52 वर्षों में मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में हर दशक 20 से 40 फीसदी बढ़ा भीषण गर्मी का दायरा

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए अध्ययन से पता चला है कि 1980 के दशक में जहां गर्मी के कुछ छिटपुट हॉटस्पॉट थे, वहीं 2010 के दशक तक ये बड़े और लगातार जुड़े इलाकों में बदल गए; स्थिति यह है कि तटीय क्षेत्रों से निकलकर खतरनाक उमस भरी गर्मी अब देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच रही है
भीषण गर्मी में अपनी तैयार पैदावार को संजोते किसान; फोटो: आईस्टॉक
भीषण गर्मी में अपनी तैयार पैदावार को संजोते किसान; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारत में गर्मी का नक्शा तेजी से बदल रहा है। 1971 से 2022 के बीच के 52 वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित एक नए अध्ययन में सामने आया है कि मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में भीषण गर्मी की चपेट में आने वाला भू-भाग हर दशक 20 से 40 फीसदी तक बढ़ा है।

  • 1980 के दशक में जहां गर्मी के हॉटस्पॉट छोटे और अलग-अलग इलाकों तक सीमित थे, वहीं 2010 के दशक तक वे बड़े और आपस में जुड़े ‘हीट स्ट्रेस जोन’ में बदल गए।

  • अध्ययन में यह भी सामने आया कि खतरनाक उमस भरी गर्मी, जिसमें अधिक तापमान और नमी के कारण शरीर के लिए खुद को ठंडा करना मुश्किल हो जाता है, अब तटीय क्षेत्रों से आगे बढ़कर देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच रही है। 2021 तक इसके प्रभाव वाले क्षेत्र में करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

  • हालांकि जलवायु चरम स्थितियों का असर पूरे देश में एक जैसा नहीं है।

  • उत्तर-पश्चिम भारत में गर्मी और लू का दबाव सबसे अधिक बढ़ा है, जबकि दक्षिण भारत में सूखे का खतरा गहरा रहा है। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ वर्षों में 40 फीसदी से अधिक क्षेत्र में सूखे की स्थिति दर्ज हुई। दूसरी ओर, पूर्वोत्तर में एक साथ अत्यधिक बारिश और सूखे की स्थितियां बढ़ी हैं।

  • शोधकर्ताओं का कहना है कि बदलते जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पूरे देश के लिए एक जैसी रणनीति के बजाय क्षेत्र विशेष की जरूरतों के अनुसार हीट एक्शन, जल-सुरक्षा, सूखा प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण की तैयारी जरूरी है।

कभी गर्मियों में पेड़ों छांव और शाम की ठंडी हवा सुकून देती थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। भारत में गर्मी और उमस अब केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं रह गई। देश के बड़े हिस्से में भीषण गर्मी और सूखे का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

चिंता की बात यह है कि पिछले 52 वर्षों (1971–2022) के मौसम संबंधी आंकड़ों के व्यापक विश्लेषण से पता चला है कि मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में भीषण गर्मी की चपेट में आने वाला भू-भाग हर दशक 20 से 40 फीसदी तक बढ़ा है।

रिपोर्ट दर्शाती है कि 1980 के दशक में भीषण गर्मी और सूखे से जूझते जो इलाके कुछ अलग-थलग और गिने-चुने हिस्सों तक सीमित थे, वे 2010 के दशक तक आते-आते आपस में जुड़े बड़े क्षेत्रों 'हीट स्ट्रेस जोन' में बदल गए। यानी गर्मी अब कुछ गिने-चुने स्थानों की समस्या नहीं रही, बल्कि कई राज्यों और बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में एक साथ असर डाल रही है।

यह अध्ययन 1971 से 2022 के बीच भारत के मौसम में आए बदलावों पर आधारित है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी), पुणे, एट्रिया विश्वविद्यालय और नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग से जुड़े वैज्ञानिक शामिल थे।

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अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दिन के समय भीषण गर्मी, उमस भरी चिपचिपाती गर्मी, लू की गंभीरता और सूखे समेत सात अलग-अलग जलवायु खतरों को ध्यान में रखते हुए क्लाइमेट एक्सट्रीम्स इंडेक्स (सीईआई) तैयार किया है।

इसके लिए आईएमडी के पिछले पांच दशकों के मौसम संबंधी आंकड़ों की मदद ली गई है। साथ ही तापमान में आ रहे बदलावों की प्रवृत्ति को मैन-केन्डल परीक्षण के जरिए परखा गया।

छोटे इलाकों से निकलकर अब बड़े क्षेत्रों में फैल रही है गर्मी

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता और एट्रिया यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव डॉक्टर एम राजीवन के मुताबिक, पांच दशकों में सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ तापमान बढ़ना नहीं है, बल्कि गर्मी और सूखे की चरम स्थितियों का लगातार बड़े भू-भाग में फैलना है।

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उनके अनुसार, ये स्थितियां पहले कुछ सीमित इलाकों में दिखाई देती थीं, लेकिन अब बड़े और आपस में एक दूसरे से जुड़े क्षेत्रों में फैल गई हैं। इससे जलवायु जोखिम का पैमाना बदल गया है और भविष्य की तैयारी के लिए नए तरीके अपनाने की जरूरत है।

उत्तर-पश्चिम भारत बना गर्मी का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट

अध्ययन में पाया गया कि जलवायु की चरम स्थितियों का असर देश के हर हिस्से में एक जैसा नहीं है। उत्तर-पश्चिम भारत में दिन के तापमान, उमस भरी गर्मी और लू की तीव्रता में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस क्षेत्र में सूखे हालात, मिट्टी में घटती नमी और जमीन का तेजी से गर्म होना इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में गर्मी सिर्फ थर्मामीटर का बढ़ता पारा नहीं है। सूखी जमीन और कम होती नमी के बीच बढ़ता तापमान लोगों, कृषि और पानी की उपलब्धता पर एक साथ दबाव बढ़ा सकता है।

इसी तरह 45 वर्षों के वैश्विक जलवायु आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया है कि दुनिया के करीब हिस्से में चरम गर्मी का मौसम बढ़ा है। वहीं उत्तर-पश्चिमी भारत में मौसम से पहले ही गर्मियां दस्तक देने लगी है।

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यह बदलाव महज मौसम के कैलेंडर में फेरबदल नहीं है। सामान्य गर्मी शुरू होने से पहले पड़ने वाली असामान्य गर्मी के दौरान शरीर को तापमान के अनुरूप ढलने का पर्याप्त समय नहीं मिलता, जिससे हीट स्ट्रेस और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।

तटों से निकलकर अंदरूनी इलाकों तक पहुंची उमस भरी गर्मी

अध्ययन में एक और चिंताजनक बदलाव सामने आया है—खतरनाक उमस भरी गर्मी अब अपना दायरा बढ़ा रही है। तापमान बढ़ने के साथ जब हवा में नमी भी ज्यादा होती है, तो शरीर का पसीना आसानी से नहीं सूखता। ऐसे में शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता और गर्मी का असर कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है।

सबसे चिंता की बात है कि इस तरह की गर्मी तटीय इलाकों से आगे बढ़कर देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच रही है। हालात यह हैं कि 2021 तक इसके प्रभाव वाले क्षेत्र में करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

बता दें कि आईआईटी गांधीनगर से जुड़े वैज्ञानिकों ने भी अपने अध्ययन के खुलासा किया है कि वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी देश के आधे से अधिक हिस्से में मानसून की उमस और तपिश को गर्मियों की लू जितना ही जानलेवा बना देगी।

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इसका सबसे अधिक खतरा गंगा के मैदानी इलाकों, उत्तर-पश्चिमी भारत और पूर्वी तटीय क्षेत्रों में रहने वाले करीब 70 करोड़ लोगों पर मंडरा रहा है, जिनमें बड़ी संख्या खेतों, निर्माण स्थलों और अन्य श्रम-प्रधान कार्यों से जुड़े लोगों की है।

दक्षिण भारत में सूखे का बढ़ता दबाव

रिसर्च से पता चला है कि उत्तर-पश्चिम भारत के मुकाबले दक्षिण भारत में तस्वीर कुछ अलग है। देश में दक्षिण भारत सबसे तेजी से सूखने वाला क्षेत्र बनकर उभरा है। पूर्वी तट के साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में सूखे के लगातार बनते हॉटस्पॉट देखे गए। कुछ वर्षों में इन क्षेत्रों के 40 फीसदी से अधिक भू-भाग पर सूखे की स्थिति दर्ज की गई।

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वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि यह स्थिति कृषि, पेयजल और ग्रामीण आजीविका पर दबाव बढ़ा सकती है। ऐसे में दक्षिण भारत के लिए बढ़ती गर्मी से निपटने के साथ-साथ पानी को बचाने और लंबे समय तक उपलब्ध रखने की रणनीति भी जरूरी होगी।

पूर्वोत्तर में एक साथ बढ़ रही भारी बारिश और सूखे की स्थिति

पूर्वोत्तर भारत में जलवायु में आ रहे बदलाव की तस्वीर बेहद विचित्र है। यहां एक दिन में होने वाली बहुत भारी बारिश बढ़ने के साथ-साथ सूखे की अवधि भी अधिक बार दिखाई दे रही है। यानी एक ओर कम समय में बहुत अधिक बारिश हो रही है, तो दूसरी ओर बारिश के बीच सूखे की स्थितियां भी बढ़ रही हैं।

शोधकर्ताओं ने इसे मानसून की बढ़ती अस्थिरता का संकेत माना है।

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अध्ययन के प्रमुख लेखक और नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग से जुड़े थोटा मोहन के मुताबिक, देश के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते तापमान का असर एक जैसा नहीं है। उत्तर-पश्चिम में गर्मी और सूखे का दबाव बढ़ रहा है, जबकि पूर्वोत्तर में भारी बारिश और सूखे के बीच उतार-चढ़ाव में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

हर क्षेत्र के लिए अलग रणनीति की जरूरत

अध्ययन का संदेश साफ है, पूरे देश के लिए एक जैसी जलवायु रणनीति पर्याप्त नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने उत्तर-पश्चिम भारत में हीट एक्शन प्लान, दक्षिण भारत में सूखे और जल-सुरक्षा को मजबूत करने और पूर्वोत्तर में बाढ़ तथा भारी बारिश के बेहतर प्रबंधन पर जोर दिया है।

उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी केवल मौसम विभाग तक सीमित नहीं रह सकती। इसका असर कृषि, पानी, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर पड़ता है, इसलिए इन सभी क्षेत्रों को साथ लेकर रणनीति बनाने की जरूरत है।

शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि बड़े क्षेत्रों का औसत आंकड़ा कई बार स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली चरम स्थितियों को छिपा देता है। इसलिए जिले और स्थानीय स्तर तक उच्च-रिजॉल्यूशन पर निगरानी जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि कहां गर्मी, सूखा या बाढ़ का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।

हर साल बताएगा इंडेक्स, कहां बढ़ रहा है जलवायु का दबाव

शोधकर्ताओं ने क्लाइमेट एक्सट्रीम्स इंडेक्स को एक ऐसे ऑपरेशनल टूल के रूप में इस्तेमाल करने का सुझाव दिया है, जिसे सरकारी एजेंसियां हर साल चला सकें। इससे यह पहचानने में मदद मिल सकती है कि देश के किस हिस्से में जलवायु का दबाव बढ़ रहा है और वहां किस तरह की तैयारी की जरूरत है।

डॉक्टर राजीवन के मुताबिक, पूरे देश के लिए एक ही गर्मी संबंधी संदेश हर क्षेत्र की जरूरत पूरी नहीं कर सकता।

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ऐसे इंडेक्स का फायदा यह है कि इससे हर साल यह देखा जा सकता है कि किस इलाके में जलवायु का तनाव बढ़ रहा है, ताकि गर्मी, सूखे या बाढ़ से निपटने के उपाय उसी के अनुसार और सही जगह पर किए जा सकें।

कुल मिलाकर देखें तो देश में गर्मी का नक्शा बदल रहा है। जो भीषण गर्मी कभी कुछ इलाकों तक सीमित थी, वह अब बड़े भू-भाग में फैल रही है। इसके साथ ही सूखा, उमस और भारी बारिश जैसे खतरे भी अलग-अलग क्षेत्रों में अपना रूप बदल रहे हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन की चुनौती को समझने के लिए सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि पूरे जलवायु तंत्र में हो रहे बदलावों पर नजर रखनी होगी।

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