खतरा बनता अल नीनो: 2027 तक 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोग खाने की गंभीर कमी का कर सकते हैं सामना

संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि अल नीनो के असर से 45 देशों में खाद्य संकट 22 फीसदी तक बढ़ सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर अफ्रीका, दक्षिण एशिया और मध्य अमेरिका पर पड़ने का अंदेशा है।
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
Published on
सारांश
  • अल नीनो का गहराता खतरा दुनिया को एक नए खाद्य संकट की ओर धकेल सकता है।

  • संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2027 तक 45 देशों में खाद्य असुरक्षा 22 फीसदी तक बढ़ सकती है और करीब 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोग खाने की गंभीर कमी का सामना करने को मजबूर हो सकते हैं।

  • इससे कुल प्रभावित आबादी 22.5 करोड़ से बढ़कर 27.4 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। सबसे ज्यादा खतरा मध्य अमेरिका, दक्षिणी और पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया पर मंडरा रहा है, जहां सूखा, बाढ़ और भीषण गर्मी फसलों, आजीविका और खाद्य आपूर्ति को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

  • डब्ल्यूएफपी ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन, युद्ध और बढ़ती महंगाई का संयुक्त असर इस संकट को और गहरा बना रहा है।

  • हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि समय रहते की गई तैयारी और निवेश से बड़े पैमाने पर नुकसान टाला जा सकता है।

  • पिछले अल नीनो के अनुभव बताते हैं कि आपदा आने से पहले तैयारी पर खर्च किया गया प्रत्येक एक डॉलर, भविष्य में 3 से 7 डॉलर तक के नुकसान और राहत खर्च को बचा सकता है।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो अब केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि भूख, गरीबी और मानवीय संकट का बड़ा कारण बन चुका है, जिससे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर तत्काल और समन्वित कार्रवाई की जरूरत है।

मौसम का बदलता मिजाज एक बार फिर पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी बनकर उभर रहा है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) की ताजा रिपोर्ट से पता चला है कि, प्रशांत महासागर में गहराता 'अल नीनो' का खतरा दुनिया के सबसे संवेदनशील इलाकों में तबाही मचा सकता है।

आशंका है कि इसकी वजह से 2027 तक और करीब 4.9 करोड़ लोग खाने की भीषण कमी से जूझ रहे होंगे। सच कहें तो यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं।

अपनी इस रिपोर्ट में डब्ल्यूएफपी ने 45 ऐसे देशों का विश्लेषण किया है जो पहले से खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं और जहां अल नीनो बारिश, तापमान, सूखा और बाढ़ के पैटर्न को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।

अल नीनो से दुनिया में बिगड़ रहे हालात

रिपोर्ट में जो रुझान सामने आए हैं वे बेहद परेशान कर देने वाले हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अल नीनो का चरम प्रभाव सितंबर से दिसंबर 2026 के बीच सामने आने की आशंका है, लेकिन इसका दंश फसल चक्रों को तबाह करते हुए 2027 और उसके बाद तक महसूस किया जाएगा। कई क्षेत्रों में तो बाढ़, सूखा और भीषण गर्मी पहले ही लोगों की जीविका और खाद्य सुरक्षा पर चोट पहुंचा रही है।

यह भी पढ़ें
अल नीनो की दस्तक: दुनिया में और बढ़ेगी गर्मी, मानसून की बेरुखी के साथ बाढ़-सूखे के लिए रहे तैयार: डब्ल्यूएमओ
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

अनुमान है कि कुपोषण और खाद्य संकट को झेल रहे इन 45 देशों में भूखे पेट सोने वाले लोगों का आंकड़ा 2027 तक 22.5 करोड़ से बढ़कर 27.4 करोड़ तक पहुंच सकता है। मतलब कि वैश्विक खाद्य संकट में करीब 22 फीसदी की वृद्धि का अंदेशा है।

डब्ल्यूएफपी के कार्यकारी निदेशक कार्ल स्काउ ने इस बारे में चेताया है कि, "अल नीनो उन लाखों परिवारों के लिए बड़ा खतरा है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, बेरोजगारी और जलवायु आपदाओं से जूझ रहे हैं।"

ऐसे में उन्होंने जोर दिया कि यदि समय रहते परिवारों को इन जलवायु आपदाओं के लिए तैयार किया जाए तो इससे न केवल जानें बचाई जा सकती हैं, बल्कि उनकी आजीविका भी सुरक्षित रखी जा सकती है। उनका कहना है कि बाढ़ और सूखा बहुत तेजी से किसी भी समुदाय को सामान्य स्थिति से मानवीय संकट में धकेल सकते हैं।

किन क्षेत्रों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?

रिपोर्ट के मुताबिक इसका सबसे गंभीर असर मध्य अमेरिका और दक्षिणी अफ्रीका में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया भी गंभीर जोखिम में हैं। रुझान दर्शाते हैं कि दक्षिण अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र में 1.6 करोड़ से अधिक लोग खाद्य संकट की चपेट में आ सकते हैं।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन बना 'थ्रेट मल्टीप्लायर': अल नीनो और चरम घटनाओं से बढ़ सकता है संघर्ष का खतरा
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

अनुमान है कि सबसे अधिक वृद्धि मध्य अमेरिका में होगी, जहां खाद्य असुरक्षा में 83.1 फीसदी तक बढ़ोतरी का अंदेशा है। वहीं इसके चलते पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में 1.8 करोड़ से अधिक लोग खाने की कम से जूझ रहे होंगे। वहां खाद्य संकट में 26 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। गौरतलब है कि इस क्षेत्र में आज भी बड़ी आबादी कृषि के लिए बारिश पर निर्भर है।

इसी तरह एशिया और प्रशांत क्षेत्र में करीब 82 लाख अतिरिक्त लोग खाने की गंभीर कमी का सामना कर सकते हैं। वहीं पश्चिम और मध्य अफ्रीका में करीब 60 लाख और लोग खाद्य संकट में फंस सकते हैं, जो मौजूदा स्थिति से 12 फीसद अधिक है।

पहले से ज्यादा बदतर हो सकते हैं हालात

रिपोर्ट से पता चला है कि 2015-16 में बने अल नीनो ने दुनिया भर में 6 से 10 करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किया था। हालांकि इस बार हालात और गंभीर होने की आशंका जताई गई है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो की तीव्रता के साथ जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी जुड़ रहा है, जिससे बाढ़, सूखा  और भीषण गर्मी जैसी घटनाएं और विनाशकारी रूप ले सकती हैं।

डब्ल्यूएफपी ने यह भी जानकारी दी है कि संकट आने का इंतजार करने के बजाय पहले से तैयारी की जा रही है। संगठन 50 से अधिक देशों में सरकारों और साझेदार एजेंसियों के साथ मिलकर बाढ़, सूखा और तूफानों से निपटने की योजनाओं पर काम कर रहा है।

यह भी पढ़ें
कमजोर मानसून के बीच अल नीनो की दस्तक, भारत में खेतों से थाली तक बढ़ सकती है मुश्किल
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

मई से अब तक दक्षिण सूडान, चाड, मॉरिटानिया, युगांडा, ग्वाटेमाला और अल सल्वाडोर में अग्रिम राहत योजनाएं शुरू की गई हैं। इन प्रयासों के तहत 1.4 करोड़ डॉलर से अधिक की सहायता देकर करीब 5 लाख लोगों तक जीवनरक्षक मदद पहुंचाई गई है। इसके तहत बीमा, सस्ती वित्तीय सहायता और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाओं का भी विस्तार किया गया है।

रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि समय पर निवेश से कई गुना नुकसान रोका जा सकता है।

क्यों जरूरी है समय रहते तैयारी?

पिछले अल नीनो के अनुभव बताते हैं कि आपदा आने से पहले तैयारी पर खर्च किया गया प्रत्येक एक डॉलर, भविष्य में 3 से 7 डॉलर तक के नुकसान और राहत खर्च को बचा सकता है। ऐसे में समय रहते की गई तैयारी न केवल लोगों की जान बचाती है, बल्कि भविष्य में मानवीय सहायता की जरूरत भी कम करती है।

चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक तनाव के कारण खाद्य पदार्थ महंगे हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मानवीय सहायता के बजट में हो रही कटौती से स्थिति चिंताजनक हो रही है। इसके बावजूद, वैज्ञानिकों और राहत कार्यकर्ताओं की कोशिश यही है कि समय रहते अनाज, बीज और तकनीक पहुंचाकर इस भयावह आपदा को टाला जा सके।

यह भी पढ़ें
होर्मुज संकट, अल नीनो से भड़क सकती है महंगाई की आग, एफएओ ने दी गंभीर खाद्य संकट की चेतावनी
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

अल नीनो अब केवल मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह भूख, गरीबी और मानवीय संकट का बड़ा कारण बनता जा रहा है।

युद्ध, महंगाई और जलवायु संकट का खतरनाक मेल

ऐसे में संयुक्त राष्ट्र का संदेश बेहद स्पष्ट है कि यदि दुनिया ने अभी से तैयारी नहीं की, तो आने वाले महीनों में करोड़ों परिवारों के सामने कृषि, भोजन, और आजीविका का संकट गहरा सकता है। वहीं समय पर उठाए गए कदम ही लाखों लोगों को भूख और विस्थापन जैसी त्रासदियों से बचा सकते हैं।

सच कहें तो मौसम की यह मार हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि मौजूदा समय की हकीकत है, और इसकी सबसे भारी कीमत उन लोगों को चुकानी पड़ रही है, जिनका इसमें कोई कसूर नहीं है।

यह भी पढ़ें
आम आदमी की पहुंच से दूर होता पोषक आहार, भारत में 2017 से 48 फीसदी बढ़ी लागत: एफएओ रिपोर्ट
यह महज कोई आंकड़ा नहीं है, यह उन करोड़ों परिवारों का दर्द है जो पहले ही गरीबी, संघर्ष, और महंगाई की आग में जल रहे हैं और अब मौसम की इस मार से अपनी रोटी छिनने के कगार पर हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in