि जिन लोगों में इनकी मात्रा अधिक पाई गई, उनमें शुक्राणुओं की संख्या घटने के साथ उनकी गतिशीलता भी कमजोर देखी गई, जो प्रजनन क्षमता पर सीधा और गंभीर असर डालती है।
यह अध्ययन साफ चेतावनी देता है कि अगर हमने अभी भी रसायनों, प्लास्टिक और बढ़ते तापमान को नियंत्रित नहीं किया, तो हम सिर्फ प्रकृति की विविधता ही नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता को भी खो सकते हैं। यह संकट अदृश्य जरूर है, लेकिन इसका असर आने वाले समय में जीवन के अस्तित्व को ही चुनौती दे सकता है