

भारत में सदियों से किसान मौसम के भरोसे खेती करते आए हैं, लेकिन अब वही मौसम किसानों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।
563 जिलों के 51 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित नए अध्ययन ने खुलासा किया कि तापमान में महज एक डिग्री की वृद्धि के साथ देश में फसलों की पैदावार करीब आठ फीसदी घटा सकती है। यह गिरावट सिर्फ एक मौसम की नहीं, बल्कि किसानों की कई सालों की मेहनत और कृषि प्रगति को पीछे धकेलने वाली है।
रिपोर्ट से पता चला है कि इसका सबसे ज्यादा असर खाद्य फसलों पर पड़ेगा। तापमान बढ़ने से बाजरा की पैदावार 19.1 फीसदी, मक्का 16.2 फीसदी, जबकि बारिश में 20 फीसदी कमी आने पर धान की उपज 11.2 फीसदी तक घट सकती है।
कुछ जिलों में तस्वीर और भी भयावह है। हिमाचल के चंबा में उत्पादन 21.5 फीसदी, राजस्थान के बाड़मेर में 18.7 फीसदी और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में 18 फीसदी तक घटने का अंदेशा है।
यह असर पूरे देश में एक जैसा नहीं, लेकिन खतरा सबके लिए है। रिपोर्ट में सामने आया है कि कुछ जिलों में बाजरा की उपज 39 फीसदी तक गिर सकती है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि नुकसान एक साल तक सीमित नहीं रहता, उसका 80 फीसदी असर अगले दो साल में सामने आता है। यानी किसान एक मौसम की मार से उबर भी नहीं पाते कि अगली आपदा दस्तक दे देती है। सच कहें तो बढ़ती गर्मी, मानसून में आता बदलाव अब खेतों से सिर्फ फसलें नहीं, किसानों की उम्मीदें भी छीन रही है।
भारत में सदियों से किसान धूप की तपिश और बादलों के मिजाज को भांपकर खेती का रुख तय करते आए हैं। सच कहें तो मौसम के साथ अन्नदाता का यह रिश्ता सदियों पुराना है, जो अब टूट रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और मानसून की बेरुखी ने देश की खेती-किसानी को गहरे संकट में डाल दिया है।
आज हालात किस हद तक बिगड़ चुके हैं इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से ही देश में फसलों की पैदावार औसतन करीब 8 फीसदी तक गिर सकती है। इसका मतलब है कि कृषि में वर्षों की तकनीकी प्रगति और उत्पादकता में हुई बढ़ोतरी कुछ ही समय में खत्म हो सकती है।
यह जानकारी सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी, एंड पॉलिसी, सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस, दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए अध्ययन में सामने आई है।
563 जिलों के रुझान: बदलता मौसम, घटती पैदावार
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 1966 से 2016 के पिछले 51 वर्षों के जलवायु और कृषि पैदावार से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया है। यह अध्ययन कितना विस्तृत है इसी बात से समझा जा सकता है कि इसमें भारत के 563 जिलों में 10 प्रमुख फसलों की पैदावार के साथ-साथ बारिश और तापमान से जुड़े करीब 1.26 करोड़ रिकॉर्ड का अध्ययन शामिल हैं।
इस अध्ययन में जिन दस प्रमुख फसलों को शामिल किया गया है, उनमें धान, गेहूं, ज्वार, मक्का, बाजरा, चना, अरहर, मूंगफली, गन्ना और कपास शामिल हैं। बता दें कि ये फसलें भारत के कुल कृषि क्षेत्र का करीब दो-तिहाई हिस्सा कवर करती हैं।
बाजरा-मक्के पर सबसे ज्यादा मार
अध्ययन में पाया गया कि तापमान में हर एक डिग्री वृद्धि से सभी फसलों पर असर पड़ता है, लेकिन कुछ फसलें इसके लिए बेहद संवेदनशील हैं। उदाहरण के हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ देश में बाजरा या बजड़ी (पर्ल मिलेट) की पैदावार में 19.1 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। इसी तरह मक्का की पैदावार भी औसतन 16.2 फीसदी से अधिक घट सकती है। वहीं कुछ जिलों में नुकसान और भी ज्यादा गंभीर हो सकता है, जहां पैदावार में 39 फीसदी तक की गिरावट का अंदेशा जताया गया है।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग परिस्थितियों का अध्ययन किया है। इनमें बारिश में 20 फीसदी की कमी और तापमान में एक डिग्री की बढ़ोतरी शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो इन दोनों ही स्थितियों में असर करीब-करीब एक जैसा पाया गया है।
अध्ययन के मुताबिक जहां बारिश में 20 फीसदी की कमी से फसलों की पैदावार औसतन 8.1 फीसदी घट सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर खाद्य फसलों पर पड़ेगा, जिनकी पैदावार में 8.8 फीसदी के नुकसान का अंदेशा है, जबकि नकदी फसलों में यह आंकड़ा 5.1 फीसदी दर्ज किया गया।
इसी तरह तापमान में एक डिग्री के इजाफे के साथ देश में फसलों की पैदावार 7.8 फीसदी घट जाएगा। इस परिदृश्य में भी खाद्य फसलों को सबसे ज्यादा करीब 8.2 फीसदी का नुकसान होगा। वहीं नकदी फसलों के उत्पादन में छह फीसदी की गिरावट आ सकती है।
धान, गेहूं, ज्वार, कपास, बाजरा: किस पर कितना पड़ेगा असर
रिपोर्ट दर्शाती है कि बारिश में कमी से सबसे ज्यादा असर ज्वार, कपास, धान, बाजरा और मूंगफली पर पड़ेगा। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इसकी वजह से जहां धान की पैदावार औसतन 11.2 फीसदी घट जाएगी। वहीं गेहूं में दो से आठ फीसदी (4.6), ज्वार में 14.1 फीसदी, मक्के में 6.3 फीसदी, पर्ल मिलेट में 10.6 फीसदी, चने में आठ फीसदी, अरहर में 7.8 फीसदी, मूंगफली में नौ फीसदी, गन्ने में करीब दो फीसदी और कपास में 11.4 फीसदी की गिरावट आ सकती है।
इसी तरह बढ़ते तापमान से गन्ना, मक्का, अरहर, बाजरा और ज्वार को सबसे ज्यादा नुकसान होने का अंदेशा है।
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि तापमान में हर एक डिग्री की वृद्धि के साथ देश में जहां धान की पैदावार औसतन 7.8 फीसदी घट जाएगी। वहीं गेहूं में 5.4 फीसदी, ज्वार में 9.4 फीसदी, मक्के में 16.2 फीसदी, पर्ल मिलेट में 19.1 फीसदी, चने में 7.3 फीसदी, अरहर में 9.3 फीसदी, मूंगफली में 4.5 फीसदी, गन्ने में 9.4 फीसदी और कपास में 3.4 फीसदी की गिरावट का अंदेशा है।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कहा कि सामान्य से ज्यादा या सामान्य से कम तापमान, दोनों ही स्थितियां फसलों की पैदावार पर असर डालती हैं। यानी मौसम में कोई भी असामान्यता किसानों के लिए नुकसानदेह है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि कई जिलों में नुकसान कहीं ज्यादा गंभीर है। उदाहरण के लिए, कम बारिश का असर धान की पैदावार पर कहीं चार फीसदी तो कहीं 20 फीसदी तक की गिरावट के रूप में दिखा। ज्वार में यह नुकसान 6 से 28 फीसदी तक रहा।
इसी तरह बढ़ते तापमान से मक्का की पैदावार कुछ जिलों में दो तो कुछ में 32 फीसदी तक घटी, जबकि बाजरा में यह गिरावट दो से 39 प्रतिशत तक पहुंची। यानी कुछ जिलों में मौसम का असर खेती पर बेहद गहरा पड़ रहा है।
चिकमंगलूर, पुरी, सिंहभूम, दार्जिलिंग, बाड़मेर: किस पर कितना होगा दबाव
अध्ययन बताता है कि जलवायु संकट का असर पूरे देश में कृषि पैदावार पर एक जैसा नहीं है, कुछ जिलों में नुकसान बेहद गंभीर है, जबकि कुछ जगह अपेक्षाकृत कम। अंदेशा है कि यदि बारिश में 20 फीसदी लो कमी आती है, तो सबसे ज्यादा मार कर्नाटक के चिकमंगलूर (-18.5), ओडिशा के पुरी (-18.1) और कोरापुट (-16.8), बिहार के सिंहभूम (-17.4) और असम के कामरूप (-16.9) जैसे जिलों पर पड़ सकती है, जहां फसल उत्पादन 16 से 18 फीसदी की गिरावट आ सकती है।
इसी तरह तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी का असर और भी तीखा दिखा। हिमाचल के चंबा में उत्पादन 21.5 फीसदी तक गिर सकता है।
इसके बाद कर्नाटक के हसन (-20.7), चिकमंगलूर (-17.5), चित्रदुर्ग (-17) और बेलगाम (-16.8) जैसे जिले सबसे अधिक प्रभावित पाए गए। पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग (-18), राजस्थान का बाड़मेर (-18.7) और तमिलनाडु का सलेम (-17.7) भी गंभीर जोखिम वाले जिलों में शामिल हैं। कई जिलों में यह गिरावट 17 से 20 फीसदी तक पहुंच सकती है।
वहीं कुछ जिलों में असर अपेक्षाकृत कम रहा। जैसे उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मेरठ और मथुरा, मध्य प्रदेश के उज्जैन और महाराष्ट्र के सोलापुर में बारिश घटने से नुकसान 3 फीसदी के आसपास रहा। तापमान बढ़ने पर भी कुछ जिलों जैसे पश्चिम बंगाल का कूचबिहार, महाराष्ट्र का ठाणे और पुणे, तथा गुजरात के जूनागढ़ में असर एक से 1.5 फीसदी के बीच सीमित रहा।
यह अंतर दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन पूरे देश को प्रभावित कर रहा है, लेकिन उसकी चोट हर जिले पर अलग है। जहां कुछ इलाकों में किसान हर मौसम के साथ भारी नुकसान झेल रहे हैं, वहीं कुछ जगह फिलहाल असर कम है।
लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि तापमान बढ़ने और बारिश के अनिश्चित होने का दायरा लगातार फैल रहा है, इसलिए सुरक्षित माने जाने वाले जिले भी लंबे समय तक इससे अछूते नहीं रहेंगे।
साल नहीं, कई वर्षों तक रहता है असर
अध्ययन का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह है कि जलवायु झटकों का असर केवल उसी साल तक सीमित नहीं रहता। नुकसान आने वाले वर्षों में भी बढ़ता जाता है। उदाहरण के लिए धान, गेहूं, चना, अरहर, गन्ना और कपास जैसी फसलों में लम्बे समय में होने वाला नुकसान शुरुआती हानि से 35 से 66 फीसदी अधिक पाया गया।
हालांकि कुल नुकसान का 80 फीसदी हिस्सा दो साल और 90 फीसदी तीन साल के भीतर सामने आ जाता है। इसका मतलब है कि किसान एक मौसम की मार से उबर भी नहीं पाते कि अगली आपदा दस्तक दे देती है।
क्या बर्बाद हो सकती है सालों की मेहनत
शोधकर्ताओं के मुताबिक तापमान में हर एक डिग्री की वृद्धि सिर्फ मौसम में बदलाव ही नहीं करती, यह किसानों की वर्षों की मेहनत भी छीन लेती है। पिछले 25 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया है कि तापमान में हर डिग्री वृद्धि के साथ धान और गेहूं की पैदावार में हासिल करीब 4 वर्षों की प्रगति मिट सकती है।
इसी तरह मक्का और बाजरा के लिए यह नुकसान 6 वर्षों की मेहनत के बराबर है, जबकि गन्ने में 8 साल की बढ़त एक झटके में खत्म हो सकती है। यानी बढ़ती गर्मी खेतों से सिर्फ फसलें ही नहीं, किसानों की उम्मीदें भी कम कर रही है।
भारत जैसे देश में, जहां जोत सीमित हैं और उसको बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है वहां उत्पादन बढ़ाने का एकमात्र रास्ता पैदावार में वृद्धि करना है। लेकिन जलवायु परिवर्तन इस उम्मीद को भी कमजोर कर रहा है।
पिछले 50 वर्षों के रुझानों को देखें तो देश में सभी 10 प्रमुख फसलों की पैदावार में बढ़ोतरी देखी गई। हालांकि हर साल इसमें काफी उतार-चढ़ाव भी रहा है। अलग-अलग फसलों में बढ़त की रफ्तार भी अलग रही। राष्ट्रीय स्तर पर अरहर की पैदावार सबसे धीमी, सिर्फ 0.4 फीसदी सालाना बढ़ी है।
चना और गन्ना में यह वृद्धि 0.9 फीसदी रही। वहीं कपास में सबसे तेज 2.9 फीसदी सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई। धान और गेहूं की पैदावार में औसतन क्रमशः 2.1 और 2.3 फीसदी की सालाना वृद्धि दर्ज हुई है।
किसानों की आय और महंगाई पर असर
अध्ययन के अनुसार, उपज में कमी का सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा। उत्पादन घटने से खाद्यान्न की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे महंगाई का दबाव बनेगा। नतीजन इसका असर किसानों के साथ-साथ आम आदमी की थाली पर भी पड़ता दिखेगा।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि लगातार बढ़ती खाद्य कीमतें कमजोर परिवारों को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगी। इससे उनकी क्रय क्षमता घटेगी और अर्थव्यवस्था में महंगाई पहले से ज्यादा विकराल रूप ले सकती है।
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया में बढ़ती आबादी और लोगों के भोजन में आते बदलाव के कारण 2050 तक खाद्य मांग को पूरा करने के लिए फसल उत्पादन में 56 फीसदी की बढ़ोतरी करनी होगी। यानी 2010 के 13,100 ट्रिलियन किलो कैलोरी सालाना उत्पादन को बढ़ाकर 20,500 ट्रिलियन किलो कैलोरी तक पहुंचाना पड़ेगा।
भारत जो दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश हैं, वहां भी इसका व्यापक असर पड़ेगा। लेकिन बढ़ते तापमान, बदलती जलवायु और मानसून के बदलते मिजाज के साथ यह लक्ष्य और मुश्किल होता जा रहा है।
सच कहें तो जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, भारत के खेतों में दिख रही सच्चाई है, जहां तापमान में हर बढ़ती डिग्री, किसानों के वर्षों की मेहनत को तबाह कर रही है।