

भारतीय वैज्ञानिकों ने गोदावरी घाटी के कोयला क्षेत्रों में 25 करोड़ साल जंगलों में लगी भीषण आग के प्रमाण खोजे।
आधुनिक तकनीकों की मदद से शोधकर्ताओं ने प्राचीन गोंडवाना जंगलों में लगी आग के रासायनिक और सूक्ष्म अवशेष पहचाने।
अध्ययन में पता चला कि पर्मियन काल में अलग-अलग तीव्रता वाली जंगल की आग ने पर्यावरण को प्रभावित किया था।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शोध प्राचीन जलवायु परिवर्तन और कोयला बनने की प्रक्रिया समझने में महत्वपूर्ण साबित होगा।
शोधकर्ताओं ने कहा कि प्राचीन जंगल की आग के अध्ययन से वर्तमान बढ़ती आग की घटनाओं को समझने में मदद मिलेगी।
भारत के वैज्ञानिकों ने एक अहम शोध में लगभग 25 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर लगी जंगल की भयंकर आग के प्रमाण खोजे हैं। यह आग उस समय के गोंडवाना महाद्वीप के घने जंगलों में लगी थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज पृथ्वी के पुराने जलवायु परिवर्तन, वनस्पति और कोयला बनने की प्रक्रिया को समझने में बहुत मदद करेगी।
यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया है। शोध के परिणाम हाल ही में प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका “जियोलॉजिकल जर्नल” में प्रकाशित हुए हैं।
गोंडवाना के जंगलों में आग के संकेत
वैज्ञानिकों ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश क्षेत्र में स्थित गोदावरी घाटी कोलफील्ड के कोयला वाले चट्टानी क्षेत्रों का अध्ययन किया। इन चट्टानों की उम्र लगभग 25 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती है, जो पर्मियन काल से जुड़ी हैं।
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को चट्टानों और कोयले में जले हुए पौधों के अवशेष, सूक्ष्म चारकोल कण और गर्मी से बदले हुए कार्बनिक पदार्थ मिले। इन सबूतों से यह स्पष्ट हुआ कि उस समय बड़े पैमाने पर जंगलों में आग लगी थी।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उस दौर में गोंडवाना क्षेत्र में घने जंगल और दलदली वन थे। आग लगने के बाद इन वनस्पतियों के अवशेष समय के साथ दबते गए और बाद में कोयले में बदल गए।
आधुनिक तकनीक से हुई पुष्टि
पहले के शोधों में केवल माइक्रोस्कोप से चारकोल कणों को देखकर जंगल की आग का अनुमान लगाया जाता था। लेकिन कई बार यह तरीका पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जाता था। इस बार वैज्ञानिकों ने नई और आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया। उन्होंने पैलिनोफेसीज विश्लेषण, रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी और एफटीआईआर स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी उन्नत तकनीकों की मदद ली।
इन तकनीकों से वैज्ञानिक यह समझ पाए कि कौन-से कण वास्तव में आग से बने थे और कौन-से सामान्य ऑक्सीकरण के कारण बने। इससे शोध को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाया गया।
आग की तीव्रता का भी चला पता
शोध में वैज्ञानिकों ने अलग-अलग प्रकार के माइक्रोचारकोल कणों की पहचान की। उन्होंने पाया कि कुछ कण तेज और भीषण आग के कारण बने थे, जबकि कुछ कम तीव्रता वाली आग से जुड़े थे।
वैज्ञानिकों ने इन कणों की बनावट, आकार और संरचना का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि उस समय कई बार अलग-अलग स्तर की आग लगी थी। इससे यह भी पता चलता है कि उस काल का पर्यावरण और जलवायु काफी बदलती रहती थी।
जलवायु परिवर्तन को समझने में मिलेगी मदद
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज केवल पुराने जंगलों की आग तक सीमित नहीं है। इससे पृथ्वी के पुराने जलवायु चक्र को समझने में भी सहायता मिलेगी।
जंगल की आग वातावरण में बड़ी मात्रा में कार्बन छोड़ती है, जिसका असर तापमान और मौसम पर पड़ता है। यदि प्राचीन काल की आग और जलवायु के संबंध को सही तरीके से समझा जाए, तो आज के जलवायु परिवर्तन का अध्ययन भी बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार आज दुनिया के कई हिस्सों में जंगल की आग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में प्राचीन आग के रिकॉर्ड भविष्य के पर्यावरणीय बदलावों का अनुमान लगाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने जताई उम्मीद
इस अध्ययन में वैज्ञानिक का कहना है कि भारत के गोंडवाना क्षेत्रों में अभी भी ऐसे कई भू-वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं, जिनका अध्ययन भविष्य में और नई जानकारियां दे सकता है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तरह के शोध से पृथ्वी के इतिहास, प्राचीन वनस्पतियों और प्राकृतिक आपदाओं के बारे में हमारी समझ और मजबूत होगी। साथ ही यह शोध आधुनिक जलवायु संकट को समझने और उससे निपटने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।