

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संस्थान के वैज्ञानिकों ने पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानों इलाकों से होवरफ्लाई की दो नई प्रजातियों की खोज की है।
नई प्रजातियों के नाम एरिस्टालिनस सैफिरिनस और एरिस्टालिनस ब्रुनेट्टी रखे गए हैं, 100 वर्षों बाद अहम खोज।
शोध में 2022 से 2025 तक एकत्र नमूनों का अध्ययन और डीएनए बारकोडिंग तकनीक का उपयोग किया गया।
होवरफ्लाई परागण में सहायक होते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहता है।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संस्थान (जेडएसआई) के वैज्ञानिकों ने पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानी इलाकों से होवरफ्लाई की दो नई प्रजातियों की खोज की है। इन प्रजातियों के नाम एरिस्टालिनस सैफिरिनस और एरिस्टालिनस ब्रुनेट्टी रखे गए हैं। यह खोज भारत में एरिस्टालिनस समूह की नई प्रजातियों के जुड़ने की एक बड़ी घटना है, क्योंकि लगभग 100 वर्षों के बाद इस समूह में कोई नई प्रजाति दर्ज की गई है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका यूरोपियन जर्नल ऑफ टेक्सोनोमी में प्रकाशित किया गया है। इस शोध को कोलकाता स्थित जेडएसआई की वैज्ञानिक टीम ने किया है, जिसमें ब्रिस्टी रॉय, ओइशिक कर और जयिता सेनगुप्ता शामिल हैं। इन वैज्ञानिकों ने 2022 से 2025 के बीच बंगाल के अलग-अलग जिलों से नमूने एकत्र किए और उनका विस्तृत अध्ययन किया।
कैसे हुई प्रजातियों की पहचान
वैज्ञानिकों ने इन कीटों की पहचान के लिए पारंपरिक आकारिकी (मॉर्फोलॉजी) अध्ययन के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का भी उपयोग किया। इसमें माइटोकॉन्ड्रियल सीओआई डीएनए बारकोडिंग शामिल थी। इस तकनीक की मदद से यह सुनिश्चित किया गया कि ये दोनों जीव पहले से ज्ञात किसी भी प्रजाति से अलग हैं। इस प्रकार इन्हंई नई प्रजातियों के रूप में मान्यता दी गई।
नामकरण का कारण और महत्व
नई प्रजाति एरिस्टालिनस सैफिरिनस का नाम इसके नीले-चमकीले रंग के कारण रखा गया है, जो नीलम (सैफायर) जैसा दिखाई देता है। दूसरी प्रजाति एरिस्टालिनस ब्रुनेट्टी का नाम प्रसिद्ध कीट वैज्ञानिक एनरिको एडेलमो ब्रुनेटी के सम्मान में रखा गया है, जिन्होंने भारत में मक्खियों पर महत्वपूर्ण कार्य किया था।
होवरफ्लाई का पारिस्थितिक महत्व
होवरफ्लाई कीट सिरफिडे परिवार से संबंधित होते हैं। ये कीट प्रकृति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वयस्क होवरफ्लाई फूलों पर जाकर परागण में मदद करते हैं, जिससे पौधों की वृद्धि और फल-फूल बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है। इनके लार्वा पानी और नमी वाले स्थानों में कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं।
वैज्ञानिकों की प्रतिक्रिया और निष्कर्ष
शोध पत्र में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संस्थान के शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि यह खोज दिखाती है कि मानव गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों में भी अभी बहुत जैव विविधता छिपी हुई है। होवरफ्लाई की पहचान करना कठिन होता है क्योंकि कई प्रजातियां देखने में एक जैसी लगती हैं। इसलिए इस शोध में पारंपरिक अध्ययन के साथ डीएनए तकनीक का उपयोग किया गया, जिससे सही पहचान संभव हो सकी।
शोध में कहा गया है कि यह खोज इस बात का संकेत है कि सामान्य और रोजमर्रा के पर्यावरण में भी अभी कई अनदेखे जीव मौजूद हैं, जिन्हें पहचानने की जरूरत है।