

भारत में आने वाले महीनों की गर्मी सिर्फ तापमान का आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों जिंदगियों के लिए खतरे की घंटी बन सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा ‘सुपर अल नीनो’ के कारण भारत में सामान्य वर्ष की तुलना में गर्मी से करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
इनमें से करीब 7,400 मौतें दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच होने का अनुमान है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में गर्मी से जुड़ी मौतों का खतरा इसके बाद भी बना रह सकता है और 2027 की गर्मियों में बढ़ सकता है।
भारत का यह खतरा वैश्विक संकट का हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनिया में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त गर्मी से मौतें हो सकती हैं। इनमें करीब 2.39 लाख मौतें अगले छह महीनों में होने का अनुमान है।
सबसे ज्यादा असर ग्लोबल साउथ पर पड़ने की आशंका है। अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में करीब 66,800, इंडोनेशिया में 19,300, दक्षिण-पूर्व एशिया के चार देशों में 19,400 और ब्राजील में 13,300 अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान वैश्विक स्तर पर भूमि का तापमान सामान्य से करीब 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक रह सकता है और बेहद गर्म दिनों की संख्या 44 फीसदी तक बढ़ सकती है।
शोधकर्ताओं ने इसे “भविष्य का पोस्टकार्ड” बताया है, क्योंकि ऐसी गर्मी करीब 20 साल बाद सामान्य हो सकती है। हालांकि, समय रहते हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर, पानी की उपलब्धता, श्रमिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करके हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।
आज मौसम का एक ऐसा रूप सामने आ रहा है जो सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों पर मंडराता एक बड़ा संकट है।
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब ने अपनी परेशान कर देने वाली रिपोर्ट में खुलासा किया है कि इस साल बन रहा ‘सुपर अल नीनो’ आने वाले महीनों में सिर्फ मौसम का मिजाज ही नहीं बदलेगा, बल्कि लाखों जिंदगियों पर भारी पड़ सकता है।
रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि इस असामान्य रूप से शक्तिशाली अल नीनो के चलते भारत में सामान्य वर्ष की तुलना में गर्मी से करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। चिंता की बात है कि इनमें से करीब 7,400 मौतें दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच होने का अंदेशा है।
भारत में 15,800 मौतों का खतरा, दिसंबर से फरवरी बेहद अहम
हालांकि खतरा यहीं खत्म नहीं होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में गर्मी से होने वाली मौतों का असर 2027 की गर्मियों तक बढ़ सकता है, क्योंकि अल नीनो के कारण बढ़ते तापमान और उससे जुड़ी गर्मी का असर लंबे समय तक बना रह सकता है।
मतलब कि भारत में इस बार गर्मी की मार सिर्फ खेतों, पानी और बिजली तक सीमित रहने का खतरा नहीं है, बल्कि यह सीधे इंसानी जिंदगियों को निशाना बना सकती है।
भारत में वैसे भी गर्मी सिर्फ बढ़ते तापमान का नाम नहीं है। इसके पीछे उन परिवारों का दर्द छिपा है, जहां रोज कमाने वाला कोई व्यक्ति तेज गर्मी में काम करते हुए बीमार पड़ जाता है, कोई बुजुर्ग लू और तपिश के बीच अपनी जान गंवा देता है या कोई बच्चा पानी और ठंडक की तलाश में घंटों परेशान रहता है। बढ़ती गर्मी ऐसे ही छोटे-बड़े संकटों के जरिए लोगों की जिंदगी, सेहत और रोजी-रोटी पर सीधा असर डाल रही है।
बता दें कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) पहले ही अल नीनो के प्रचंड रूप लेने को लेकर चेता चुका है। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर पहुंच चुका है, जबकि समुद्र के भीतर कुछ हिस्से 8 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म हैं। यह बड़े खतरे की चेतावनी है।
दुनिया भर में हो सकती हैं 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें
रिपोर्ट से पता चला है कि इस सुपर अल नीनो का असर सिर्फ भारत पर नहीं बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों पर भी पड़ेगा। अंदेशा है कि जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनिया में सामान्य वर्ष की तुलना में गर्मी से करीब 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इनमें से करीब 239,000 मौतें अगले छह महीनों में होने का अनुमान है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर अल नीनो का असर 2027 के बसंत तक बना रहता है और उसके बाद भी गर्मी का असर जारी रहता है, तो यह आंकड़ा और बढ़ सकती है।
देखा जाए तो यह आंकड़ा जितना बड़ा है, उसके पीछे उतनी ही बड़ी मानवीय त्रासदी छिपी है। हर मौत के पीछे एक परिवार, माता-पिता, बच्चे, बुजुर्ग, पड़ोसी और रोजी-रोटी के लिए गर्मी में बाहर निकलने वाला कोई व्यक्ति है।
भारत के साथ दुनिया के किन हिस्सों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
इस खतरे का सबसे बड़ा बोझ उन देशों पर पड़ने का अनुमान है जो पहले से ही भीषण गर्मी, गरीबी और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और सीमित संसाधनों से जूझ रहे हैं। यानी इस संकट का सबसे बड़ा बोझ उन लोगों पर पड़ सकता है जिनके पास गर्मी से बचने के साधन भी सबसे कम हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका सबसे ज्यादा असर ग्लोबल साउथ यानी दक्षिण के देशों पर दिख सकता है।
रुझान दर्शाते हैं कि अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में अगले छह महीनों में करीब 66,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
इनमें अकेले नाइजीरिया में 31,400, सूडान में 17,500, नाइजर में 10,000 और चाड में 8,000 अतिरिक्त मौतें होने का अंदेशा है। इसी तरह दक्षिण-पूर्व एशिया में फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड और कंबोडिया में मिलाकर करीब 19,400 अतिरिक्त मौतों का अनुमान है, जबकि इंडोनेशिया में 19,300 और ब्राजील में करीब 13,300 मौतें हो सकती हैं।
गौरतलब है कि अल नीनो और ला नीना पृथ्वी की सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक जलवायु घटनाओं में शामिल अल नीनो दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) के दो विपरीत चरण हैं। अल नीनो के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह घटना आमतौर पर हर दो से सात साल में होती है और करीब नौ से 12 महीने तक रहती है।
अल नीनो के साथ जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाया खतरा
अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के तापमान और बारिश पर पड़ता है। लेकिन इस बार यह घटना ऐसी धरती पर हो रही है जो पहले ही जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म हो चुकी है, जिसके लिए हम इंसान ही जिम्मेवार हैं।
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो के दौरान वैश्विक स्तर पर भूमि औसत तापमान सामान्य से करीब 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक रह सकता है। इसके कारण सामान्य वर्ष की तुलना में बेहद गर्म दिनों की संख्या करीब 44 फीसदी अधिक हो सकती है। यानी अल नीनो उस गर्मी को और बढ़ा रहा है, जिसका खतरा जलवायु परिवर्तन पहले ही बढ़ा चुका है।
भारत में सर्दियों में भी गर्मी बन सकती है जानलेवा
भारत में गर्मी से होने वाली मौतों को अक्सर अप्रैल, मई और जून में चलने वाली लू से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अध्ययन का अनुमान बताता है कि इस बार खतरा सर्दियों में भी गंभीर हो सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, भारत में दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच गर्मी से करीब 7,400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इसके बाद उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों के आने के साथ मौतों का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका है।
इसका मतलब है कि गर्मी से निपटने की तैयारी को केवल पारंपरिक ‘हीटवेव सीजन’ तक सीमित रखने के बजाय बदलते मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लगातार तैयार रहना होगा।
समय रहते कदम उठाने से बच सकती हैं हजारों जानें
रिपोर्ट की सबसे अहम बात यह है कि इसमें सिर्फ मौतों का अनुमान नहीं लगाया गया, बल्कि यह भी पुष्टि की है कि अगर समय रहते कार्रवाई की जाए तो हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक इस बचाव के लिए स्थानीय स्तर पर पहले से चेतावनी जारी करना, बुजुर्गों और अन्य संवेदनशील लोगों तक स्वास्थ्य संबंधी मदद पहुंचाना, पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना, कूलिंग सेंटर और हाइड्रेशन स्टेशन बनाना, खुले में काम करने वाले मजदूरों को गर्मी से सुरक्षा देना और अस्पतालों की क्षमता बढ़ाना जैसे कदम अहम हो सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन उपायों को उन क्षेत्रों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए जहां आने वाले महीनों में गर्मी से होने वाली मौतों का जोखिम सबसे ज्यादा है। बता दें कि भारत में गर्मी से बचाव के लिए योजनाएं और चेतावनी प्रणालियां पहले से मौजूद हैं, लेकिन असली चुनौती इन्हें जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने की है।
‘भविष्य का पोस्टकार्ड’ है यह सुपर अल नीनो
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब से जुड़े वैज्ञानिकों ने मौजूदा सुपर अल नीनो को 'भविष्य का पोस्टकार्ड' बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान महसूस होने वाली असामान्य गर्मी उन तापमान स्थितियों जैसी हो सकती है जिनके जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 20 साल बाद सामान्य होने का अनुमान है।
इसलिए यह सिर्फ आने वाले कुछ महीनों की चेतावनी नहीं है। यह इस बात की भी झलक है कि अगर दुनिया ने गर्म होती जलवायु के अनुरूप तैयारी और अनुकूलन में निवेश नहीं किया, तो भविष्य में ऐसी गर्मी कितनी जानलेवा हो सकती है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि गर्मी के हर आंकड़े के पीछे एक इंसान, एक परिवार और एक जिंदगी है। ऐसे में आज सवाल सिर्फ यह नहीं कि सुपर अल नीनो से कितनी मौतें होंगी। सवाल यह भी है कि जब खतरे का अनुमान पहले से मौजूद है, तब समय रहते कितनी जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।