

भारत में महंगाई का सबसे गहरा असर अब लोगों की थाली पर दिखाई देने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट बताती है कि 2017 के बाद से देश में स्वस्थ और संतुलित आहार की लागत 48 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी है, जिससे फल, सब्जियां, दालें, दूध और अंडे जैसे पोषक खाद्य पदार्थ करोड़ों परिवारों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा बोझ गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ रहा है, जहां सबसे पहले पोषण से समझौता करना पड़ता है।
चिंता की बात है कि इसका परिणाम केवल कुपोषण या एनीमिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास, महिलाओं के स्वास्थ्य, कामकाजी क्षमता और देश की आर्थिक उत्पादकता पर भी दीर्घकालिक असर डाल सकता है।
रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के पीछे केवल खेती नहीं, बल्कि परिवहन, भंडारण, कोल्ड चेन और आपूर्ति व्यवस्था की ऊंची लागत भी बड़ी वजह है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल सभी को भोजन उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि हर परिवार तक किफायती और पोषणयुक्त भोजन पहुंचाने की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय खाद्य उत्पादन बढ़ाने, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने और खाद्य बर्बादी कम करने जैसे कदम ही पोषण को आम आदमी की थाली तक वापस ला सकते हैं।
महंगाई का सबसे बड़ा असर अब लोगों की थाली पर दिखने लगा है। भारत में पौष्टिक और संतुलित आहार साल दर साल महंगा होता जा रहा है, जिससे यह धीरे-धीरे करोड़ों लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र ने अपनी नई रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2026' में खुलासा किया है कि देश में 2017 से प्रति व्यक्ति स्वस्थ और संतुलित आहार की लागत में 48 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।
रुझानों से पता चला है कि भारत में एक आम आदमी के लिए रोजाना स्वस्थ और संतुलित भोजन की जो औसत न्यूनतम लागत 2.77 डॉलर आंकी गई थी, वो 2025 में बढ़कर 4.11 डॉलर पर पहुंच गई है। मतलब कि इसमें 48 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है।
वहीं 2021 के मुकाबले इसमें करीब 21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बता दें कि 2021 में यह आंकड़ा 3.4 पीपीपी डॉलर आंका गया था।
बता दें कि क्रय-शक्ति समता यानी पीपीपी बताती है कि किसी देश में एक व्यक्ति को समान चीजें खरीदने के लिए वास्तव में कितने पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसमें केवल मुद्रा की विनिमय दर नहीं, बल्कि उस देश में वस्तुओं और सेवाओं की स्थानीय कीमतों को भी ध्यान में रखा जाता है।
देखा जाए तो पोषक और संतुलित आहार की यह बढ़ती कीमतें गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन रही हैं, क्योंकि इसकी वजह से सबसे पहले उनकी थाली से फल, सब्जियां, दूध, अंडे जैसे अन्य पौष्टिक आहार कम होने लगते हैं। ऐसे में यदि स्वस्थ आहार महंगा होता रहेगा तो कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट) की कमी से जूझ रहे परिवारों के लिए संतुलित आहार अपनाना पहले से और ज्यादा कठिन हो जाएगा।
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, स्वस्थ आहार वह है जो शरीर को पर्याप्त ऊर्जा, सभी जरूरी पोषक तत्व, विविध खाद्य पदार्थ और संतुलित मात्रा में भोजन उपलब्ध कराए। रिपोर्ट कहती है कि केवल पेट भरना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों की थाली में पोषण भी होना चाहिए।
दक्षिण एशिया में कहां खड़ा है भारत?
वैश्विक स्तर पर देखें तो वहां भी स्वस्थ आहार लगातार महंगा हुआ है। इसकी प्रति व्यक्ति औसत दैनिक लागत 2017 में 2.94 पीपीपी (क्रय शक्ति समता) डॉलर से बढ़कर 2025 में 4.28 पीपीपी डॉलर पर पहुंच गई, यानी इसमें करीब 46 फीसदी की वृद्धि हुई है।
बता दें कि क्रय-शक्ति समता यानी पीपीपी बताता है कि किसी देश में एक व्यक्ति को समान चीजें खरीदने के लिए वास्तव में कितने पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसमें केवल मुद्रा की विनिमय दर नहीं, बल्कि उस देश में वस्तुओं और सेवाओं की स्थानीय कीमतों को भी ध्यान में रखा जाता है।
भारत के साथ-साथ दक्षिण एशिया के अन्य देशों में भी स्थिति गंभीर है। उदाहरण के लिए भूटान में 2025 में प्रति व्यक्ति हर दिन स्वस्थ और पौष्टिक आहार की लागत 6.17 पीपीपी डॉलर तक पहुंच गई है, जिसमें 2017 के मुकाबले 49 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
इसी तरह बांग्लादेश (4.59 पीपीपी डॉलर) में 48.5 फीसदी, श्रीलंका (5.21 पीपीपी डॉलर) में 35 फीसदी, पाकिस्तान (3.94 पीपीपी डॉलर) में करीब 33 फीसदी और नेपाल (4.19 पीपीपी डॉलर) में 26 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
स्पष्ट है कि भारत में पौष्टिक आहार की लागत पाकिस्तान से अधिक, लेकिन नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से कम है। हालांकि भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी करोड़ों परिवारों के आहार और पोषण पर बड़ा असर डाल सकती है।
हालांकि एक राहत की बात यह है कि वैश्विक स्तर पर स्वस्थ आहार खरीदने में असमर्थ लोगों की संख्या 2021 में 297 करोड़ (37.4 फीसदी) से घटकर 2025 में 269 करोड़ (32.7 फीसदी) रह गई है। फिर भी आज दुनिया का करीब-करीब हर तीसरा व्यक्ति पौष्टिक भोजन का खर्च नहीं उठा सकता। रिपोर्ट बताती है कि अफ्रीका सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है, जहां 66.6 फीसदी आबादी स्वस्थ आहार खरीदने में सक्षम नहीं है।
क्यों महंगा हो रहा है पौष्टिक आहार?
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक लागत फल, सब्जियां, दूध, अंडे, मांस और अन्य पशु-आधारित खाद्य पदार्थों पर आती है। वहीं चावल, गेहूं और अन्य अनाज अपेक्षाकृत सस्ते हैं। खेत से उपभोक्ता तक खाद्य पदार्थ पहुंचाने की प्रक्रिया, जैसे प्रसंस्करण, परिवहन, भंडारण, कोल्ड चेन और थोक वितरण, भी कीमतों को काफी बढ़ा देती है।
हैरानी की बात यह है कि उपभोक्ता द्वारा स्वस्थ और पौष्टिक आहार के लिए चुकाई कुल कीमत का करीब 70 से 75 फीसदी हिस्सा इन्हीं गतिविधियों पर खर्च होता है। इसका मतलब है कि न ही किसानों को उनकी उपज का पूरा लाभ मिलता है, न ही उपभोक्ताओं को सही दाम पर चीजें मिल पाती हैं।
भारत में कमजोर परिवारों की स्थिति को देखें तो पेट भरने वाले अनाज (जैसे चावल और गेहूं) तो सरकारी योजनाओं या बाजार से कम दामों पर मिल जाते हैं, लेकिन शरीर को असली ताकत देने वाली दालें, हरी सब्जियां, फल और दूध इतने महंगे हो चुके हैं कि वो आम भारतीय परिवार के बजट से बाहर होते जा रहे हैं।
यही वजह है कि देश में एक तरफ कुपोषण और एनीमिया की चुनौती बनी हुई है, तो दूसरी तरफ पौष्टिक भोजन न मिल पाने की मजबूरी चिंता का विषय बन रही है।
क्यों भारत के लिए है यह महत्वपूर्ण?
स्पष्ट है कि भारत में केवल खाद्यान्न उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि हर परिवार की थाली में फल, सब्जियां, दालें, दूध, अंडे जैसे पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ भी किफायती कीमत पर पहुंचें।
इसके लिए कृषि व्यवस्था, कोल्ड चेन, सिंचाई, अनुसंधान, खाद्य प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की बढ़ती बर्बादी को कम करना भी जरूरी है।
ऐसे में जब तक खेत से थाली तक की दूरी को आसान और सस्ता नहीं बनाया जाएगा, तब तक पोषण आम इंसान की पहुंच से बाहर ही रहेगा।
एफएओ ने रिपोर्ट में यह भी आगाह किया है कि आने वाले महीनों में हॉर्मुज गतिरोध और 2026 के अंत तक प्रभावी रहने वाले शक्तिशाली अल नीनो के कारण वैश्विक स्टार पर खाद्य और उर्वरकों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन से जुड़े मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो कुलेन का इस बारे में कहना है, “दुनिया में समस्या भोजन की कमी नहीं, बल्कि पौष्टिक आहार की बढ़ती कीमत है। उनका कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर खाद्य उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए, तो स्वस्थ आहार की लागत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।“
हमें समझना होगा कि यदि पौष्टिक आहार आम लोगों की पहुंच से बाहर होता गया, तो इसका असर केवल भूख पर नहीं, बल्कि बच्चों के विकास, महिलाओं के स्वास्थ्य, कार्य क्षमता और देश की आर्थिक उत्पादकता पर भी पड़ेगा। कहीं न कहीं पोषक तत्वों का यह कुपोषण अंदर ही अंदर पीढ़ियों को खोखला कर देगा।
भारत के लिए अब लक्ष्य केवल 'सबको भोजन' नहीं, बल्कि 'सबके लिए पोषणयुक्त भोजन' सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसलिए स्थानीय खाद्य उत्पादन, मजबूत आपूर्ति व्यवस्था और पोषण-केंद्रित नीतियां अब समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई हैं।