वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट में लाइकेन की पांच नई प्रजातियों की खोज की: शोध

पश्चिमी घाट में लाइकेन की पांच नई प्रजातियों की खोज, वैज्ञानिकों ने डीएनए अध्ययन से बढ़ाई जैव विविधता की समझ, संरक्षण और पर्यावरण निगरानी को मिलेगा नया आधार
लाइकेन वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और आवासीय बदलावों के प्रति संवेदनशील होने के कारण पर्यावरण गुणवत्ता के महत्वपूर्ण जैव संकेतक माने जाते हैं।
लाइकेन वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और आवासीय बदलावों के प्रति संवेदनशील होने के कारण पर्यावरण गुणवत्ता के महत्वपूर्ण जैव संकेतक माने जाते हैं।फोटो साभार: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
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सारांश
  • पश्चिमी घाट में वैज्ञानिकों ने लाइकेन बनाने वाले कवक ऑलोग्राफा की पांच नई प्रजातियों की खोज कर जैव विविधता अनुसंधान को नई दिशा दी।

  • यह शोध मैक्स आघारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे के वैज्ञानिकों ने आधुनिक डीएनए तकनीक और पारंपरिक वर्गीकरण पद्धति के संयुक्त उपयोग से किया।

  • अध्ययन से पता चला कि समान दिखने वाली कई प्रजातियां विकासक्रम के नजरिए से अलग हैं, इसलिए डीएनए विश्लेषण आवश्यक है।

  • लाइकेन वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और आवासीय बदलावों के प्रति संवेदनशील होने के कारण पर्यावरण गुणवत्ता के महत्वपूर्ण जैव संकेतक माने जाते हैं।

  • यह खोज पश्चिमी घाट की समृद्ध जैव विविधता को रेखांकित करती है तथा भविष्य के संरक्षण, पर्यावरण निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान को मजबूत आधार प्रदान करेगी।

भारत के पश्चिमी घाट के घने जंगलों में वैज्ञानिकों ने लाइकेन बनाने वाले कवकों (फंगस) की ऑलोग्राफा वंश की पांच नई प्रजातियों की खोज की है। यह खोज भारत की जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से पर्यावरण की निगरानी, जंगलों के संरक्षण और नई संरक्षण नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।

यह शोध पुणे स्थित मैक्स आघारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने किया है। यह संस्थान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत कार्य करता है। शोध के परिणाम प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका माइकोलॉजिकल प्रोग्रेस में प्रकाशित हुए हैं।

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क्या होता है लाइकेन?

लाइकेन दो जीवों का एक साथ रहने वाला प्राकृतिक समूह होता है। इसमें एक कवक (फंगस) और एक शैवाल या सायनोबैक्टीरिया मिलकर एक नई संरचना बनाते हैं। दोनों एक-दूसरे की सहायता करते हैं। इसी कारण इसे सहजीवी संबंध का अच्छा उदाहरण माना जाता है।

लाइकेन वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जंगलों में होने वाले बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। यदि किसी क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ता है या जंगलों का वातावरण खराब होता है, तो लाइकेन सबसे पहले प्रभावित होते हैं। इसलिए वैज्ञानिक इन्हें पर्यावरण की गुणवत्ता और वनों के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक मानते हैं।

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ऑलोग्राफा वंश क्यों है खास?

ऑलोग्राफा, लाइकेन बनाने वाले कवकों का एक प्रमुख वंश है। यह ग्राफिडेसी परिवार का हिस्सा है। दुनिया भर में इसकी 200 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनकी पहचान इनके लंबे और पतले फलन शरीर से होती है, जो देखने में लिखावट जैसी रेखाओं के समान दिखाई देते हैं। इसी कारण इन्हें "स्क्रिप्ट लाइकेन" भी कहा जाता है।

भारत में ऑलोग्राफा की कई प्रजातियाँ पहले केवल उनके बाहरी आकार और संरचना के आधार पर पहचानी गई थीं। इनके बारे में आणविक या डीएनए स्तर की जानकारी बहुत कम उपलब्ध थी, विशेष रूप से पश्चिमी घाट क्षेत्र में।

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कैसे किया गया यह अध्ययन?

वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट के विभिन्न उष्णकटिबंधीय जंगलों में व्यापक सर्वेक्षण किया और बड़ी संख्या में लाइकेन के नमूने एकत्र किए। इसके बाद प्रत्येक नमूने का सूक्ष्म स्तर पर अध्ययन किया गया।

शोधकर्ताओं ने पारंपरिक वर्गीकरण पद्धति के साथ आधुनिक डीएनए तकनीक का भी उपयोग किया। उन्होंने तीन आनुवंशिक मार्करों - एमटीएसएसयू, एनआर एलएसयू और आरपीबी2-की सहायता से प्रजातियों के बीच संबंधों का अध्ययन किया। इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिली कि कौन-सी प्रजातियां वास्तव में एक-दूसरे से संबंधित हैं और कौन-सी केवल दिखने में समान हैं।

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पांच नई प्रजातियों की पहचान

इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने ऑलोग्राफा की पांच नई प्रजातियों की पहचान की। इनके नाम हैं - एलोोग्राफा केरलेन्सिस, एलोोग्राफा नायकाए, एलोोग्राफा पैराकॉन्सैंग्विनिया, एलोोग्राफा पर्सिस्टिन्स्पर्सा और एलोोग्राफ़ा सेमीकार्बोनिसाटा।

इनमें एलोोग्राफा केरलेन्सिस का नाम केरल राज्य के नाम पर रखा गया है, जबकि एलोोग्राफा नायकाए का नाम प्रसिद्ध भारतीय लाइकेन वैज्ञानिक डॉ. संजीवा नायका के सम्मान में रखा गया है। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने पहले से ज्ञात कई प्रजातियों के लिए भी नया आणविक डेटा तैयार किया, जिससे भविष्य में इनके अध्ययन और पहचान में आसानी होगी।

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शोध से क्या पता चला?

अध्ययन में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि कई प्रजातियां बाहर से देखने में लगभग एक जैसी दिखाई देती हैं, लेकिन डीएनए परीक्षण से पता चला कि उनका विकास क्रम अलग-अलग है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल बाहरी बनावट के आधार पर किसी प्रजाति की सही पहचान करना हमेशा संभव नहीं होता।

डीएनए आधारित अध्ययन ने नई और पुरानी दोनों प्रकार की प्रजातियों के बीच वास्तविक संबंधों को स्पष्ट किया। इससे वैज्ञानिकों को ऑलोग्राफा वंश के विकास और विविधता को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली।

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संरक्षण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

पश्चिमी घाट दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता क्षेत्रों में से एक है। यहां अनेक ऐसे जीव पाए जाते हैं जो दुनिया के किसी अन्य स्थान पर नहीं मिलते। इस नई खोज से यह भी साबित हुआ है कि इस क्षेत्र में अभी भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिनकी पहचान होना बाकी है।

यह अध्ययन भविष्य में जैव विविधता के आकलन, पर्यावरण संरक्षण और वन प्रबंधन की योजनाओं के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करेगा। साथ ही, वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट में मिलने वाली ऑलोग्राफा प्रजातियों की एक अद्यतन सूची भी तैयार की है, जो आगे के शोध कार्यों में उपयोगी होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे अध्ययन लगातार किए जाते रहे, तो भारत की जैव विविधता के बारे में और अधिक नई जानकारियां सामने आएंगी। इससे न केवल दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण संभव होगा, बल्कि पर्यावरण की गुणवत्ता की बेहतर निगरानी और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।

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