

दुनिया की थाली पर एक साथ कई संकटों का दबाव बढ़ रहा है। 2026 में वैश्विक अनाज उत्पादन 2.1 फीसदी घटकर 297.9 करोड़ टन रहने का अनुमान है।
हालांकि यह अब भी दूसरा सबसे बड़ा उत्पादन स्तर होगा, लेकिन गेहूं, चावल और मक्के जैसी प्रमुख फसलों पर मौसम की मार, जलवायु संकट और वैश्विक आपूर्ति बाधाओं ने चिंता बढ़ा दी है।
भारत में मानसून की असमान बारिश से धान के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अल नीनो की स्थिति चावल की पैदावार के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकती है।
उत्पादन में संभावित गिरावट ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक खाद्य कीमतें लगातार तीसरे महीने बढ़ी हैं। सितंबर 2026 में खाद्य मूल्य सूचकांक 1.5 फीसदी बढ़ा, जबकि पिछले साल की तुलना में इसमें 5.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई।
काला सागर क्षेत्र में परिवहन बाधाएं, समुद्री व्यापार की अनिश्चितता और दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी-सूखे जैसी चरम मौसमी स्थितियां खाद्य आपूर्ति को प्रभावित कर रही हैं।
इन आंकड़ों का असर सिर्फ वैश्विक बाजार तक सीमित नहीं है। महंगा होता अनाज सीधे परिवारों के महीने के बजट, भोजन की गुणवत्ता और बच्चों के पोषण को प्रभावित कर सकता है। बदलते मौसम और भू-राजनीतिक तनाव के बीच चुनौती सिर्फ पर्याप्त अनाज पैदा करने की नहीं, बल्कि उसे हर परिवार की पहुंच में बनाए रखने की भी है।
किसी परिवार के लिए खाने-पीने की चीजों की कीमत का बढ़ना सिर्फ बाजार का आंकड़ा नहीं होता। इसका असर सीधे महीने के बजट, थाली में रखे भोजन और बच्चों के पोषण पर पड़ता है। गेहूं, चावल, मक्का और चीनी जैसी रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी इसलिए सबसे ज्यादा महसूस होती है, क्योंकि इनसे बचना आसान नहीं होता।
दुनिया इस समय कुछ ऐसी ही चुनौती से गुजर रही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के ताजा आकलन के मुताबिक, 2026 में वैश्विक अनाज उत्पादन पिछले साल की तुलना में घटने का अनुमान है।
दूसरी ओर, सितंबर 2026 में वैश्विक खाद्य कीमतों में लगातार तीसरे महीने बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे संकेत मिलता है कि खाद्य बाजार पर मौसम, जलवायु संकट, उत्पादन में उतार-चढ़ाव और वैश्विक परिवहन व्यवस्था का दबाव एक साथ बढ़ रहा है।
2026 में वैश्विक अनाज उत्पादन 2.1 फीसदी घटने का अनुमान
एफएओ के नए 'सीरियल सप्लाई एंड डिमांड ब्रीफ' के अनुसार, 2026 में दुनिया में कुल 297.9 करोड़ टन अनाज पैदा होने का अनुमान है। यह 2025 की तुलना में 2.1 फीसदी कम है। हालांकि, उत्पादन में गिरावट के बावजूद यह अब तक का दूसरा सबसे बड़ा वैश्विक अनाज उत्पादन स्तर होगा। इससे पहले 2025 में रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज दिया गया था।
अनाज उत्पादन के इस अनुमान में अलग-अलग फसलों और क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
एफएओ ने वैश्विक गेहूं उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर 81.4 करोड़ टन किया है। ऑस्ट्रेलिया में मौसम की स्थिति में सुधार से वहां गेहूं की पैदावार बेहतर रहने की उम्मीद है। लेकिन यह राहत पूरी तस्वीर नहीं बदलती।
दुनिया के मोटे अनाज, जिसमें मक्का जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं, का उत्पादन अब 161.2 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यूरोपीय संघ और अमेरिका में गर्म और शुष्क मौसम ने फसलों की पैदावार को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
यानी एक तरफ कुछ क्षेत्रों में बेहतर मौसम उत्पादन को सहारा दे रहा है, तो दूसरी तरफ बढ़ती गर्मी और सूखे जैसी स्थितियां दुनिया के दूसरे हिस्सों में फसलों की क्षमता को कमजोर कर रही हैं।
भारत में असमान मानसून से धान उत्पादन पर असर
धान के मामले में भारत की स्थिति वैश्विक तस्वीर को प्रभावित कर रही है। एफएओ ने 2026 में वैश्विक धान उत्पादन का अनुमान 55.3 करोड़ टन लगाया है।
लेकिन भारत में मानसूनी बारिश के असमान वितरण ने धान उत्पादन की संभावनाओं को कमजोर किया है। जापान और नेपाल में उत्पादन के बेहतर अनुमान से वैश्विक स्तर पर कुछ भरपाई होने की उम्मीद है, लेकिन भारत में कमजोर उत्पादन का असर वैश्विक चावल बाजार पर पड़ सकता है।
गौरतलब है कि भारत दुनिया के प्रमुख धान उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। इसलिए यहां बारिश का असमान वितरण सिर्फ किसानों की आय या स्थानीय बाजार का सवाल नहीं है, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
अल नीनो ने बढ़ाई धान को लेकर चिंता
मौसम की अनिश्चितता आने वाले महीनों में खाद्य सुरक्षा के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है। एफएओ के मुताबिक, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में धान की पैदावार पर अल नीनो का खास असर पड़ सकता है।
अल नीनो की स्थिति के दौरान वैश्विक स्तर पर चावल की पैदावार सामान्य अनुमान की तुलना में औसतन एक से 1.5 फीसदी कम रह सकती है। इसके मुकाबले गेहूं और मक्के की पैदावार आमतौर पर सामान्य स्तर के आसपास रहती है, जबकि सोयाबीन का उत्पादन सामान्य रुझान से 1.5 से 2 फीसदी अधिक हो सकता है।
एफएओ के अनुसार, मजबूत अल नीनो घटनाओं में पैदावार के प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक अनुमानित होते हैं, जबकि कमजोर अल नीनो की स्थिति में उत्पादन में उतार-चढ़ाव ज्यादा देखने को मिल सकता है। यह स्थिति बताती है कि जलवायु और मौसम अब सिर्फ किसानों के लिए जोखिम नहीं रह गए हैं। इनका असर वैश्विक खाद्य बाजार और अंततः उपभोक्ताओं की रसोई तक पहुंच सकता है।
सितंबर में लगातार तीसरे महीने बढ़ीं वैश्विक खाद्य कीमतें
अनाज उत्पादन में गिरावट की खबर ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक खाद्य कीमतों पर पहले से दबाव बना हुआ है।
खाद्य संगठन के अनुसार, सितंबर 2026 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक 136 अंक पर पहुंच गया। यह अगस्त की तुलना में दो अंक यानी 1.5 फीसदी अधिक है। सितंबर 2025 की तुलना में भी खाद्य कीमतों में 5.8 फीसदी की वृद्धि हुई है। हालांकि, यह सूचकांक मार्च 2022 के रिकॉर्ड स्तर से अभी भी 24.3 अंक यानी 15.1 फीसदी नीचे है।
फिर भी लगातार तीसरे महीने कीमतों में बढ़ोतरी यह बताती है कि वैश्विक खाद्य बाजार पर दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
कीमतों पर असर सिर्फ खेतों में पैदा होने वाली फसल का नहीं है। काला सागर क्षेत्र में व्यापार और लॉजिस्टिक बाधाएं, समुद्री परिवहन को लेकर अनिश्चितता और एशिया, अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका में मौसम संबंधी जोखिम खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहे हैं।
दुनिया में अनाज का कारोबार भी घटने का अनुमान
एफएओ ने 2026/27 में वैश्विक अनाज उपयोग का अनुमान थोड़ा बढ़ाकर 296.6 करोड़ टन किया है। वहीं, 2027 में मौसमों के अंत तक वैश्विक अनाज भंडार करीब 95 करोड़ टन रहने का अनुमान है।
इसका मतलब है कि दुनिया के पास फिलहाल अनाज का भंडार मौजूद है, लेकिन उत्पादन, खपत और व्यापार के बीच संतुलन पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। वैश्विक अनाज भंडार-उपयोग अनुपात 2026/27 के अंत में 31.7 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पिछले सीजन के 32 फीसदी से थोड़ा कम है।
धान का अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी 2026 में 2.2 फीसदी घटने का अनुमान है। हालांकि, 2027 में इसमें 1.7 फीसदी की वृद्धि की उम्मीद है।
खेत से बाजार और बाजार से रसोई तक पहुंचता संकट
आज खाद्य बाजार जिस दबाव से गुजर रहा है, उसमें कई संकट एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कहीं गर्मी और सूखा फसल को प्रभावित कर रहे हैं, कहीं बारिश का असमान वितरण उत्पादन घटा रहा है और कहीं युद्ध तथा परिवहन बाधाएं अनाज को बाजार तक पहुंचाने की लागत और मुश्किल बढ़ा रही हैं।
ऐसे में खाद्य कीमतों में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी उन परिवारों के लिए बड़ी चिंता बन सकती है, जिनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है।
किसी घर में इसका मतलब हो सकता है कि महीने के आखिर में राशन का बजट कम पड़ जाए। दाल, फल, दूध या सब्जियों की मात्रा घटानी पड़े। पौष्टिक भोजन की जगह सस्ता विकल्प चुनना पड़े। या बच्चों की किसी दूसरी जरूरत के लिए भोजन के बजट में कटौती करनी पड़े।
यही वजह है कि अनाज उत्पादन में 2.1 फीसदी की वैश्विक गिरावट या खाद्य कीमतों में 1.5 फीसदी की मासिक बढ़ोतरी महज आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे किसानों की अनिश्चित आय, मौसम की मार झेलती फसलें, महंगा होता परिवहन और दुनिया भर के लाखों परिवारों की रसोई का बजट जुड़ा है।
जलवायु संकट के दौर में खाद्य सुरक्षा की चुनौती इसलिए और गंभीर होती जा रही है, क्योंकि अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि दुनिया के पास पर्याप्त अनाज है या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या बदलते मौसम, बढ़ती कीमतों और बाधित होती आपूर्ति श्रृंखलाओं के बीच हर परिवार तक पर्याप्त और पौष्टिक भोजन पहुंच सकेगा।