दुनिया में 26,164 तक हो सकती हैं मधुमक्खियों की प्रजातियां, हजारों अब भी हैं गुमनाम

वैज्ञानिकों ने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि 1960 से अब तक हर साल मधुमखियों की औसतन 117 नई प्रजातियों की पहचान की जा रही है। लेकिन विशेषज्ञों की कमी के कारण खोज की रफ्तार धीमी है
फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • नए वैश्विक अध्ययन के मुताबिक दुनिया में मधुमक्खियों की 24,705 से 26,164 तक प्रजातियां हो सकती हैं, जिनमें से हजारों अब भी गुमनामी के अंधेरे में हैं।

  • 1960 से हर साल औसतन 117 नई प्रजातियां खोजी जा रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों की कमी के चलते यह रफ्तार पर्याप्त नहीं है।

  • जब दुनिया की 75 फीसदी फसलें परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं, तब यह शोध चेतावनी देता है कि हमारी खाद्य सुरक्षा उन प्रजातियों पर टिकी है, जिन्हें हम अब भी पूरी तरह जानते तक नहीं।

धरती पर गूंजती मधुमक्खियों की आवाजें सिर्फ प्रकृति की धुन नहीं, बल्कि जीवन का आधार भी हैं। आपको जानकार हैरानी होगी कि हमारी थाली तक पहुंचने वाले हर तीसरे निवाले के पीछे इन जीवों की कड़ी मेहनत छिपी है।

इसके बावजूद चौंकाने वाली बात यह है कि आज तक हम यह भी ठीक से नहीं जानते थे कि दुनिया में मधुमक्खियों की कुल कितनी प्रजातियां हैं। अब एक नए अध्ययन ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है। यूनिवर्सिटी ऑफ वोलोंगोंग से जुड़े जीवविज्ञानी डॉक्टर जेम्स डोरी के नेतृत्व में किए इस ऐतिहासिक अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया भर में मधुमक्खियों की कुल प्रजातियां की संख्या 24,705 से 26,164 के बीच हो सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार यह संख्या अब तक दर्ज आधिकारिक आंकड़ों से कम से कम 3,700 से 5,200 अधिक है, जो इस विषय में हमारी समझ में एक बड़ी कमी को उजागर करती है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।

186 देशों के आंकड़ों ने खोली आंखें

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 186 देशों के आंकड़ों, वैश्विक डेटासेट, टैक्सोनॉमिक रिकॉर्ड, नेशनल चेकलिस्ट और वैज्ञानिक साहित्य का विश्लेषण किया है, जिसके नतीजे चौंकाने वाले रहे।

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अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि यूरोप के कई देशों जैसे स्वीडन और स्विट्जरलैंड में मधुमक्खियों की प्रजातियों की पहचान काफी हद तक पूरी हो चुकी है। हालांकि तुर्की में अब भी करीब 843 प्रजातियां ऐसी हैं जिन्हें खोजा और नाम दिया जाना बाकी है। यह संख्या पूरे महाद्वीपीय यूरोप से भी अधिक है।

इसी तरह द्वीपीय देशों में मधुमक्खियों की विविधता महाद्वीपीय देशों की तुलना में अधिक पाई गई। लेकिन चिंता की बात है कि यही देश जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे में भी हैं, यानी जहां जैव विविधता अधिक है, वहीं जोखिम भी अधिक है। इसका मतलब है कि यहां संरक्षण की जरूरत और भी ज्यादा है।

हर साल 117 नई प्रजातियां, फिर भी अधूरा है सफर

 वैज्ञानिकों ने इस बात की भी जानकारी दी है कि 1960 से अब तक हर साल मधुमखियों की औसतन 117 नई प्रजातियों की पहचान की जा रही है। लेकिन विशेषज्ञों की कमी के कारण खोज की रफ्तार सीमित है। इस स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में “टैक्सोनॉमिक बॉटलनेक” कहा जाता है ऐसे में शोधकर्ताओं ने चेताया है कि अगर यही गति जारी रही तो ज्ञान के इस अंतर को भरने में कम से कम 30 से 45 साल और लग सकते हैं।

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हमें समझना होगा कि मधुमक्खियां महज शहद नहीं देतीं, वे हमारी खाद्य प्रणाली की भी रीढ़ हैं। फसलों के परागण से लेकर पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन तक, उनका योगदान अदृश्य लेकिन निर्णायक है।

क्यों जरूरी है यह समझ?

इस बारे में डॉक्टर जेम्स डोरी का कहना है, “यदि हमें यह नहीं पता कि कितनी प्रजातियां मौजूद हैं, तो हम संरक्षण की पूरी तस्वीर नहीं देख पा रहे। मधुमक्खियों की विविधता स्वस्थ पर्यावरण और पर्यावरण अनुकूल कृषि की बुनियाद है।“

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अफ्रीका, एशिया और मध्य व दक्षिण अमेरिका में इन प्रजातियों की विविधता बहुत अधिक है, लेकिन शोध, संसाधन और विशेषज्ञता की कमी इस ज्ञान को अधूरा रखे हुए है। यहां तक कि अपेक्षाकृत समृद्ध देशों में भी आनुवंशिक विश्लेषण का पर्याप्त उपयोग नहीं हुआ है, जिससे वास्तविक संख्या कम आंकी जा सकती है।

वर्तमान में पृथ्वी पर करीब 22 लाख प्रजातियों की वैज्ञानिक पहचान हो चुकी है। हर साल औसतन करीब 18,000 नए जटिल कोशिकाओं वाले जीवों की पहचान हो रही है।

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इनमें से करीब 75 फीसदी प्रजातियां अकशेरुकी जीवों (बिना रीढ़ वाले जीवों) की होती हैं। हालांकि अनुमान है कि विशेषकर कीटों और अकशेरुकी जीवों के मामले में वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

यह अध्ययन न केवल मधुमक्खियों की असली विविधता को सामने लाता है, बल्कि यह भी बताता है कि जैव विविधता के संरक्षण के लिए हमें तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे। जैसे-जैसे पर्यावरणीय बदलाव तेज हो रहे हैं, वैसे-वैसे यह समझना और भी जरूरी हो गया है कि हमारी खाद्य व्यवस्था और प्राकृतिक संतुलन किन अदृश्य प्रजातियों पर टिका है।

परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं 75 फीसदी फसलें

हमें समझना होगा कि जब खेतों में फसलें लहलहाती हैं, या उपवन में फूल खिलते हैं, तब उनकी जीवनधारा कहीं न कहीं मधुमक्खियों की गूंज से जुड़ी होती है।

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वैज्ञानिकों के मुताबिक दुनिया में करीब 75 फीसदी फसलें काफी हद तक मधुमखियों और दूसरे परागण करने वाले जीवों पर निर्भर हैं।

एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि वैश्विक स्तर पर जिस तरह से परागण करने वाले जीवों में कमी आ रही है, उसके चलते करीब 90 फीसदी जंगली पौधों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। गौरतलब है कि परागण करने वाली यह मधुमखियां और दूसरे कीट वैश्विक स्तर पर करीब 35 फीसदी खाद्य उत्पादन में योगदान देते हैं।

वैज्ञानिकों की मानें तो परागण का फायदा सिर्फ फलों की पैदावार तक ही सीमित नहीं है, यह उनकी गुणवत्ता के लिए भी बेहद मायने रखता है।

हमें समझना होगा कि जब खेतों में फसलें लहलहाती हैं, या उपवन में फूल खिलते हैं, तब उनकी जीवनधारा कहीं न कहीं मधुमक्खियों की गूंज से जुड़ी होती है। मधुमक्खियों की यह अनदेखी दुनिया हमें साफ संकेत देती है, हमारी खाद्य व्यवस्था जितनी मजबूत दिखती है, उतनी ही नाजुक भी है। अगर परागण की यह श्रृंखला टूटी, तो असर खेत से बाजार और बाजार से हमारी थाली तक भी पहुंचेगा।

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