कमजोर मानसून के बीच अल नीनो की दस्तक, भारत में खेतों से थाली तक बढ़ सकती है मुश्किल

अमेरिकी मौसम विज्ञान केंद्र की ताजा चेतावनी के मुताबिक, प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' के पनपने की आहट तेज हो गई है
किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है। फोटो: आईस्टॉक
किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है। फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • प्रशांत महासागर के गर्भ में पनप रही गर्मी ने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच अल नीनो के बनने की संभावना 82 फीसदी है, जबकि इसके सर्दियों तक बने रहने की संभावना 96 फीसदी बताई गई है। यह ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में पहले ही कमजोर मानसून की आशंका जताई जा रही है।

  • प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह और उसके नीचे लगातार बढ़ती गर्मी संकेत दे रही है कि अल नीनो जल्द सक्रिय हो सकता है। यह घटना केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दुनिया भर के मौसम चक्र को प्रभावित करती है।

  • यह मौसमी घटना न केवल वैश्विक तापमान को बढ़ाएगी, बल्कि भारतीय मानसून के चरित्र को भी बदल सकती है। भारत जैसे देशों में इसका असर कम बारिश, सूखे, फसल नुकसान और बढ़ती खाद्य कीमतों के रूप में दिख सकता है।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अल नीनो मानसून के दौरान मजबूत हुआ, तो फसलों की पैदावार घट सकती है। ईंधन-खाद की बढ़ती कीमतों के बीच, यह बदलाव खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

  • इससे पहले भी 2015 और 2023 जैसे वर्षों में अल नीनो के कारण मॉनसूनी बारिश कमजोर रही थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2026-27 केवल मौसम की चुनौती नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और महंगाई के रूप में बड़ी परीक्षा बन सकता है।

सुबह खेत में खड़े किसान की नजर सबसे पहले आसमान पर जाती है, क्योंकि बादल सिर्फ पानी नहीं, उनके लिए सालभर की उम्मीद लेकर आते हैं। लेकिन इस बार वैज्ञानिक पहले ही चेता चुके हैं कि मानसून कम मेहरबान रह सकता है। ऊपर से प्रशांत महासागर के गर्भ में पनप रहा अल नीनो दुनिया के मौसम को बदलने की तैयारी में है, और इसका असर खेतों से लेकर रसोई तक महसूस हो सकता है।

अमेरिकी मौसम विज्ञान केंद्र की ताजा चेतावनी के मुताबिक, प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' के पनपने की आहट तेज हो गई है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के मुताबिक मई से जुलाई 2026 के बीच इसकी शुरुआत की आशंका 82 फीसदी तक पहुंच चुकी है। इसके बाद सर्दियों तक जाते-जाते (दिसंबर 2026 से फरवरी 2027) तक इसके बने रहने की आशंका 96 प्रतिशत बताई गई है।

बता दें कि 12 मई 2026 को जापान के मौसम ब्यूरो ने इस बात की 90 फीसदी आशंका जताई है कि अल नीनों के गर्मियों तक उभरने का अंदेशा है।

पिछले कुछ महीनों से समुद्र की सतह का तापमान सामान्य के करीब बना हुआ था और स्थिति तटस्थ (ईएनएसओ-न्यूट्रल) थी। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने देखा है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के भीतर सतह के नीचे लगातार गर्मी बढ़ रही है। यह संकेत है कि अल नीनो जल्द सक्रिय हो सकता है।

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ताजा साप्ताहिक नीनो-3.4 इंडेक्स का मान +0.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। वहीं, पश्चिमी हिस्से का नीनो-4 इंडेक्स +0.5 डिग्री सेल्सियस और पूर्वी हिस्से का नीनो-1+2 इंडेक्स +1.0 डिग्री सेल्सियस रहा। इसके साथ ही प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से के नीचे का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। समुद्र के अंदर का तापमान पिछले छह महीनों से लगातार बढ़ रहा है।

इसका मतलब है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत के बड़े हिस्से में समुद्र की गहराई में सामान्य से काफी अधिक गर्म पानी जमा हो रहा है। साथ ही, पश्चिमी भूमध्यरेखीय प्रशांत में निचले स्तर पर पश्चिमी हवाओं का दबाव देखा गया। ऊपरी वायुमंडल में यही स्थिति मध्य और पूर्व-मध्य प्रशांत तक फैली हुई है।

क्या है अल नीनो, जिससे डर रही है दुनिया

सरल शब्दों में, समुद्र की सतह और उसके नीचे दोनों जगह गर्मी बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, जो बताते हैं कि अल नीनो की स्थिति मजबूत होती जा रही है। यह संकेत है कि अल नीनो जल्द सक्रिय हो सकता है।

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वैज्ञानिक रूप से देखें तो अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र में घटने वाली उस मौसमी घटना का नाम है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और हवा पूर्व की ओर बहने लगती है। इसकी प्रभाव न केवल समुद्र पर बल्कि वायुमंडल पर महसूस किया जाता है। देखा जाए तो यह मौसम का एक गर्म चरण है, जो ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले से गर्म हो रही दुनिया को और ज्यादा गर्म कर सकता है।

जलवायु वैज्ञानिकों के मुताबिक इस घटना के चलते समुद्र का तापमान चार से पांच डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है।

वैज्ञानिकों की चिंता: अभी तय नहीं कितना शक्तिशाली होगा अल नीनो

सरल शब्दों में कहें तो जब मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने लगता है, तो उसे 'अल नीनो' कहा जाता है। यह बदलाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करता है। कई क्षेत्रों में सूखा बढ़ता है, कहीं बाढ़ आती है और खेती पर दबाव बढ़ जाता है। यह अपने साथ एक अनिश्चितता का संदेश लेकर आता है।

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मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो बनने की संभावना अब पिछले महीने की तुलना में ज्यादा स्पष्ट है, लेकिन यह कितना शक्तिशाली होगा इसको लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है। मौजूदा अनुमान के मुताबिक, किसी भी श्रेणी 'कमजोर, मध्यम या मजबूत' के अल नीनो के बनने की आशंका 37 फीसदी से अधिक नहीं है।

इतिहास बताता है कि सबसे शक्तिशाली एल नीनो तब बनते हैं, जब गर्म समुद्र और वायुमंडल के बीच मजबूत तालमेल गर्मियों के दौरान लगातार बना रहे। 2026 में ऐसा होगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इसका असर केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी वजह से मानसून, खाद्य आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ेगा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि शक्तिशाली अल नीनो का मतलब हमेशा बड़े असर नहीं होता। यह सिर्फ कुछ मौसमी बदलावों, जैसे सूखा या ज्यादा बारिश, की आशंका को बढ़ाता है।

क्यों चिंता बढ़ा रही है 2026 की दूसरी छमाही?

कयास लगाए जा रहे हैं कि इसकी वजह से एशिया सहित दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज बदल सकता है। सच कहें तो यह महज आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन लाखों किसानों की पेशानी पर उभरने वाली चिंता की लकीरें हैं, जिनकी जिंदगी और जीविका सीधे तौर पर आसमान से बरसने वाली बूंदों पर टिकी है।

देखा जाए तो मानसून के दौरान अल नीनो के उभरने का मतलब है कि एशिया के कई हिस्सों में बारिश कम हो सकती है, तापमान बढ़ सकता है और धान जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। भारत में पहले ही मानसून के कमजोर रहने की आशंका जताई गई है।

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जर्नल साइंस में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक अल नीनो के चलते भारत में मानसून का चरित्र बदल रहा है। भारत के सौ से अधिक वर्षों के बारिश से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि अल नीनो के दौरान सूखे क्षेत्रों में बारिश घट जाती है, जबकि नम क्षेत्रों में मूसलाधार बारिश होती है। इस अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि अल नीनो के दौरान नम इलाकों में भारी बारिश की आशंका 43 फीसदी तक बढ़ जाती है।

अतीत पर नजर डालें तो अल नीनो के कारण आम तौर पर ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, भारत सहित दक्षिणी एशिया के कुछ अन्य हिस्सों, मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के उत्तरी हिस्सों में गंभीर सूखा पड़ा है।

इससे पहले भी कई अल नीनो वर्षों के दौरान पूरे भारत में सूखा पड़ा था और मॉनसून के दौरान होने वाली बारिश में कमी आई थी। 2015 में भी 2023 की तरह ही अल नीनो की घटना घटी थी, जिसकी वजह से मॉनसूनी बारिश में 14.5 फीसदी की कमी आई थी। वहीं सिन्धु-गंगा के मैदानी क्षेत्र में होने वाली बारिश में 25.8 फीसदी की कमी दर्ज की गई थी। इसकी वजह से देश में सूखे की घटनाएं दर्ज की गई थी।

वहीं यह दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, अमेरिका के दक्षिणी क्षेत्रों के साथ हॉर्न ऑफ अफ्रीका और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में बारिश में आई वृद्धि की वजह बना था। इतना ही नहीं अल नीनो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में सामान्य से कहीं ज्यादा तूफानों को बढ़ावा दे सकता है और अटलांटिक महासागर में बनने वाले तूफानों को कम कर सकता है।

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मौसम का नया खतरा: खेतों से थाली तक असर

विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026 की दूसरी छमाही में एशिया में ज्यादा गर्म और शुष्क मौसम देखने को मिल सकता है। इसका सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ेगा। धान जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है। किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है।

भारत जैसे देशों के लिए यह चेतावनी अहम है क्योंकि भारतीय मानसून पर अल नीनो का सीधा असर पड़ता है। कमजोर मानसून से खेती, जल भंडार और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

ऐसे में यदि यह पूर्वानुमान सही साबित हुआ, तो 2026-27 केवल मौसम की कहानी नहीं होगा, बल्कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा और महंगाई के लिए भी एक बड़ी परीक्षा बन सकता है।

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