20 सालों में पीएम2.5 बना 88 लाख से अधिक कैंसर के मामलों की वजह, अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा

आंकड़े बताते हैं कि हवा में पीएम2.5 की मात्रा में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी के साथ कैंसर का खतरा करीब 16 फीसदी बढ़ जाता है
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई
Published on
सारांश
  • जहरीली हवा अब सिर्फ फेफड़ों की दुश्मन नहीं, बल्कि कैंसर का बढ़ता खतरा बन चुकी है। नेचर हेल्थ में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, 2000 से 2020 के बीच दुनिया में दर्ज कैंसर के 10.9 करोड़ मामलों में से करीब 88.2 लाख मामले पीएम2.5 प्रदूषण से जुड़े थे।

  • अध्ययन में 952 स्थानों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और पाया गया कि हवा में पीएम2.5 की मात्रा में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी के साथ सभी तरह के कैंसर का खतरा करीब 16 फीसदी बढ़ जाता है।

  • इसी तरह ओजोन में इतनी ही बढ़ोतरी से कैंसर का जोखिम 4.23 फीसदी और गाड़ियों और कारखानों के धुएं से निकलने वाली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के मामले में 11.7 फीसदी अधिक पाया गया।

  • खतरा केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क का संबंध किडनी, मूत्राशय, स्तन, ग्रासनली और कोलन-रेक्टम जैसे कैंसर से भी पाया गया।

  • इसी तरह महिलाओं में कई प्रकार के कैंसर का प्रदूषण से जुड़ा जोखिम अधिक रहा, जिससे संकेत मिलता है कि इसके स्वास्थ्य प्रभावों को लैंगिक अंतर के साथ समझना जरूरी है।

  • दुनिया की करीब 99 फीसदी आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है, जो स्वास्थ्य दिशानिर्देशों से अधिक प्रदूषित है। ऐसे में साफ हवा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कैंसर की रोकथाम और जीवन बचाने की अनिवार्य जरूरत है।

हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वही हवा धीरे-धीरे हमारे शरीर में जहर घोल रही है। प्रतिष्ठित जर्नल नेचर हेल्थ में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन ने इससे जुड़ा चौंकाने वाला भयावह सच सामने रखा है।

अध्ययन में खुलासा हुआ है कि 2000 से 2020 के बीच दुनियाभर में दर्ज हुए कैंसर 10.9 करोड़ मामलों में से 88.2 लाख मामलों की सीधी वजह हवा में घुले महीन कण 'पीएम2.5' थे।

चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए इस विश्लेषण में दुनिया के 952 स्थानों के कैंसर और वायु प्रदूषण से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने पीएम2.5 के साथ-साथ ओजोन (ओ₃) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ₂) के लंबे समय तक संपर्क से जुड़े कैंसर के जोखिम का भी आकलन किया है।

यह रिपोर्ट बताती है कि हवा में पसरा प्रदूषण अब सिर्फ सांस या फेफड़ों की बीमारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हमारे जीवन पर एक गंभीर महामारी बनकर मंडरा रहा है।

हर 10 माइक्रोग्राम बढ़ोतरी के साथ बढ़ा कैंसर का खतरा

अध्ययन में पीएम2.5 सबसे बड़ा कातिल बनकर उभरा है। आंकड़े बताते हैं कि हवा में पीएम2.5 की मात्रा में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी के साथ सभी तरह के कैंसर का खतरा करीब 16 फीसदी बढ़ जाता है। इसी तरह ओजोन में इतनी ही बढ़ोतरी से कैंसर का जोखिम 4.23 फीसदी और गाड़ियों और कारखानों के धुएं से निकलने वाली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के मामले में 11.7 फीसदी अधिक पाया गया।

यह भी पढ़ें
जहरीली हवा में सांस ले रही है दुनिया की 99 फीसदी आबादी: विश्व स्वास्थ्य संगठन
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई

निष्कर्ष दर्शाते हैं कि प्रदूषित हवा सिर्फ सांसों पर ही नहीं, जिंदगी पर भी भारी पड़ रही है। 2000 से 2020 के बीच दुनिया में पीएम2.5 से जुड़े करीब कैंसर के करीब 88.2 लाख मामले सामने आए।

इसी तरह समान अवधि में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से जुड़े करीब 66.7 लाख और ओजोन से जुड़े कैंसर के 25.9 लाख मामले पाए गए। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं है कि कैंसर का हर मामला किसी एक प्रदूषक के कारण हुआ।

कैंसर एक जटिल बीमारी है, जिसमें उम्र, आनुवंशिकता, धूम्रपान, शराब, खान-पान, संक्रमण और अन्य पर्यावरणीय कारक भी भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब प्रदूषण करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है, तो जोखिम में छोटी-सी बढ़ोतरी भी लाखों अतिरिक्त मामलों में बदल सकती है।

सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं खतरा

अब तक आम धारणा यह थी कि वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन इस अध्ययन ने इस भ्रम को तोड़कर रख दिया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन बेहद छोटे कणों का आकार ही इन्हें ज्यादा खतरनाक बनाता है। पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं।

शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। इतना ही नहीं ये कण लंबे समय में कोशिकाओं के सामान्य कामकाज को भी प्रभावित कर सकते हैं।

यह भी पढ़ें
सांसों में जहर: वायु प्रदूषण से डीएनए में हो रहे घातक जेनेटिक बदलाव
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई

यही वजह है कि यह जहर केवल फेफड़ों तक सीमित न रहकर कैंसर से जुड़े आनुवंशिक बदलाव, थायरॉयड, ग्रास नली, कोलन-रेक्टम और स्तन कैंसर जैसे रोगों से भी जुड़ा पाया गया है।

अध्ययन दर्शाता है कि पीएम2.5 में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी किडनी से जुड़े कैंसर के जोखिम में 17.9 फीसदी और मूत्राशय (ब्लैडर) संबंधी कैंसर के जोखिम में 21.1 फीसदी की वृद्धि से जुड़ी थी।

महिलाओं पर ज्यादा असर की चिंता

अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष महिलाओं से जुड़ा है। अधिकांश प्रकार के कैंसर में महिलाओं में प्रदूषण से जुड़ा जोखिम और उसका बोझ लगातार अधिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने इसके पीछे कोई एक कारण तय नहीं किया है। घर के भीतर धुएं का संपर्क, खाना पकाने के ईंधन, काम की परिस्थितियां, शरीर की जैविक संरचना और हार्मोन तथा प्रतिरक्षा तंत्र में अंतर जैसे कई कारक इसमें भूमिका निभा सकते हैं।

यह भी पढ़ें
सांसों के साथ जहर: प्रदूषित हवा से महिलाओं में बढ़ रहा स्तन कैंसर का खतरा
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई

यह निष्कर्ष इस बात की ओर भी इशारा करता है कि वायु प्रदूषण का असर महिलाओं और पुरुषों पर एक जैसा नहीं होता। इसलिए इसके स्वास्थ्य प्रभावों को समझने और रोकथाम की रणनीति बनाने में दोनों के बीच के अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।

टाला जा सकता है फेफड़ों के कैंसर का बड़ा हिस्सा

अध्ययन के मुताबिक, श्वासनली, ब्रॉन्कस और फेफड़ों के कैंसर के करीब 17.9 फीसदी मामलों को पीएम2.5 के संपर्क को खत्म या नियंत्रित करके संभावित रूप से रोका जा सकता है। इससे साफ है कि साफ हवा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कैंसर की रोकथाम का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।

99 फीसदी आबादी ले रही है दूषित हवा में सांस

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रुझानों के मुताबिक, दुनिया की करीब 99 फीसदी आबादी ऐसी हवा में सांस लेती है, जिसमें प्रदूषकों का स्तर स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों से अधिक है। सबसे ज्यादा जोखिम निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहने वाली आबादी पर है।

2016 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने वायु प्रदूषण को ग्रुप-1 कार्सिनोजेन यानी कैंसर पैदा करने वाला प्रमाणित कारक घोषित किया था। पहले इसका संबंध मुख्य रूप से फेफड़ों के कैंसर से जोड़ा जाता था, लेकिन अब शोध लगातार इसके व्यापक प्रभावों की ओर संकेत कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें
आवरण कथा, जहरीली हवा का दंश, भाग-पांच: बच्चों में कैंसर की वजह बन रहा है वायु प्रदूषण
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई

साफ हवा सिर्फ सांसों के लिए नहीं, जिंदगी के लिए जरूरी

वाहनों का धुआं, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण, बिजली उत्पादन, कचरा और ईंधन का दहन, ये सब हवा में ऐसे प्रदूषक छोड़ते हैं, जिनका असर शरीर पर वर्षों तक बना रह सकता है। पीएम2.5 को लेकर खास चिंता इसलिए है क्योंकि इसे आंखों से देखना मुश्किल है, लेकिन इसका असर शरीर के भीतर गहरा हो सकता है।

हवा साफ होने या खराब होने का फर्क हमें हर पल दिखाई नहीं देता, मगर हमारा शरीर उसे महसूस करता रहता है।

यह भी पढ़ें
धूम्रपान न करने वालों में भी बढ़ रहा है फेफड़ों का कैंसर, क्या प्रदूषण है कसूरवार
पीएम2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई में उतरकर सीधे हमारे रक्त में शामिल हो जाते हैं। शरीर में पहुंचकर ये कण ऑक्सीडेटिव तनाव और डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली को पंगु बनाकर ये कई तरह के म्यूटेशन भी पैदा करते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: सीएसई

शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्ययन के निष्कर्ष वायु गुणवत्ता में सुधार से जुड़ी नीतियों को मजबूत करने का महत्वपूर्ण आधार देते हैं। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना, स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण और घरों में साफ ईंधन की उपलब्धता बढ़ाना जैसे कदम न केवल सांस और हृदय रोगों को कम कर सकते हैं, बल्कि कैंसर के बढ़ते बोझ को भी घटाने में मदद कर सकते हैं।

हमे समझना होगा कि साफ हवा कोई विलासिता नहीं है। यह हर इंसान का बुनियादी अधिकार है, जो कैंसर से बचाव की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों में से एक हो सकती है।

देश में वायु गुणवत्ता की ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं 

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in