

ओडिशा के किसानों पर आधारित अध्ययन बताता है कि जलवायु संकट के दौर में “क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि” का समाधान जमीनी हकीकत से टकरा रहा है।
किसान आर्थिक तंगी, छोटी जोत और असुरक्षित जमीन जैसी बुनियादी समस्याओं में फंसे हैं, जबकि जानकारी और कौशल की कमी भी बड़ी बाधा बनी हुई है।
सरकारी योजनाओं से जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन इससे चुनौतियां भी ज्यादा स्पष्ट हुई हैं। नतीजा साफ है, जब तक किसानों को वित्त, जमीन और ज्ञान का मजबूत सहारा नहीं मिलेगा, तब तक जलवायु-अनुकूल कृषि खेतों तक नहीं, सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी।
बार-बार आने वाले चक्रवात, बाढ़ और सूखे से जूझते ओडिशा के छोटे-सीमान्त किसान जानते हैं कि अब खेती पहले जैसी नहीं रही। मौसम अनिश्चित है, जोखिम बढ़ रहा है, और हर फसल एक जुआ बनती जा रही है।
ऐसे समय में जलवायु परिवर्तन से निपटने और फसल उत्पादन बनाए रखने के लिए “क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर” यानी जलवायु अनुकूल कृषि को एक बड़े समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि उम्मीद की यह किरण किसानों तक पूरी तरह पहुंच ही नहीं पा रही। जमीनी स्तर पर छोटे किसानों के लिए इसे अपनाना अब भी आसान नहीं है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे के वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन ने इस सच्चाई को बेबाकी से सामने रखा है।
ओडिशा के चार जिलों के 321 किसानों पर आधारित यह शोध बताता है कि क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि अपनाने के रास्ते में कई ऐसी बाधाएं हैं, जिन्हें पार करना अब भी छोटे किसानों के लिए बेहद मुश्किल है। अध्ययन में उन गांवों की तुलना की गई है जो राष्ट्रीय जलवायु-सहिष्णु कृषि नवाचार कार्यक्रम (एनआईसीआरए) से जुड़े और इससे बाहर हैं।
इसमें पहली बार अलग-अलग बाधाओं को जोड़कर एक समग्र सूचकांक तैयार किया गया, जिससे यह समझा जा सके कि असल में किसान क्यों इन नई तकनीकों को अपनाने से पीछे रह जाते हैं। जो निष्कर्ष सामने आए उनके मुताबिक, किसानों की सबसे बड़ी बाधा सामाजिक-आर्थिक है, हालांकि तकनीकी चुनौतियां भी कम नहीं।
इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय नेचर जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।
सबसे बड़ी दीवार: गरीबी और संसाधनों की कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक है। 70 से 74 फीसदी किसानों के पास पर्याप्त पैसा नहीं है। वहीं 34 से 41 फीसदी के पास जोत बहुत छोटी है। इसी तरह 33 से 40 फीसदी मामलों में किसानों के पास जमीन का पक्का मालिकाना हक नहीं है।
यानी किसान नई तकनीक अपनाना तो चाहते हैं, लेकिन उनकी जेब और जमीन दोनों ही साथ नहीं दे रही। ऐसे में वे नई तकनीक का जोखिम कैसे उठाए?
तकनीक है, लेकिन समझ और कौशल की कमी
यह सही है कि कृषि के नए तरीके मौजूद हैं, लेकिन उन्हें अपनाने के लिए जरूरी जानकारी और कौशल का अभाव भी बड़ी रुकावट बन रहा है। अध्ययन के मुताबिक करीब 38 फीसदी किसानों को इसकी पूरी जानकारी नहीं, वहीं 25 से 27 फीसदी के पास जरूरी कौशल नहीं है। यह दिखाता है कि सिर्फ योजना बनाना काफी नहीं, उसे समझाना और सिखाना भी उतना ही जरूरी है।
सरकारी योजना—उम्मीद भी, उलझन भी
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जो गांव एनआईसीआरए कार्यक्रम से नहीं जुड़े है, वहां संस्थागत सहयोग और भी कमजोर है। यानी सरकारी और संस्थागत मदद का अभाव भी किसानों की राह मुश्किल बना रहा है।
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रीय जलवायु-सहिष्णु कृषि नवाचार पहल से जुड़े किसानों में जागरूकता तो बढ़ी, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ज्यादा बाधाओं को भी महसूस किया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि योजना असफल है—बल्कि यह दिखाता है कि योजना से जुड़े किसान अब चुनौतियों को ज्यादा समझने लगे हैं। जागरूकता बढ़ने से समस्याएं ज्यादा साफ दिखने लगी हैं। उन्हें समझ आने लगा है कि क्या चाहिए और क्या-क्या उनके पास नहीं है।
जहां साथ मिला, वहां राह हुई आसान
अध्ययन यह भी बताता है कि सहकारी समितियों से जुड़े किसान नई तकनीकें अपनाने में अपेक्षाकृत आगे हैं। यानी “सामूहिक ताकत” और “परिवार का सहयोग” बदलाव को आसान बनाते हैं।
इस अध्ययन का संदेश साफ और स्पष्ट है, यदि जलवायु-अनुकूल कृषि को सच में खेतों तक पहुंचाना है, तो किसानों को सस्ता और आसान कर्ज देना होगा। साथ ही तकनीकी प्रशिक्षण और जानकारी को मजबूत करना होगा और सरकारी योजनाओं को सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर भी प्रभावी बनाना होगा।
अंत में…एक सच्चाई जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, वह यह है कि जलवायु संकट सिर्फ बढ़ते तापमान की कहानी नहीं, यह उन किसानों की भी कहानी है, जो हर मौसम के साथ लड़ रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे अकेले पड़ते जा रहे हैं।
नई तकनीकें उम्मीद जरूर देती हैं, लेकिन उम्मीद तभी हकीकत बनेगी, जब किसान मजबूत होंगे, उनके पास पक्की जमीन होगी, जेब में सहारा होगा और सही जानकारी साथ होगी। ऐसे में जब तक किसानों की बुनियादी कमजोरियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक “जलवायु अनुकूल कृषि” सिर्फ एक अच्छा नारा बनकर रह जाएगा—हकीकत नहीं।