

जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे पौधे, जानवर और पारिस्थितिक तंत्र गंभीर खतरे में हैं।
उच्च तापमान और बदलते मौसम जंगल और जमीन को अधिक जलनशील बना रहे हैं, जिससे आग का मौसम लंबा और तीव्र हो रहा है।
लगभग 84% संवेदनशील प्रजातियां, विशेषकर छोटे क्षेत्र में रहने वाली, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया में अधिक खतरे में हैं।
कुछ प्रजातियां, जिन्हें पहले आग से खतरा नहीं था, अब नए जोखिम का सामना कर रही हैं और उनका अध्ययन आवश्यक है।
मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में उत्सर्जन घटाने से प्रजातियों का खतरा 60 फीसदी तक कम हो सकता है, संरक्षण योजनाएं और प्रभावी बनेंगी।
पृथ्वी पर तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसका असर केवल मौसम पर ही नहीं बल्कि हमारे जंगलों और जीवन पर भी पड़ रहा है। हाल ही में गॉथेनबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। यह केवल जंगलों के लिए ही नहीं बल्कि कई पौधों, जानवरों और फफूंदों के जीवन के लिए भी गंभीर खतरा बन गई हैं।
जंगलों में आग क्यों बढ़ रही है
जैसे-जैसे दुनिया गर्म हो रही है, जमीन और पौधों में नमी कम हो रही है। इससे जंगल और खेत ज्यादा जलनशील हो जाते हैं। इसके अलावा, मौसम में बदलाव आग लगने के आसार को और बढ़ा देते हैं। शोध में यह भी दिखाया गया है कि अब आग उन क्षेत्रों में भी फैल रही है जो पहले सुरक्षित माने जाते थे, जैसे कि ध्रुवीय क्षेत्रों के पास। कई जगहों पर, जंगलों में आग का मौसम पहले की तुलना में दोगुना लंबा हो सकता है। यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
वैश्विक स्तर पर असर
शोध में यह भी बताया गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 84 फीसदी ऐसे प्राणी और पौधे, जो पहले से ही आग के प्रति संवेदनशील हैं, अब और अधिक खतरे में हैं। शोधकर्ताओं ने 13 अलग-अलग जलवायु मॉडल का उपयोग करके भविष्य में जंगलों में आग लगने वाले क्षेत्रों और आग के मौसम की लंबाई का अनुमान लगाया। इसके बाद उन्होंने प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) के रेड लिस्ट में दर्ज 9,592 प्रजातियों पर इसका असर देखा गया।
शोध के अनुसार, छोटे क्षेत्र में रहने वाले प्राणी और पौधे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया में सबसे अधिक संवेदनशील प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से कई प्रजातियां पहले से ही संकटग्रस्त हैं और यदि जंगलों में आग बढ़ती रही, तो उनका विलुप्त होने का खतरा और बढ़ जाएगा।
नई चुनौतियां
कुछ प्रजातियां, जिन्हें पहले जंगल की आग से खतरा नहीं था, अब नए खतरे का सामना कर रही हैं। पर इन प्रजातियों पर अभी पर्याप्त शोध नहीं हुआ है कि यह खतरा कितना गंभीर है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में आग की घटनाएं और लंबी तथा तीव्र हो सकती हैं, जो पूरे पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
क्षेत्रीय अंतर
जैसा कि शोध में दिखाया गया है, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आग का खतरा अलग-अलग होगा। अधिकांश जगहों पर आग का खतरा बढ़ेगा, लेकिन अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भविष्य में बारिश बढ़ने की संभावना के कारण आग का खतरा कम हो सकता है। इसके अलावा, आर्कटिक के पास के क्षेत्रों में भी जंगलों में आग लगने का नया खतरा उभर रहा है।
जलवायु कार्रवाई से मदद
शोध यह भी दर्शाता है कि अगर हम उत्सर्जन को सीमित करने के उपाय करें, तो जंगलों में आग लगने की घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य की तुलना में मध्यम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में संवेदनशील प्रजातियों का खतरा 60 फीसदी तक कम किया जा सकता है। न्यूजीलैंड, दक्षिण अमेरिका और आर्कटिक के पास के क्षेत्रों को सबसे अधिक फायदा होगा।
संरक्षण रणनीतियों में बदलाव जरूरी
अधिकांश संरक्षण रणनीतियां केवल धीरे-धीरे होने वाले पर्यावरणीय बदलाव पर केंद्रित होती हैं। लेकिन जंगलों में आग जैसी अचानक घटनाएं, प्रजातियों को तेजी से खतरे में डाल सकती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर भविष्य में जंगलों की आग को ध्यान में नहीं रखा गया, तो कई संवेदनशील प्रजातियों के लिए बचाव योजनाएं अपर्याप्त साबित हो सकती हैं।
विश्व के जंगलों और जीव-जंतुओं के लिए आग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन इसे और तीव्र बना रहा है। यह केवल जंगलों का ही नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र का संकट है। यदि उत्सर्जन कम करने और संरक्षण रणनीतियों में बदलाव नहीं किया गया, तो भविष्य में कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती हैं।