प्रचंड रूप लेगा अल नीनो, 2027 तक बढ़ सकता है मौसम का कहर: डब्ल्यूएमओ

वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर पहुंच चुका है और अल नीनो के फरवरी 2027 तक बने रहने की करीब 100 फीसदी आशंका है।
किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है। फोटो: आईस्टॉक
किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है। फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • प्रशांत महासागर में बढ़ती असाधारण गर्मी अब दुनिया के मौसम के लिए बड़ी चेतावनी बन गई है।

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक अल नीनो पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और आने वाले महीनों में यह बेहद मजबूत रूप ले सकता है। इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना करीब 100 फीसदी है।

  • अल नीनो की तीव्रता मापने वाले नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक अधिक पहुंच चुका है, जबकि समुद्र के भीतर कुछ हिस्से 8 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म हैं।

  • इस असाधारण गर्मी का असर प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश के पैटर्न बदल सकते हैं, कहीं बाढ़ और भारी बारिश आफत बन सकती है तो कहीं सूखा खेतों और किसानों की मुश्किलें बढ़ा सकता है।

  • सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान दुनिया के ज्यादातर भू-भागों में सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान है।

  • भारत में भी अल नीनो का असर एक जैसा नहीं होगा; कुछ इलाकों में बारिश घट सकती है, जबकि पहले से नम क्षेत्रों में कम दिनों में बेहद भारी बारिश का खतरा बढ़ सकता है।

  • ऐसे में डब्ल्यूएमओ ने सरकारों और मौसम एजेंसियों से समय रहते तैयारी और पूर्व चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने की अपील की है। क्योंकि समुद्र में उठ रही यह गर्म लहर अंततः घरों, खेतों और शहरों तक पहुंच सकती है।

दुनिया के मौसम पर एक और बड़ी आफत दस्तक दे रही है, जिसके असर से करोड़ों जिंदगियां प्रभावित हो सकती है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने अपनी नई रिपोर्ट में चेताया है कि अल नीनो पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और आने वाले महीनों में इसके बेहद मजबूत स्थिति में पहुंचने की आशंका है।

डब्ल्यूएमओ के वैश्विक पूर्वानुमान केंद्रों के आकलन के मुताबिक अल नीनो के फरवरी 2027 तक बने रहने की आशंका करीब 100 फीसदी है।

वैज्ञानिकों ने इस बात की भी पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर पहुंच चुका है।

समुद्र की यह असाधारण गर्मी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम के संतुलन को बिगाड़ सकती है। बता दें कि 22 अगस्त को समुद्र की सतह का वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड 21.1 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया था। वैज्ञानिकों ने इसे महासागरों पर बढ़ते जलवायु दबाव और आने वाले खतरों की गंभीर चेतावनी बताया है।

इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में कहीं बारिश आफत बनकर बरस सकती है, कहीं सूखा खेतों को झुलसा सकता है और कहीं असामान्य गर्मी लोगों की जिंदगी मुश्किल कर सकती है। यानी समुद्र में बढ़ रही गर्मी का असर हजारों किलोमीटर दूर घरों, खेतों और शहरों तक महसूस किया जा सकता है।

समुद्र का असाधारण तापमान बढ़ा रहा खतरा

संगठन का कहना है कि यह अब तक जारी किए गए अल नीनो पूर्वानुमानों में सबसे स्पष्ट चेतावनियों में से एक है। वैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर व्यापक सहमति है कि यह घटना आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकती है।

रिपोर्ट में सामने आया है कि अल नीनो के केंद्र में मौजूद उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का पानी असाधारण रूप से गर्म हो चुका है। मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान लगातार बढ़ रहा है। अल नीनो की तीव्रता मापने वाले नीनो 3.4 सूचकांक में मई-जुलाई 2026 के दौरान तापमान सामान्य से औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक था।

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किसानों के सामने पहले से महंगे उर्वरक और ईंधन की समस्या है, ऐसे में मौसम की मार संकट को और गहरा कर सकती है। फोटो: आईस्टॉक

जुलाई में यह अंतर बढ़कर 2 डिग्री सेल्सियस हो गया। इसके बाद जुलाई के अंत से अगस्त के मध्य तक साप्ताहिक तापमान सामान्य से करीब 2.2 से 2.6 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।

देखा जाए तो चिंता सिर्फ समुद्र की सतह तक सीमित नहीं है। समुद्र के भीतर कुछ हिस्सों में जुलाई और अगस्त की शुरुआत के दौरान तापमान सामान्य से 8 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा ऊपर रहा। वैज्ञानिकों के मुताबिक सतह और समुद्र के भीतर मौजूद यह असाधारण गर्मी अल नीनो के और मजबूत होने का आधार तैयार कर रही है।

2026 के अंत तक चरम रूप ले सकता है अल नीनो

डब्ल्यूएमओ ने जानकारी दी है कि मजबूत समुद्री और वायुमंडलीय संकेतों के साथ विभिन्न मौसमी पूर्वानुमान प्रणालियों में भी काफी समानता है। इससे संकेत मिलता है कि अल नीनो कम से कम 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है। वहीं इसके 2026 के अंत में अपने चरम पर पहुंचने की आशंका है।

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हालांकि इसके प्रभाव समुद्र के तापमान के चरम पर पहुंचने के बाद भी लंबे समय तक बने रह सकते हैं। ऐसे में इस मौसमी घटना के प्रभाव 2027 में भी दुनिया के कई हिस्सों के मौसम को प्रभावित कर सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का इस बारे में कहना है, "दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच रही है जहां समुद्र और धरती दोनों लगातार गर्म हो रहे हैं और चरम मौसमी घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है।" उन्होंने कहा कि अब बढ़ते जोखिमों और जलवायु कार्रवाई के बीच दौड़ है और इस दौड़ में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।

कहीं बाढ़, कहीं सूखा और कहीं टूट सकता है गर्मी का रिकॉर्ड

अल नीनो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का मिजाज बदल सकता है। मजबूत अल नीनो के दौरान बारिश, तापमान और वायुमंडलीय गतिविधियों में बड़े बदलाव की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि इसका असर हर देश में एक जैसा नहीं होता।

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किसी क्षेत्र में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे इलाके में बारिश कम होने से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। वहीं कई क्षेत्रों में गर्मी असामान्य रूप से बढ़ सकती है।

मौसम संगठन ने इस बात की भी जानकारी दी है कि सितंबर से नवंबर 2026 के बीच दुनिया के करीब-करीब सभी भू-भागों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की आशंका है। वहीं प्रशांत महासागर में मजबूत अल नीनो के कारण कई क्षेत्रों में बारिश के सामान्य पैटर्न में भी उल्लेखनीय बदलाव आ सकते हैं।

भारत और आसपास के इलाकों पर भी दिखेगा असर

देखा जाए तो अल नीनो की ताकत अकेले यह तय नहीं करती कि किसी देश में इसका असर कितना गंभीर होगा। स्थानीय मौसम पर हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर की परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है।

डब्ल्यूएमओ के अनुसार सितंबर से नवंबर 2026 के बीच सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) के विकसित होने की संभावना है।

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इसका मौसमी औसत मान करीब 0.9 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है। वहीं उष्णकटिबंधीय अटलांटिक महासागर का तापमान भी सामान्य से अधिक रहने की आशंका है।

ये सभी समुद्री परिस्थितियां मिलकर अल नीनो के पारंपरिक प्रभावों को कुछ क्षेत्रों में बढ़ा सकती हैं, तो कहीं उनका असर कम या अलग भी कर सकती हैं। इसलिए किसी खास देश या क्षेत्र के लिए खतरे का आकलन केवल अल नीनो की तीव्रता देखकर नहीं किया जा सकता।

अल नीनो के प्रभाव से भारत में मानसून का चरित्र बदल रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक अल नीनो दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) ने हाल के दशकों में  भारत के विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया है। जहां उत्तरी भारत में इसका प्रभाव ज्यादा था।

वहीं देश के मध्य हिस्सों में इसका प्रभाव हल्का रहा है। वहीं दक्षिणी हिस्सों में इसके प्रभाव में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

भारत के सौ से अधिक वर्षों के बारिश से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि अल नीनो के दौरान नम इलाकों में भारी बारिश की आशंका 43 फीसदी तक बढ़ जाती है। इस दौरान देश के दक्षिण-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भारत जैसे सूखे इलाकों में कुल बारिश और भारी बारिश की घटनाएं कम हो जाती हैं।

लेकिन दूसरी तरफ मध्य और दक्षिण-पश्चिमी भारत जैसे पहले से ही नम क्षेत्रों में भले ही बारिश कम दिनों में होती है, लेकिन जब बारिश होती है तो वह बहुत ज्यादा तेज और खतरनाक होती है।

सबसे बड़ी जरूरत—पहले से तैयारी

गौरतलब है कि अल नीनो और ला नीना पृथ्वी की सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक जलवायु घटनाओं में शामिल अल नीनो दक्षिणी दोलन (ईएनएसओ) के दो विपरीत चरण हैं। अल नीनो के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह घटना आमतौर पर हर दो से सात साल में होती है और करीब नौ से 12 महीने तक रहती है।

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इसका विकास अक्सर मार्च से जून के बीच शुरू होता है और नवंबर से फरवरी के बीच यह चरम पर पहुंचता है। लेकिन इसका असर सिर्फ प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों में भी बारिश, गर्मी और मौसम के दूसरे पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।

यही वजह है कि समय रहते जारी किए गए पूर्वानुमान सरकारों, राहत एजेंसियों, किसानों, स्वास्थ्य व्यवस्था, ऊर्जा और जल प्रबंधन से जुड़े विभागों को तैयारी के लिए अहम समय दे सकते हैं।

डब्ल्यूएमओ ने भी राष्ट्रीय मौसम विज्ञान और जल विज्ञान सेवाओं के साथ मिलकर चेतावनी और आपदा तैयारी को तेज करने पर जोर दिया है। संगठन का कहना है कि इस असाधारण अल नीनो के लिए असाधारण स्तर की तैयारी जरूरी है।

डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्ते साउलो का कहना है, अल नीनो भले ही एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, लेकिन इसका असर समुदायों और अर्थव्यवस्थाओं पर बेहद भारी पड़ सकता है। दुनिया के कई हिस्सों में सूखे और बाढ़ से पहले ही तबाही दिखाई दे रही है और अल नीनो के मजबूत होने के साथ ये प्रभाव और बढ़ सकते हैं।

मौसम की चेतावनी को कार्रवाई में बदलने का वक्त

वैज्ञानिकों ने इस बात को भी स्पष्ट किया है कि अल नीनो जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा नहीं होता, यह एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। हालांकि, बदलती वैश्विक जलवायु की पृष्ठभूमि में इसके साथ आने वाली गर्मी और चरम मौसम की घटनाओं का असर बेहद गंभीर हो सकता है।

ऐसे में अब चुनौती सिर्फ यह जानने की नहीं है कि मौसम कितना बदलेगा, बल्कि यह है कि उस बदलाव से पहले लोगों को कितना तैयार किया जा सकता है।

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समय पर चेतावनी, किसानों के लिए मौसम की जानकारी, बाढ़ और सूखे की तैयारी, स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती तथा पानी और बिजली के बेहतर प्रबंधन से जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सच कहें तो अल नीनो की गर्म होती लहर भले ही प्रशांत महासागर से उठ रही है, लेकिन इसकी गूंज दुनिया के हर उस घर तक पहुंच सकती है जो बारिश, खेती, पानी और तापमान पर निर्भर है।

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