

भारतीय वैज्ञानिकों के 43 वर्षों के विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि आर्कटिक में घटती समुद्री बर्फ भारत के मानसून की दिशा और तीव्रता को बदल रही है।
जून–जुलाई में बर्फ की कमी से अगस्त–सितंबर की बारिश पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भारत में बढ़ रही है, जिससे बाढ़, सूखे और कृषि संकट का जोखिम गहरा सकता है।
उत्तर ध्रुव में जमा सदियों पुरानी बर्फ अब दरक रही है और उसकी गूंज भारत के खेतों तक सुनाई दे रही है। हजारों किलोमीटर दूर बढ़ती गर्मी अब मानसून की दिशा, ताकत और किसान की किस्मत तक को बदलने लगी है।
देखा जाए तो भारत में मानसून महज एक मौसम नहीं, बल्कि देश की जीवनरेखा भी है। जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश से ही देश को सालाना वर्षा का करीब 80 फीसदी पानी मिलता है। यही वजह है कि देश में कृषि, पीने का पानी, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था, सब कुछ काफी हद तक मानसून पर ही टिका है।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिकों ने इसमें दो बड़े बदलाव देखे हैं, पहला, कुल मिलाकर मानसून के दौरान होने वाली बारिश की मात्रा बढ़ रही है। दूसरा, मानसून के आखिरी महीनों (अगस्त–सितंबर) में भारी बारिश का क्षेत्र धीरे-धीरे पश्चिम की ओर खिसक रहा है।
लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। इन्हीं सवालों की तलाश में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (आईआईटीएम) से जुड़े वैज्ञानिकों ने एक नया अध्ययन किया है। इस अध्ययन के नतीजे संकेत देते हैं कि उत्तरी ध्रुव पर पिघलती बर्फ भारत में मानसूनी बारिश की तीव्रता और उसके भौगोलिक फैलाव को गहराई से प्रभावित कर रही है।
यह सुनने में अजीब लग सकता है कि उत्तरी ध्रुव के पास बर्फ के पिघलने से उसका असर भारत में बारिश पर पड़ रहा है। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि पृथ्वी की जलवायु एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है।
आर्कटिक में पिघलती बर्फ से बदल रही मानसून की राह
अध्ययन में सामने आया है कि जून से जुलाई के बीच आर्कटिक में समुद्री बर्फ में आने वाली कमी अगस्त से सितंबर के बीच मानसूनी बारिश को गहराई से प्रभावित करती है।
शोध के अनुसार, जिन वर्षों में आर्कटिक में समुद्री बर्फ कम रही, उन वर्षों में भारत में मानसून अधिक तीव्र रहा। खास बात यह है कि बारिश का झुकाव अब पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भारत की तरफ ज्यादा होने लगा है।
अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता हेमंतकुमार एस चौधरी के मुताबिक, “बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण जब आर्कटिक में बर्फ पिघलती है तो उससे धरती की ऊर्जा संतुलन प्रणाली पर असर पड़ता है। इससे वातावरण में गर्मी के प्रवाह और ऊपरी स्तर की हवाओं का पैटर्न बदलता है। यही बदलाव दूर-दूर तक असर डालते हैं और अंततः मानसून की दिशा और ताकत को प्रभावित कर सकते हैं।"
सरल शब्दों में कहें तो, जब आर्कटिक गर्म होता है और बर्फ घटती है, उसके साथ ही वायुमंडल में हवा और दबाव के पैटर्न बदलते हैं। यही बदलाव हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण एशिया के मानसून को प्रभावित करते हैं।
43 वर्षों के आंकड़ों से मिला संकेत
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1979 से 2022 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इसके परिणाम बेहद स्पष्ट थे, जून-जुलाई में आर्कटिक बर्फ जितनी कम रही, अगस्त-सितंबर में मानसूनी बारिश उतनी अधिक हुई। सबसे अहम बात यह रही कि जून–जुलाई में बर्फ की स्थिति का असर खास तौर पर अगस्त–सितंबर की बारिश पर दिखा। यानी मानसून के शुरुआती महीनों में आर्कटिक की स्थिति, उसके अंतिम चरण का रुख तय कर सकती है।
लंबी अवधि के रुझान बताते हैं कि जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ घट रही है, पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत में बारिश बढ़ रही है। यही वह बदलाव है जिसे मौसम वैज्ञानिक “मानसून का पश्चिम की ओर खिसकना” कह रहे हैं।
इस अध्ययन के नतीजे अंतरराष्ट्रीय जर्नल ओशियन-लैंड-एटमॉस्फेयर रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं और आईआईटीएम में वैज्ञानिक सुबोध कुमार साहा के मुताबिक, “आर्कटिक में शुरुआती गर्मी का असर मानसून के अंतिम चरण पर सबसे ज्यादा दिखाई देता है।“
वैज्ञानिकों ने इसकी पुष्टि के लिए आंकड़ों के साथ-साथ कंप्यूटर आधारित उन्नत जलवायु मॉडलों की भी मदद ली है। इन मॉडलों ने भी वही तस्वीर दोहराई। इन मॉडलों में वायुमंडल, महासागर, भूमि और समुद्री बर्फ, सभी कारकों को शामिल किया गया। नतीजे बताते हैं कि ऊपरी वायुमंडलीय हवाओं में बदलाव मानसून की दिशा में आने वाले बदलाव में अहम भूमिका निभाता है।
बाढ़-सूखे के साथ कृषि को लेकर चिंतित वैज्ञानिक
मानसून की दिशा में आ रहा यह बदलाव महज मौसम से जुड़ा मसला नहीं है। अगर बारिश पश्चिम और उत्तर-पश्चिम भारत में ज्यादा केंद्रित होती है, तो वहां बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
वहीं दूसरी तरफ मध्य और पूर्वी भारत में अपेक्षाकृत कम बारिश से सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। देखा जाए तो अगस्त-सितंबर में होने वाली बारिश खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।
ऐसे में इस बदलाव का सीधा असर खेती पर पड़ सकता है, जलाशयों के प्रबंधन में नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं और शहरों में बाढ़ तथा जल संकट का खतरा बढ़ सकता है। चिंता की बात यह है कि आर्कटिक समुद्री बर्फ लगातार घट रही है, यानी यह बदलाव अस्थाई नहीं बल्कि लंबे समय तक रहने वाली प्रवृत्ति का संकेत हो सकता है।
बदलती दुनिया, बदलता मानसून
पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। यह अध्ययन दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन की कड़ियां कितनी गहराई से जुड़ी हैं, आर्कटिक में पिघलती बर्फ भारत के खेतों तक असर डाल सकती है।
वैज्ञानिक अब लंबे समय के और अधिक विस्तृत आंकड़ों के साथ इस संबंध को और मजबूत तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि भविष्य में मानसून का बेहतर पूर्वानुमान लगाया जा सके।
इस अध्ययन का सबसे बेहद स्पष्ट है, दुनिया के एक छोर पर हो रहे बदलाव अब भारत में मानसून की दिशा तय कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन की कोई सीमा नहीं है। ऐसे में अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में बारिश का संतुलन और बिगड़ सकता है और इसकी कीमत खेतों से लेकर शहरों तक सभी को चुकानी पड़ सकती है।