अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से घट सकती है मां-बाप बनने की संभावना, भ्रूण के विकास पर भी असर

अध्ययन में पहली बार सामने आया है कि मां और पिता दोनों का खानपान सिर्फ गर्भधारण ही नहीं, बल्कि गर्भ में पल रहे भ्रूण के शुरुआती विकास को भी प्रभावित कर सकता है।
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सारांश
  • नई स्टडी में सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन सिर्फ मोटापा या लाइफस्टाइल बीमारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुरुषों और महिलाओं की प्रजनन क्षमता, गर्भधारण में लगने वाले समय और गर्भ में पल रहे भ्रूण के शुरुआती विकास को भी प्रभावित कर सकता है।

  • शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन जारी रहा, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों की सेहत पर भी पड़ सकता है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जंक और पैकेटबंद रेडी-टू-ईट फूड हमारी थाली का हिस्सा बन चुका है, लेकिन एक नई स्टडी ने चेतावनी दी है कि यह खानपान सिर्फ मोटापा ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि मां-बाप बनने की संभावना और गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास को भी प्रभावित कर सकता है।

रिसर्च में खुलासा हुआ है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड न सिर्फ पुरुषों और महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हैं, बल्कि गर्भावस्था के शुरुआती दौर में भ्रूण के विकास को भी धीमा कर सकते हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ह्यूमन रिप्रोडक्शन में प्रकाशित हुए हैं।

खास बात यह है कि यह पहला अध्ययन है जिसमें मां और पिता दोनों के खानपान का गर्भधारण और भ्रूण के शुरुआती विकास पर पड़ने वाले संयुक्त प्रभाव को देखा गया है।

क्या होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड?

गौरतलब है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड वे खाद्य पदार्थ होते हैं, जो कई चरणों की औद्योगिक प्रोसेसिंग से तैयार किए जाते हैं। इनमें आमतौर पर नमक, चीनी, कृत्रिम मिठास, फ्लेवर, प्रिजर्वेटिव, केमिकल एडिटिव्स और हानिकारक वसा (सैचुरेटेड और ट्रांस फैट) की मात्रा अधिक होती है।

ऐसे खाद्य पदार्थ ऊर्जा तो देते हैं, लेकिन इनमें प्राकृतिक और आवश्यक पोषक तत्व बेहद कम होते हैं। यानी ये पेट तो भरते हैं, लेकिन शरीर को जरूरी पोषण नहीं दे पाते। पैकेट बंद स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, सॉफ्ट ड्रिंक, प्रोसेस्ड मीट, रेडी-टू-ईट और फ्रोजन फूड इसी श्रेणी में आते हैं।

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विशेषज्ञों का कहना है कि करीब 14 फीसदी वयस्क और 12 फीसदी बच्चे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की लत का शिकार बन चुके हैं। लोगों में स्वास्थ्य के नजरिए से हानिकारक इन खाद्य पदार्थों को लेकर जो लगाव है, वो शराब और तम्बाकू जितना ही बढ़ चुका है।

क्या कुछ आया अध्ययन में सामने

इस स्टडी में 831 महिलाओं और 651 पुरुषों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जो एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गर्भावस्था के शुरुआती दौर, करीब 12 सप्ताह पर, माता-पिता के खानपान की जानकारी एक प्रश्नावली के जरिए जुटाई। इसमें खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों को दो हिस्सों में बांटा गया, पहला अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और दूसरा सामान्य भोजन। इसके बाद रोजाना खाए जाने वाले कुल भोजन (ग्राम में) में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की हिस्सेदारी प्रतिशत के रूप में निकाली गई।

उस समय सभी महिलाएं गर्भवती थीं। अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं के कुल भोजन का औसतन 22 फीसदी और पुरुषों के भोजन का 25 फीसदी हिस्सा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड था।

प्रश्नावली से यह जानकारी भी ली गई कि गर्भधारण में कितना समय लगा, एक महीने में गर्भ ठहरने की संभावना कितनी थी और किन मामलों में एक साल से ज्यादा समय या मेडिकल मदद की जरूरत पड़ी। इन्हें कम प्रजनन क्षमता की श्रेणी में रखा गया।

नतीजे दर्शाते हैं कि ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से पुरुषों को पिता बनने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। साथ ही उनमें प्रजनन क्षमता में कमी का खतरा भी बढ़ा देखा गया।

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वहीं, जिन महिलाओं की डाइट में ऐसे खाद्य पदार्थ अधिक थे, उनके गर्भ में पल रहे नन्हे जीवन की रफ्तार धीमी पाई गई, भ्रूण का शुरुआती विकास थोड़ा थमा हुआ दिखा और उसे पोषण देने वाली संरचना ‘योल्क सैक’ का आकार भी छोटा पाया गया। भले ही ये अंतर देखने में मामूली लगें, लेकिन वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही रुझान बड़े स्तर पर जारी रहा, तो इसका आने वाली पीढ़ियों की सेहत पर गहरा असर पड़ सकता है।

क्यों है यह चिंता की बात?

कुछ समृद्ध देशों में आज स्थिति यह है कि लोगों के कुल आहार का करीब 50 से 60 फीसदी हिस्सा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बन चुका है।

अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता सेलीन लिन का इस प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “महिलाओं में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीधे तौर पर हर मामले में कम प्रजनन क्षमता या गर्भधारण में लगने वाले समय से जुड़ा नहीं मिला, लेकिन गर्भावस्था के सातवें सप्ताह तक भ्रूण की वृद्धि थोड़ी कम और योल्क सैक का आकार थोड़ा छोटा पाया गया।“

उन्होंने कहा कि, “ये अंतर छोटे जरूर हैं, लेकिन शोध और बड़े स्तर पर आबादी के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। यह पहली बार सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का असर सिर्फ मां की सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चे के शुरुआती विकास से भी जुड़ा हो सकता है।“

वहीं पुरुषों में स्थिति अलग पाई गई। जिन पुरुषों ने ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन किया था, उनमें प्रजनन क्षमता में कमी का खतरा अधिक था और गर्भधारण में ज्यादा समय लगा, हालांकि इसका भ्रूण के शुरुआती विकास से सीधा संबंध नहीं मिला। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका कारण यह हो सकता है कि स्पर्म खानपान के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जबकि महिलाओं के खानपान का असर सीधे गर्भाशय के उस वातावरण पर पड़ता है, जहां भ्रूण का विकास शुरू होता है।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि संतुलित आहार दोनों पार्टनर के लिए बेहतर है, क्योंकि इससे न सिर्फ उनकी सेहत बेहतर रहती है, बल्कि गर्भधारण की संभावना और होने वाले बच्चे की सेहत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

स्वस्थ जीवन के लिए जरुरी है संतुलित आहार

पिछले अध्ययनों में भी पाया गया है कि, गर्भावस्था की पहली तिमाही में भ्रूण का धीमा विकास आगे चलकर समय से पहले प्रसव (प्रिमेच्योर डिलीवरी), कम वजन वाले बच्चे का जन्म, बचपन में हृदय रोगों के खतरे और गर्भपात जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस विषय पर अभी और व्यापक शोध की जरूरत है, ताकि यह साफ हो सके कि यह असर आखिर किस वजह से हो रहा है, क्या इसकी वजह अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में पोषक तत्वों की कमी है, या फिर इनमें मौजूद केमिकल, एडिटिव्स और माइक्रोप्लास्टिक जैसे तत्व हैं।

ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्भधारण की योजना बना रही दंपतियों को अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कम खाना चाहिए, क्योंकि इसका असर सिर्फ मां ही नहीं, पिता के स्वास्थ्य और बच्चे के विकास पर भी पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि गर्भधारण और गर्भावस्था को सिर्फ मां की जिम्मेदारी मानने की सोच बदली जाए, क्योंकि पिता का खानपान और स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

गौरतलब है कि हाल ही में किए एक अन्य अध्ययन में सामने आया था कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन हड्डियों को कमजोर कर सकता है।

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इस अध्ययन में पाया गया है कि जो लोग ज्यादा मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन करते हैं, उनकी हड्डियों का खनिज घनत्व (बोन मिनरल डेंसिटी) कम हो सकता है और इसकी वजह से उनमें कूल्हे की हड्डी के टूटने (हिप फ्रैक्चर) का खतरा बढ़ जाता है।

कुल मिलकर देखें तो संतुलित और पौष्टिक आहार न सिर्फ माता-पिता की सेहत के लिए, बल्कि स्वस्थ गर्भधारण और बच्चे के बेहतर विकास के लिए भी बेहद जरूरी है। ऐसे में दंपतियों को जंक फूड और अत्यधिक प्रोसेस किए फूड से दूरी बनाकर ताजा, पौष्टिक और प्राकृतिक भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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