

तमिलनाडु के घाटों में बाघ, तेंदुआ, हाथी, गौर और जंगली कुत्ते के आवागमन वाले महत्वपूर्ण गलियारों की पहचान हुई।
अध्ययन में नीलगिरी, गुडलूर और धर्मपुरी जैसे क्षेत्रों को वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण संकरे मार्ग और पिंच पॉइंट बताया गया।
बाघ घटते जंगलों से बचते हैं, जबकि तेंदुए पर्याप्त वनस्पति मिलने पर इंसानी इलाकों में भी आसानी से आवाजाही करते हैं।
कोयंबटूर में हाथियों के अच्छे आवास और मानव बस्तियों की नजदीकी से मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने का खतरा बना रहता है।
वैज्ञानिकों ने वन्यजीव पुल, अंडरपास और जंगल बहाली जैसे उपायों से महत्वपूर्ण गलियारों को सुरक्षित रखने की जरूरत बताई है।
दक्षिण भारत के घने जंगलों में बाघ, तेंदुआ, हाथी, जंगली कुत्ता और गौर जैसे बड़े वन्यजीवों के लिए जंगलों के बीच आना-जाना मुश्किल होता जा रहा है। इंसानी बस्तियों, सड़कों, खेती और दूसरे विकास कार्यों के कारण जंगल छोटे-छोटे हिस्सों में बट रहे हैं। ऐसे में इन जानवरों के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुंचने के रास्ते लगातार कम हो रहे हैं।
तमिलनाडु के पश्चिमी और पूर्वी घाटों में हुए एक नए अध्ययन ने इन वन्यजीवों के लिए जरूरी रास्तों की पहचान की है। वैज्ञानिकों ने उन जगहों को भी चिन्हित किया है, जहां जंगल का रास्ता बहुत संकरा हो गया है। इन्हें ‘पिंच पॉइंट’ कहा गया है। इन जगहों को बचाना आने वाले समय में वन्यजीव संरक्षण के लिए बेहद जरूरी हो सकता है। यह अध्ययन लैंडस्केप इकोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
करीब 50 लाख नहीं, 5 करोड़ लोगों का दबाव
पश्चिमी और पूर्वी घाट का तमिलनाडु वाला हिस्सा जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के अहम इलाकों में शामिल है। लेकिन यहां इंसानी आबादी का दबाव बहुत ज्यादा है। करीब 5 करोड़ लोग इस बड़े क्षेत्र में रहते हैं। पिछले करीब 100 वर्षों में मध्य और दक्षिणी पश्चिमी घाट के जंगलों का क्षेत्र लगभग 40 प्रतिशत तक कम हुआ है।
जंगलों के टुकड़ों में बंटने से जानवरों के सामने कई परेशानियां खड़ी होती हैं। उन्हें भोजन, पानी और साथी की तलाश में दूर तक जाना पड़ता है। रास्ते बंद होने पर उनकी आबादी छोटे क्षेत्रों में सीमित हो सकती है। इससे आने वाले समय में उनकी संख्या घटने और स्थानीय स्तर पर उनके खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है।
पांच बड़े जानवरों पर हुआ अध्ययन
सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री के वैज्ञानिकों ने 2019 से 2021 के बीच इस क्षेत्र में व्यापक सर्वे किया। टीम ने 113 इलाकों में जानवरों की मौजूदगी के संकेत तलाशे। इसके लिए पंजों के निशान, मल, भोजन करने के निशान और सीधे दिखाई देने जैसी जानकारियों का इस्तेमाल किया गया।
वैज्ञानिकों ने इन जानकारियों को सड़कों, बस्तियों और मानव गतिविधियों के नक्शों के साथ जोड़ा। इसके बाद उन्होंने ऐसे नक्शे तैयार किए, जिनसे पता चलता है कि किसी जानवर के लिए कौन सा इलाका आसानी से पार किया जा सकता है और कौन सा इलाका उसके लिए मुश्किल है।
बाघ सबसे ज्यादा संवेदनशील
अध्ययन में सामने आया कि सभी जानवर जंगल को एक ही नजर से नहीं देखते। बाघ इनमें सबसे ज्यादा संवेदनशील पाया गया। वह मुख्य रूप से सुरक्षित और घने जंगलों में रहना पसंद करता है। थोड़ा भी खराब या बदला हुआ जंगल उसके लिए आवाजाही को मुश्किल बना सकता है।
इसके विपरीत तेंदुआ ज्यादा अनुकूलन करने वाला जानवर पाया गया। वह इंसानी गतिविधियों वाले इलाकों से भी गुजर सकता है। पर्याप्त पेड़-पौधों और छिपने की जगह मिलने पर वह कॉफी के बागानों जैसे इलाकों का भी इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि तेंदुआ इंसानी इलाकों में पूरी तरह सुरक्षित है। ऐसे क्षेत्रों में उसके लिए कई खतरे बने रहते हैं।
हाथियों के लिए सबसे बड़ी चिंता
हाथियों और गौर जैसे बड़े शाकाहारी जानवरों को बड़ी मात्रा में भोजन चाहिए। इसलिए वे काफी दूर तक घूमते हैं। अध्ययन में कोयंबटूर के जंगलों में हाथियों के लिए अच्छा आवास पाया गया, लेकिन यही इलाका मानव-हाथी संघर्ष के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इसका कारण यह है कि हाथियों के लिए अच्छे इलाके कई बार खेतों और गांवों के पास हैं। भोजन की तलाश में हाथी फसलों तक पहुंच जाते हैं और किसानों के साथ टकराव की स्थिति पैदा होती है।
नीलगिरी और धर्मपुरी जैसे इलाके अहम
वैज्ञानिकों ने ऐसे रास्तों की भी पहचान की है, जिनसे जानवर कम ऊर्जा खर्च करके एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुंच सकते हैं। इस अध्ययन में नीलगिरी, गुडलूर और धर्मपुरी जैसे इलाकों को महत्वपूर्ण ‘पिंच पॉइंट’ के रूप में चिन्हित किया गया है।
अगर इन संकरे रास्तों पर लगातार निर्माण और दूसरी मानवीय गतिविधियां बढ़ती रहीं, तो कई बड़े जंगलों के बीच संपर्क टूट सकता है। इसके बाद जानवर अलग-अलग जंगलों में फंसकर रह सकते हैं।
अब संरक्षण की दिशा होगी ज्यादा स्पष्ट
अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पांच अलग-अलग बड़े जानवरों को एक साथ देखकर उनके आने-जाने के रास्तों को समझने की कोशिश की गई है। इससे सरकार और वन विभाग को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन जगहों पर पहले काम किया जाना चाहिए।
इन इलाकों में जंगलों को फिर से विकसित करने, सड़कों पर अंडरपास या वन्यजीव पुल बनाने और नए निर्माण को नियंत्रित करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अध्ययन की जानकारी अभी काफी बड़े क्षेत्र के स्तर पर है। छोटे गांव, सड़क या किसी खास रास्ते पर जानवर किस तरह चलते हैं, इसे जानने के लिए आगे जीपीएस ट्रैकिंग और मल के आनुवंशिक परीक्षण जैसी तकनीकों की जरूरत होगी।
वन्यजीवों के लिए जंगल सिर्फ रहने की जगह नहीं है, बल्कि एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुंचने का रास्ता भी उतना ही जरूरी है। अगर इन रास्तों को समय रहते बचाया गया, तो वन्यजीवों और इंसानों के बीच टकराव कम करने के साथ-साथ बाघ, तेंदुआ, हाथी, गौर और जंगली कुत्ते जैसी प्रजातियों का भविष्य भी सुरक्षित किया जा सकता है।