

जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर या बदलते मानसून की कहानी नहीं रह गया है। एक नए अध्ययन ने चेताया है कि अल नीनो, सूखा, अनियमित बारिश और 'क्लाइमेट व्हिपलैश' जैसी चरम मौसमीय घटनाएं दुनिया के कई हिस्सों में हिंसक संघर्ष और सामाजिक अस्थिरता का खतरा बढ़ा सकती हैं।
राइस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में 1950 से 2023 के बीच हुए 500 से अधिक संघर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में अल नीनो की वजह से सूखा और जल संकट गहराता है, वहां हिंसा और टकराव का जोखिम तेजी से बढ़ सकता है।
अध्ययन के मुताबिक मौसम सीधे युद्ध की वजह नहीं बनता, लेकिन यह गरीबी, बेरोजगारी, भूख और संसाधनों की कमी जैसे पहले से मौजूद तनाव को और खतरनाक बना देता है। वैज्ञानिकों ने इसे “थ्रेट मल्टीप्लायर” कहा है।
खास चिंता 'क्लाइमेट व्हिपलैश' को लेकर जताई गई है, जिसमें मौसम अचानक सूखे से बाढ़ में बदल जाता है। चेतावनी दी गई है कि भविष्य में संघर्ष केवल सीमाओं के लिए नहीं, बल्कि पानी, भोजन और संसाधनों के लिए भी हो सकते हैं।
मौसम का बदलना हमारे लिए अक्सर सिर्फ छाता निकालने या स्वेटर पहनने तक सीमित होता है, लेकिन क्या यही बदलता मौसम दुनिया में हिंसा और युद्ध की आग को भड़का सकता है? एक नए अध्ययन ने इस बहस को नया आधार दिया है।
राइस यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आया है कि जलवायु में होने वाले बड़े बदलाव, खासकर सूखा और अनियमित बारिश, कई क्षेत्रों में हिंसक संघर्षों के खतरे को बढ़ा सकते हैं। हालांकि यह असर हर जगह एक जैसा नहीं होता, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।
अल नीनो: सिर्फ मौसम नहीं, अस्थिरता का संकेत
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 1950 से 2023 के बीच दुनिया भर में हुए 500 से अधिक संघर्षों का उच्च-स्तरीय डेटा तैयार कर यह समझने की कोशिश की है कि जलवायु के बड़े पैटर्न सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता को किस तरह प्रभावित करते हैं। इस विश्लेषण ने पहली बार यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कस्बों और गांवों के स्तर पर भी मौसम कैसे तबाही लाता है।
अध्ययन मुख्य रूप से दो प्रमुख जलवायु प्रणालियों, अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) और हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) पर केंद्रित था। गौरतलब है कि ये दोनों समुद्र के तापमान में बदलाव से बनने वाले पैटर्न हैं, जो दुनिया भर में मौसम को प्रभावित करती हैं। बता दें कि ये घटनाएं भारत में भी मौसम और मानसून पर असर डालती हैं।
मौसम के थपेड़ों से टूटते समाज
वैज्ञानिकों ने पाया कि अल नीनो के दौरान दुनिया में हिंसक संघर्षों का ग्राफ तेजी से ऊपर बढ़ने लगता है। इस दौरान उन इलाकों में संघर्ष का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है, जहां इसकी वजह से सूखे जैसी परिस्थितियां बनती हैं।
इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में अल नीनो अधिक बारिश लाता है, वहां हिंसा और संघर्ष के साथ कोई स्पष्ट संबंध नहीं मिला। यानी सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाला जल संकट, खेती पर असर और संसाधनों की कमी जैसे दबाव संघर्षों को बढ़ावा दे सकते हैं।
मतलब कि मौसम खुद किसी के हाथ में हथियार नहीं थमाता, बल्कि जब पानी खत्म होने लगता है और खेत सूख जाते हैं, तो भूख से तड़पती और हताश आबादी जिंदा रहने के लिए आपस में ही टकरा जाती है।
यही नहीं, इस अध्ययन ने पहली बार 'हिंद महासागर द्विध्रुव' का एक खतरनाक चेहरा भी उजागर किया है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों चरण उन क्षेत्रों में संघर्ष का जोखिम बढ़ा सकते हैं, जो इसके प्रभाव के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील हैं। खासतौर पर हॉर्न क्षेत्र अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसका असर अधिक देखा गया।
'क्लाइमेट व्हिपलैश': पलक झपकते बदलता मौसम, बिखरते समाज
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रणाली तेजी से बदलती है, जिससे “क्लाइमेट व्हिपलैश” जैसी स्थिति पैदा होती है, यानी बहुत कम समय में मौसम का अचानक बदल जाना। यहां मौसम पलक झपकते ही करवट लेता है, कभी भीषण सूखा तो कभी विनाशकारी बाढ़।
मौसम के इस अचानक पड़े थपेड़े को वो समाज बर्दाश्त नहीं कर पाते जो पहले से ही गरीबी और कमजोर व्यवस्था की मार झेल रहे हैं। नतीजन इससे अर्थव्यवस्थाओं पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
लेकिन यह खेल उतना सीधा नहीं है जितना हम सोचते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु सीधे युद्ध का कारण नहीं बनती, लेकिन यह पहले से मौजूद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तनाव को और खतरनाक बना सकती है। वैज्ञानिकों ने इसे “थ्रेट मल्टीप्लायर” यानी खतरे को कई गुणा बढ़ाने वाला कारक बताया है।
यह समाज में पहले से सुलग रहे गुस्से, गरीबी और राजनीतिक तनाव की आग में घी डालने का काम करता है।
लेकिन इस डरावनी तस्वीर के बीच उम्मीद की एक किरण भी है। अच्छी बात यह है कि अल नीनों और 'हिंद महासागर द्विध्रुव' जैसे जलवायु पैटर्न का अनुमान कई महीने पहले लगाया जा सकता है। ऐसे में अगर सरकारें और सामाजिक संस्थाएं इस वैज्ञानिक चेतावनी को गंभीरता से लें, तो समय रहते उन संवेदनशील इलाकों में पहले से तैयारी कर संभावित संकट को कम करने की दिशा में काम किया जा सकता है।
संसाधनों की कमी कैसे बनती है टकराव की वजह
जैसा कि प्रोफेसर फ्रेडरी विएन्स कहते हैं, "हम यह तो नहीं कह सकते कि सिर्फ मौसम ही युद्ध की वजह है, लेकिन यह तय है कि बदला हुआ मौसम युद्ध की आशंका को बहुत ज्यादा बढ़ा देता है। ऐसे में इस सच को स्वीकार करना और समय रहते कदम उठाना ही इंसानी जिंदगियों को बचाने का इकलौता रास्ता है।“
वैज्ञानिकों ने भी चेताया है कि इस साल के अंत तक अल नीनो के विकसित होने की प्रबल आशंका है। कुछ अनुमान तो “सुपर अल नीनो” की संभावना भी दिखा रहे हैं।
अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच अल नीनो के बनने की संभावना 82 फीसदी है, जबकि इसके सर्दियों तक बने रहने की संभावना 96 फीसदी बताई गई है। यह ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में पहले ही कमजोर मानसून की आशंका जताई जा रही है।
यह अध्ययन एक गंभीर चेतावनी है कि आने वाले समय के युद्ध सिर्फ सीमाओं या विचारधाराओं के लिए नहीं, बल्कि पानी, भोजन और संसाधनों के लिए भी लड़े जा सकते हैं। सच कहें तो बदलते मौसम की यह कहानी केवल तापमान और बारिश के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भूख, बेरोजगारी, पलायन और सामाजिक अस्थिरता का वह चेहरा छिपा है, जो कई देशों को हिंसा और अराजकता की तरफ धकेल सकता है।