ओडिशा में बढ़ रहे 'हीट हॉटस्पॉट', क्यों शहरों से लेकर पहाड़ों तक तप रही धरती?

20 वर्षों के अध्ययन ने चेताया है कि ओडिशा में तेजी से बढ़ता शहरीकरण और घटती हरियाली नए गर्म इलाकों का जाल बुन रहे हैं, इसलिए अब हर जिले के लिए अलग जलवायु रणनीति जरूरी है।
स्टडी रिपोर्ट से पता चला है कि ओडिशा के कुछ जिले साल-दर-साल लगातार अत्यधिक गर्म बने रहते हैं। इनमें रायगढ़ा सबसे ऊपर है, जहां करीब 92.1 फीसदी क्षेत्र स्थाई रूप से थर्मल हॉटस्पॉट की चपेट में पाया गया। इसके बाद गजपति का 86.2 फीसदी, नयागढ़ का 76.1 फीसदी, बलांगीर में 75.02 फीसदी, नुआपड़ा में 66.1 फीसदी, कंधमाल का 62.6 फीसदी और कालाहांडी का 60.9 फीसदी हिस्सा बढ़ती गर्मी से जूझ रहा है।  

प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
स्टडी रिपोर्ट से पता चला है कि ओडिशा के कुछ जिले साल-दर-साल लगातार अत्यधिक गर्म बने रहते हैं। इनमें रायगढ़ा सबसे ऊपर है, जहां करीब 92.1 फीसदी क्षेत्र स्थाई रूप से थर्मल हॉटस्पॉट की चपेट में पाया गया। इसके बाद गजपति का 86.2 फीसदी, नयागढ़ का 76.1 फीसदी, बलांगीर में 75.02 फीसदी, नुआपड़ा में 66.1 फीसदी, कंधमाल का 62.6 फीसदी और कालाहांडी का 60.9 फीसदी हिस्सा बढ़ती गर्मी से जूझ रहा है। प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
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सारांश
  • ओडिशा में बढ़ती गर्मी अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांवों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों को भी अपनी चपेट में ले रही है।

  • आईआईटी भुवनेश्वर के वैज्ञानिकों द्वारा 20 वर्षों के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित अध्ययन से पता चला है कि राज्य में 'थर्मल हॉटस्पॉट' तेजी से फैल रहे हैं।

  • जहां एक ओर खुर्दा, कटक, गंजाम और सुंदरगढ़ जैसे शहरी व औद्योगिक जिलों में कंक्रीट, डामर और घटती हरियाली जमीन को अधिक गर्म बना रहे हैं, वहीं रायगढ़ा, गजपति, कालाहांडी, कंधमाल और नुआपड़ा जैसे वन एवं पहाड़ी जिलों में जंगलों की कटाई, बंजर होती जमीन और भूमि उपयोग में बदलाव ने हालात गंभीर कर दिए हैं।

  • अध्ययन के अनुसार रायगढ़ा का 92.1 प्रतिशत और गजपति का 86.2 प्रतिशत क्षेत्र स्थायी थर्मल हॉटस्पॉट की चपेट में है।

  • वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि यह रुझान जारी रहा तो हीटस्ट्रोक, हृदय व श्वसन रोग, कृषि उत्पादकता में गिरावट, बिजली की बढ़ती मांग और उद्योगों की लागत जैसी चुनौतियां और गहरी होंगी।

  • शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इस संकट से निपटने के लिए पूरे राज्य के बजाय हर जिले की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग जलवायु रणनीति अपनाना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

कभी भीषण गर्मी सिर्फ शहरों की पहचान मानी जाती थी, लेकिन अब तपिश गांवों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों तक पहुंच चुकी है। ऐसा ही कुछ ओडिशा में भी सामने आ रहा है, जहां धरती तेजी से तपने लगी है।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) भुवनेश्वर से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने नए अध्ययन में चेतावनी दी है कि राज्य में 'थर्मल हॉटस्पॉट्स' का दायरा खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। यह वे क्षेत्र हैं, जहां जमीन का तापमान लगातार आसपास के क्षेत्रों से कहीं अधिक बना रहता है।

देखा जाए तो यह तपिश अब महज पर्यावरण से जुड़ा एक आंकड़ा नहीं है। यह खेतों में पसीना बहाते किसानों, कंक्रीट की इमारतों के बीच हांफते मजदूरों और चिलचिलाती धूप में स्कूल जाते बच्चों की जिंदगी से जुड़ा एक कड़वा सच बन चुका है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर लोगों के स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।

इस अध्ययन के नतीजे रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंटल साइंस: एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं। अपने इस अध्ययन में शोधकर्ता दीक्षिका महापात्रा और डॉक्टर देबदत्ता स्वेन ने उपग्रहों से प्राप्त 20 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर ओडिशा के सभी 30 जिलों में गर्मी के बदलते स्वरूप का आकलन किया है।

तेजी से बढ़ रहे गर्मी के ‘हॉटस्पॉट’

अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि तेजी से शहरीकरण, औद्योगीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव वाले जिलों में 'थर्मल हॉटस्पॉट' सबसे तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर खुर्दा, गंजाम, कटक, सुंदरगढ़, संबलपुर, नयागढ़, पुरी, जाजपुर, अंगुल और झारसुगुड़ा में कंक्रीट की इमारतों, डामर की सड़कों, उद्योगों और घटती हरियाली के कारण जमीन पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्म हो रही है।

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स्टडी रिपोर्ट से पता चला है कि ओडिशा के कुछ जिले साल-दर-साल लगातार अत्यधिक गर्म बने रहते हैं। इनमें रायगढ़ा सबसे ऊपर है, जहां करीब 92.1 फीसदी क्षेत्र स्थाई रूप से थर्मल हॉटस्पॉट की चपेट में पाया गया। इसके बाद गजपति का 86.2 फीसदी, नयागढ़ का 76.1 फीसदी, बलांगीर में 75.02 फीसदी, नुआपड़ा में 66.1 फीसदी, कंधमाल का 62.6 फीसदी और कालाहांडी का 60.9 फीसदी हिस्सा बढ़ती गर्मी से जूझ रहा है।  

प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

इसी तरह कई तटीय जिलों में भी 'थर्मल हॉटस्पॉट' का दायरा हर साल 2 से 9 फीसदी तक बढ़ रहा है। निर्मित शहरी क्षेत्रों में यह वृद्धि सबसे अधिक दर्ज की गई। गौरतलब है कि डामर की सड़कें, कंक्रीट की इमारतें और हरियाली की कमी सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं, जिससे ये शहर रात में भी ठंडे नहीं हो पाते।

बढ़ती गर्मी से गांव और पहाड़ भी नहीं सुरक्षित

अध्ययन में यह भी खुलासा हुआ है कि बढ़ती तपिश अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। बालांगीर, कालाहांडी, रायगढ़ और गजपति जैसे पश्चिमी और पहाड़ी जिलों में भी स्थिति खराब हो रही है और वहां बड़े पैमाने पर थर्मल हॉटस्पॉट विकसित हो रहे हैं।

हालात किस कदर खराब है इसी से समझा जा सकता है कि रायगढ़ का 92.1 फीसदी, कंधमाल के 62.6, कालाहांडी के करीब 61 फीसदी, नुआपड़ा के 66.1 और गजपति का 86 फीसदी से ज्यादा हिस्से में लगातार अत्यधिक गर्म रहने वाले 'हीट हॉटस्पॉट' बन रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसके पीछे जंगलों का होता विनाश, हरियाली में आ रही कमी, बढ़ती बंजर भूमि और परती पड़े खेत मुख्य रूप से जिम्मेवार हैं। इन इलाकों में मिट्टी और चट्टानें दिनभर गर्मी सोखती हैं और रात में उसे छोड़ती रहती हैं, जिससे लगातार गर्मी का तनाव बना रहता है।

कुछ जिले लगातार झेल रहे हैं भीषण गर्मी

अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुछ जिले साल-दर-साल लगातार अत्यधिक गर्म बने रहते हैं। इनमें रायगढ़ा सबसे ऊपर है, जहां करीब 92.1 फीसदी क्षेत्र स्थाई रूप से थर्मल हॉटस्पॉट की चपेट में पाया गया। इसके बाद गजपति का 86.2 फीसदी, नयागढ़ का 76.1 फीसदी, बलांगीर में 75.02 फीसदी, नुआपड़ा में 66.1 फीसदी, कंधमाल का 62.6 फीसदी और कालाहांडी का 60.9 फीसदी हिस्सा बढ़ती गर्मी से जूझ रहा है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

यह स्थिति इसलिए ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि यह उन कमजोर वनवासी समुदायों को प्रभावित कर रही है जिनके पास गर्मी से बचने के आधुनिक साधन (जैसे एसी या कूलर) मयस्सर नहीं हैं।

इसके विपरीत बालेश्वर (3.4 फीसदी), जगतसिंहपुर (5.4 फीसदी) और भद्रक (4.2 फीसदी) जैसे तटीय जिलों में बंगाल की खाड़ी और नमी से भरपूर प्राकृतिक वातावरण के कारण ऐसे स्थाई हॉटस्पॉट अपेक्षाकृत कम पाए गए।

स्वास्थ्य, रोजगार और अर्थव्यवस्था पर बढ़ेगा खतरा

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि इन थर्मल हॉटस्पॉट का विस्तार इसी तरह जारी रहा तो इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा। बढ़ती गर्मी से बिजली की मांग बढ़ेगी, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा और उद्योगों की लागत भी बढ़ सकती है। मतलब कि यह गर्मी इंसानी सेहत के साथ-साथ राज्य की तरक्की की रफ्तार को भी धीमा कर सकती है।

खनन, निर्माण और कृषि जैसे क्षेत्रों में खुले आसमान के नीचे काम करने वाले मजदूरों के लिए अब सुरक्षित काम के घंटे कम हो रहे हैं। इससे न केवल उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है, बल्कि हीटस्ट्रोक, दिल और सांस की बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। बुजुर्ग और बच्चे इसके सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि गंजाम, सुंदरगढ़, खुर्दा और कटक में सबसे अधिक आबादी थर्मल हॉटस्पॉट के संपर्क में है, जबकि रायगढ़ और नयागढ़ में बड़ी आबादी लगातार अत्यधिक गर्मी झेल रही है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

शोधकर्ताओं ने एक दिलचस्प तथ्य भी दर्ज किया। 2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उद्योगों और वाहनों की गतिविधियां कम होने से लोगों का थर्मल हॉटस्पॉट के संपर्क में आना उल्लेखनीय रूप से घट गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे संकेत मिलता है कि शहरों में मानवीय गतिविधियों का बेहतर प्रबंधन गर्मी के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है।

हर जिले के लिए अलग रणनीति जरूरी

शोधकर्ताओं का कहना है कि पूरे राज्य के लिए एक जैसी नीति अपनाने के बजाय इससे निपटने के लिए जिलेवार जलवायु रणनीति तैयार करनी होगी।

इसके तहत तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक जिलों में गर्मी कम करने के लिए ठंडी छतें, धूप को परावर्तित करने वाली निर्माण सामग्री, पानी सोखने वाली सड़कें, छतों पर हरियाली (वर्टिकल गार्डन), शहरी वन और ग्रीन कॉरिडोर विकसित किए जाने चाहिए।

वहीं तटीय इलाकों में मैंग्रोव का संरक्षण जरुरी है। इसके साथ ही पश्चिमी और दक्षिणी जिलों में वनों की बहाली, जलग्रहण क्षेत्रों का बेहतर प्रबंधन और भूमि के विवेकपूर्ण उपयोग को प्राथमिकता देने की जरूरत है।

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