

केरल के कोझिकोड जिले में वैज्ञानिकों ने नई ततैया प्रजाति स्पिलोमेना मलाबारिका की खोज कर जैव विविधता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
केवल 3.5 मिलीमीटर लंबी यह नई ततैया पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले एफिड कीटों का शिकार करती है।
शोधकर्ताओं ने पीले पैन ट्रैप की मदद से दुर्लभ नमूना एकत्र कर आधुनिक तकनीक से उसकी पहचान की।
नई प्रजाति की अनोखी पंख संरचना और सिर की बनावट इसे अन्य संबंधित ततैया प्रजातियों से अलग बनाती।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज ततैयों के वर्गीकरण और उनके विकासक्रम को समझने में मदद करेगी।
भारत के वैज्ञानिकों ने एक नई ततैया (वॉस्प) प्रजाति की खोज की है। इस नई प्रजाति का नाम स्पिलोमेना मलाबारिका रखा गया है। यह खोज केरल के कोझिकोड जिले में की गई है। इस खोज को देश की जैव विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
इस नई प्रजाति की पहचान भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वैज्ञानिकों ने की है। यह खोज उस समय हुई जब शोधकर्ताओं को एक विशेष जाल में इस कीट का नमूना मिला।
पीले जाल से पकड़ी गई दुर्लभ ततैया
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस ततैया को एक पीले रंग के पैन ट्रैप की मदद से पकड़ा गया था। ऐसे जाल चमकीले रंग के कारण कीड़ों को आकर्षित करते हैं। कीट जाल में आने के बाद सुरक्षित रूप से उसमें फंस जाते हैं, जिससे वैज्ञानिक उन्हें बिना नुकसान पहुंचाए अध्ययन के लिए एकत्र कर सकते हैं। वैज्ञानिकों ने आधुनिक माइक्रोस्कोप और 3डी इमेजिंग तकनीक की सहायता से इसका विस्तार से अध्ययन किया।
आकार में बेहद छोटी
नई खोजी गई यह ततैया बहुत छोटी है। इसकी लंबाई केवल 3.5 मिलीमीटर से थोड़ी अधिक है। इसका शरीर काले और भूरे रंग का होता है। सामान्य आंखों से इसके विशेष गुणों को पहचानना मुश्किल है, इसलिए वैज्ञानिकों ने इसकी संरचना का सूक्ष्म अध्ययन किया।
वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके आगे के पंख में एक विशेष प्रकार की नसों की बनावट है। इसके पंख में केवल एक सबमार्जिनल सेल मौजूद है, जो इसे अन्य कई प्रजातियों से अलग बनाती है। यही विशेषता इसकी पहचान में महत्वपूर्ण साबित हुई।
दूसरी प्रजाति से अलग है बनावट
शोधकर्ताओं के अनुसार यह ततैया अपनी निकटतम रिश्तेदार प्रजाति स्पिलोमेना यूनस से कुछ मामलों में मिलती-जुलती है। हालांकि इसके सिर की बनावट अलग है। इसका सिर अधिक लंबा नहीं है और आंखों तथा सिर के ऊपरी भाग के बीच का अनुपात संतुलित है।
इसके अलावा इसके चेहरे का सामने वाला हिस्सा अपेक्षाकृत अधिक सपाट है। वैज्ञानिक भाषा में इसे कम उभरा हुआ क्लाइपियस कहा जाता है। यही विशेषताएं इसे अन्य संबंधित प्रजातियों से अलग पहचान देती हैं।
नाम में छिपा है क्षेत्र का सम्मान
नई प्रजाति का नाम भी उसके खोज क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम मलाबारिका रखा है। यह नाम केरल के ऐतिहासिक मलाबार क्षेत्र के सम्मान में दिया गया है, जहां इस ततैया का नमूना मिला था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी नई प्रजाति को नाम देना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह उस स्थान और उसकी प्राकृतिक धरोहर को भी सम्मान देने का तरीका होता है।
किसानों के लिए भी हो सकती है उपयोगी
यह ततैया एफिड या माहू जैसे छोटे पौधों के कीटों का शिकार करती है। एफिड्स फसलों और अन्य पौधों को नुकसान पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में यह छोटी ततैया प्राकृतिक रूप से इन कीटों की संख्या नियंत्रित करने में मदद कर सकती है। हालांकि अभी इसके व्यवहार और जीवन चक्र पर अधिक अध्ययन की जरूरत है, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि भविष्य में यह जैविक कीट नियंत्रण के क्षेत्र में उपयोगी साबित हो सकती है।
वैज्ञानिकों के सामने नया सवाल
इस खोज ने वैज्ञानिकों के सामने एक नया प्रश्न भी खड़ा कर दिया है। स्पिलोमेना मलाबारिका में ऐसे गुण पाए गए हैं जो दो अलग-अलग ततैया समूहों के बीच की सीमाओं को धुंधला करते हैं। इससे संकेत मिलता है कि वर्तमान वर्गीकरण प्रणाली पूरी तरह सही नहीं भी हो सकती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में डीएनए विश्लेषण और इनके जीवन चक्र के विस्तृत अध्ययन की मदद से इन ततैयों के विकासक्रम को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। इससे इनके वर्गीकरण में बदलाव भी संभव है।
जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण खोज
विशेषज्ञों का कहना है कि यह खोज दिखाती है कि भारत के जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में अभी भी अनेक जीव-जंतु ऐसे हैं जिनकी पहचान होना बाकी है। एक बेहद छोटे कीट की यह खोज न केवल देश की जैव विविधता को समृद्ध करती है, बल्कि वैज्ञानिकों को प्रकृति के विकास और जीवों के संबंधों को समझने का नया अवसर भी प्रदान करती है।