

भारत सहित एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे विकासशील देशों में विदेशी आक्रामक प्रजातियां जैव विविधता के लिए पहले के अनुमान से कहीं बड़ा खतरा बन चुकी हैं।
साइंस जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में 172 देशों के 22,000 से अधिक मामलों के विश्लेषण से पता चला है कि ग्लोबल साउथ में इन प्रजातियों का पारिस्थितिक नुकसान विकसित देशों की तुलना में करीब 50 फीसदी अधिक गंभीर है।
बता दें कि भारत में लैंटाना, जलकुंभी, कांग्रेस घास, विलायती कीकर और अफ्रीकी कैटफिश जैसी प्रजातियां जंगलों, नदियों, झीलों और कृषि भूमि में फैलकर स्थानीय पेड़-पौधों व वन्यजीवों को तेजी से विस्थापित कर रही हैं।
अध्ययन के अनुसार, समस्या केवल इन प्रजातियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके कारण होने वाला वास्तविक पारिस्थितिक नुकसान है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि तेजी से पनपता व्यापार, जलवायु परिवर्तन, सीमित संसाधन और कमजोर प्रबंधन व्यवस्था विकासशील देशों को अधिक असुरक्षित बना रहे हैं।
ऐसे में भारत जैसे जैव विविधता से समृद्ध देशों के लिए समय रहते निगरानी, सख्त रोकथाम और प्रभावी संरक्षण नीतियां अपनाना बेहद जरूरी है, क्योंकि एक बार यह जैविक आक्रमण बेकाबू हो गया तो खोई हुई प्राकृतिक संपदा को वापस लाना लगभग असंभव होगा।
प्रकृति की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलन है। लेकिन जब कोई बाहरी प्रजाति इस संतुलन में दखल देती है, तो उसका असर सिर्फ पेड़-पौधों या जीवों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। ऐसा ही कुछ इस समय भारत सहित दुनिया भर में हो रहा है।
एक नई स्टडी से पता चला है कि प्रकृति के लिए सबसे बड़े खतरों में गिनी जाने वाली विदेशी आक्रामक प्रजातियां भारत सहित अन्य विकासशील देशों में अनुमान से कहीं अधिक तबाही मचा रही हैं। गौरतलब है कि ये वो देश हैं जहां इनकी समृद्ध प्रकृति ही हमारी असली संपत्ति है।
प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल साइंस में प्रकाशित इस स्टडी के मुताबिक एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों में इन प्रजातियों का कहर विकसित देशों की तुलना में करीब 50 फीसदी अधिक गंभीर है।
यह महज एक आंकड़ा नहीं है, इसका मतलब है कि हमारे जंगलों से स्थानीय पेड़-पौधे गायब हो रहे हैं और परिंदों के साथ-साथ दूसरे जीव बेघर हो रहे हैं। इससे सदियों से चला आ रहा प्राकृतिक संतुलन बिखर रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक इस खतरे का वास्तविक आकलन नहीं हो पाया था, क्योंकि अधिकांश अध्ययन यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे विकसित देशों में केंद्रित रहे हैं, जबकि दक्षिण के देशों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया गया।
सिर्फ प्रजातियां नहीं गिनीं, नुकसान की गंभीरता भी मापी
रिसर्च के मुताबिक अब तक के अधिकांश वैश्विक आकलनों में यह देखा जाता था कि किसी देश में कितनी आक्रामक विदेशी प्रजातियां मौजूद हैं। लेकिन इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक नया पैमाना विकसित किया। इसके तहत केवल आक्रामक प्रजातियों की संख्या नहीं, बल्कि यह भी आंका गया कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं।
इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 172 देशों में दर्ज 22,000 से अधिक पारिस्थितिक प्रभावों वाले वैश्विक डेटाबेस 'ग्लोबल इम्पैक्ट्स डेटासेट ऑफ इनवेसिव एलियन स्पीशीज’ का विश्लेषण किया है।
इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) ने भी अपनी रिपोर्ट "द असेसमेंट रिपोर्ट ऑन इनवेसिव एलियन स्पीशीज एंड देयर कंट्रोल" में खुलासा किया है कि दुनिया भर में 60 फीसदी पौधों और जीवों के विलुप्त होने की वजह विदेशी आक्रामक प्रजातियां हैं।
ये विदेशी आक्रामक प्रजातियां हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को 42,300 करोड़ डॉलर से ज्यादा का नुकसान पहुंचा रही हैं। इनमें तालाबों को ढंक देने वाली जलकुम्भी से लेकर पक्षियों के अंडों को खाने वाले चूहों, लैंटाना, अफ्रीकी कैटफिश, केकड़ों, चिट्रिड फंगस, सीपों, कीकड़ जैसे पेड़-पौधों, एशियन हॉर्नेट, गिलहरी और सांप तक शामिल हैं।
वहीं यदि 1970 के बाद से देखें तो नुकसान की यह दर हर दशक चार गुना तेजी से बढ़ रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 37,000 से ज्यादा विदेशी प्रजातियां हैं, जिनमें से करीब 3500 से ज्यादा आक्रामक प्रजातियां हैं जो अपने मूल स्थानों से दूर भी स्थानीय जैवविविधता के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। वहीं हर साल 200 नई विदेशी प्रजातियां दर्ज की जाती हैं।
भारत का दर्द: विलायती कीकर से लैंटाना तक का 'अदृश्य हमला'
यदि भारत की बात करें तो देश में भी आक्रामक विदेशी प्रजातियां स्थानीय जैवविविधता के लिए बड़ा खतरा बन चुकी हैं। इनमें से एक विलायती कीकर भी है, जिसे अंग्रेज 20वीं शताब्दी की शुरूआत में दिल्ली लाए थे, इसके बाद यह प्रजाति पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैल गई।
ऐसा ही एक मामला असम में सामने आया, जहां एक विदेशी आक्रमणकारी पौधा लुडविगिया पेरूविया धनसीरी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के साथ-साथ कोपिली नदी के पूर्वी हिस्से में स्थित स्थानीय जैव विविधता के लिए खतरा बन गया है।
इसी तरह लैंटाना, जलकुंभी, कांग्रेस घास, विलायती कीकर और अफ्रीकी कैटफिश जैसी विदेशी आक्रामक प्रजातियां देश के जंगलों, जलाशयों और कृषि भूमि में फैलकर स्थानीय जैव विविधता तथा पारिस्थितिक संतुलन को लगातार नुकसान पहुंचा रही हैं।
विकासशील देशों में क्यों ज्यादा हो रही है तबाही?
रिसर्च रिपोर्ट से पता चला है कि इस त्रासदी के पीछे इंसान की तेज होती महत्वाकांक्षा और लाचारी का एक अजीब संगम है। दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के उभरते हुए देशों में तेज आर्थिक विकास और बढ़ता वैश्विक व्यापार विदेशी प्रजातियों के प्रवेश को तेजी से बढ़ा रहे हैं।
दक्षिण के देश आज तेजी से तरक्की कर रहे हैं। व्यापार की रफ्तार बढ़ी है, जहाज और उड़ानों का आना-जाना बढ़ा है। इंसान और सामान के आवागमन के चलते उनके साथ जाने-अनजाने में ऐसी बाहरी प्रजातियां भी हमारी सीमाओं में घुस आती हैं, जो यहां की नहीं हैं। जब यही बाहरी जीव अमीर देशों में पहुंचते हैं, तो वहां की सरकारें भारी बजट, सख्त नियमों और आधुनिक तकनीक से उन्हें रोक लेती हैं।
लेकिन विकासशील देशों में, जहां नीतियां अभी बन रही हैं, संसाधनों की कमी है और पर्यावरण प्रबंधन पहली प्राथमिकता नहीं बन पाता, वहां ये जीव बेकाबू हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि हमारी अपनी ही मिट्टी के मूल पेड़-पौधे और जीव-जंतु अपने ही घर में बेगाने होने लगते हैं।
तरक्की की रफ्तार के साथ बढ़ रहा 'जैविक हमला'
अपनी गजब की अनुकूलन क्षमता से ये प्रजातियां स्थानीय पौधों और जीवों को तेजी से खत्म करने लगती हैं। कई मामलों में तो इनकी वजह से स्थानीय प्रजातियों के विलुप्त होने तक की स्थिति पैदा हो जाती है।
वैज्ञानिकों ने सांख्यिकीय मॉडल के जरिए यह भी दिखाया कि जिन देशों में प्रभावी शासन, मजबूत पर्यावरणीय नीतियां और समय रहते रोकथाम की व्यवस्था मौजूद है, वहां आक्रामक विदेशी प्रजातियों से होने वाला नुकसान काफी कम रहता है। इसके विपरीत, जहां प्रबंधन कमजोर है, वहां ये प्रजातियां बिना रोक-टोक के फैलती हैं और जैव विविधता को गंभीर क्षति पहुंचाती हैं।
जलवायु परिवर्तन की भी है बड़ी भूमिका
पिछले शोधों से पता चला है कि आक्रामक विदेशी प्रजातियां, जलवायु परिवर्तन जैसे अन्य कारकों से भी प्रभावित होती हैं। इससे इनके प्रभाव और भी मजबूत हो जाते हैं।
उदाहरण के लिए, आक्रामक पौधे जंगल में लगने वाली आग को कहीं ज्यादा भड़का सकते हैं, जो कहीं ज्यादा समय तक जलती रहती है। ऐसा ही कुछ पिछले हवाई में लगी आग के साथ देखा गया, जो आक्रामक घासों के कारण फैल गई थी, जिन्हें पशुओं के लिए अफ्रीका से लाया गया था।
कुछ ऐसी ही स्थिति मच्छरों के मामले में देखी गई, जिनकी आक्रामक प्रजातियों से उन देशों में भी डेंगू, मलेरिया, जीका और वेस्ट नाइल जैसी बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया है जहां पहले कभी इनसे खतरा नहीं था। ऐसा ही मामला पेरिस में सामने आया था, जहां जलवायु में आते बदलावों के चलते मच्छरों का खतरा बढ़ गया, नतीजन पहली बार पेरिस के स्वास्थ्य अधिकारियों को सार्वजनिक स्थानों पर कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ा था।
हाल ही में जर्नल नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित एक अध्ययन में पुष्टि हुई है कि दुनिया भर के पहाड़ी इलाकों में पौधों की 'एलियन' प्रजातियां तेजी से फैल रही हैं।
हालांकि पर्वतीय क्षेत्रों के बारे में अब तक यह मान्यता थी कि यह क्षेत्र काफी हद तक जैविक आक्रमणों से बचे हुए हैं। लेकिन रिसर्च से पता चला है कि पहाड़ी क्षेत्रों में पौधों की यह विदेशी प्रजातियों औसतन 16 फीसदी प्रति दशक की दर से बढ़ रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय नीतियों में बदलाव की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि जैव विविधता पर मंडराते इस संकट से निपटने के लिए केवल यह गिनना पर्याप्त नहीं है कि कोई प्रजाति कितने देशों में फैल चुकी है। असली चुनौती यह समझना है कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को कितना नुकसान पहुंचा रही है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, सबसे प्रभावी रणनीति रोकथाम है। इसके लिए हर देश में मजबूत प्रबंधन तंत्र, प्रभावी निगरानी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।
खासतौर पर उन विकासशील देशों को अधिक सहायता और संसाधन उपलब्ध कराने होंगे, जहां दुनिया की सबसे समृद्ध जैव विविधता मौजूद है, लेकिन संरक्षण की क्षमता अभी भी सीमित है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो इन क्षेत्रों में पारिस्थितिकी को होने वाला नुकसान इतना गहरा होगा कि उसकी भरपाई संभव नहीं होगी।