

दिल्ली में यमुना को प्रदूषण से बचाने की कोशिशों के बीच सीवेज प्रबंधन से जुड़ी अधूरी परियोजनाएं बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
दिल्ली जल बोर्ड ने 26 अक्टूबर, 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल रिपोर्ट में बताया कि शाहदरा नाले के किनारे सीवर पाइपलाइन बिछाने का काम 90 फीसदी पूरा हो चुका है, लेकिन सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग से अनुमति नहीं मिलने के कारण मानसून के बाद से काम ठप है।
इस परियोजना को 31 दिसंबर, 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ने के 34 कार्यों में से केवल आठ पूरे हुए हैं।
सीवेज शोधन की क्षमता बढ़ाने के लिए कोंडली और जागृति विहार में दो नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की योजना है, जिन्हें दिसंबर 2028 तक पूरा करने की उम्मीद है।
यमुना विहार में भी नए संयंत्र के निर्माण और मौजूदा एसटीपी की क्षमता बढ़ाने का काम दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। हालांकि, डीपीसीसी की जांच में यमुना विहार के दो एसटीपी से निकलने वाला शोधित पानी निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरा।
झुग्गी बस्तियों में सीवेज निपटान की समस्याएं भी बनी हुई हैं। ऐसे में यमुना को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि समयबद्ध क्रियान्वयन और प्रभावी निगरानी भी जरूरी है।
दिल्ली में यमुना नदी को गंदे नालों के प्रदूषण से बचाने की कोशिशों के बीच कई महत्वपूर्ण सीवर परियोजनाएं अब भी अधूरी हैं। शाहदरा नाले के किनारे सीवर पाइपलाइन बिछाने का काम मानसून शुरू होने के बाद से रुका हुआ है। इससे कांती नगर और ओल्ड सीलमपुर के नालों के गंदे पानी को रोकने की परियोजना की प्रगति प्रभावित हुई है।
दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) ने 26 अक्टूबर, 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी। रिपोर्ट के अनुसार, इंटरसेप्टर सीवर परियोजना के तहत शाहदरा नाले के किनारे डक्टाइल आयरन (डीआई) पाइपलाइन बिछाने का काम 90 फीसदी पूरा हो चुका है, जबकि इस पर अब तक 48 फीसदी वित्तीय प्रगति दर्ज की गई है।
दिल्ली जल बोर्ड के मुताबिक, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग ने मानसून शुरू होने के बाद से काम रोक रखा है। परियोजना का काम दोबारा शुरू करने के लिए जरूरी अनुमति अब भी नहीं मिली है। विभाग से अनुमति मिलने की शर्त पर इस काम को 31 दिसंबर, 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
यमुना में गिरने वाले गंदे पानी को रोकने के लिए दिल्ली जल बोर्ड ने ट्रांस-यमुना क्षेत्र में सीवेज शोधन क्षमता बढ़ाने की योजना भी बनाई है। इसके तहत कोंडली में 36 एमजीडी और जागृति विहार में 24 एमजीडी क्षमता के दो नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाए जाने प्रस्तावित हैं।
इन परियोजनाओं के लिए लागत अनुमान तैयार कर लिए गए हैं, जबकि टेंडर आमंत्रित किए जाने बाकी हैं। दोनों परियोजनाओं को दिसंबर 2028 तक पूरा करने की उम्मीद है।
इन संयंत्रों के निर्माण से क्षेत्र में पैदा होने वाले सीवेज के ट्रीटमेंट की क्षमता बढ़ेगी। हालांकि, प्रस्तावित समयसीमा को देखते हुए इन परियोजनाओं के पूरा होने में अभी दो साल से अधिक का समय लग सकता है।
यमुना विहार में सीवेज शोधन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए भी काम चल रहा है। दिल्ली जल बोर्ड ने यहां 20 एमजीडी क्षमता का नया एसटीपी बनाने और मौजूदा फेज-III संयंत्र की क्षमता 25 एमजीडी से बढ़ाकर 55 एमजीडी करने के ठेके जारी कर दिए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों परियोजनाओं पर काम जारी है और इनके दिसंबर 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है।
इनका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की रिपोर्ट में यमुना विहार के फेज-I और फेज-III एसटीपी से निकलने वाले शोधित पानी की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई थी। नए संयंत्र के निर्माण और मौजूदा संयंत्र की क्षमता बढ़ाने का उद्देश्य इस पानी की गुणवत्ता को निर्धारित मानकों के अनुरूप बनाना है।
सीवेज प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना भी है। दिल्ली जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, घरों के सीवर कनेक्शन से जुड़े कुल 34 कार्यों में से अब तक केवल आठ पूरे हुए हैं, जबकि 26 पर काम जारी है।
घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि बिना उचित सीवर कनेक्शन के घरेलू गंदा पानी नालों और अन्य जल स्रोतों तक पहुंच सकता है। हालांकि, रिपोर्ट में सभी 34 कार्यों के लिए निर्धारित समयसीमा और शत-प्रतिशत कनेक्टिविटी हासिल करने की विस्तृत जानकारी भी शामिल की गई है।
दिल्ली जल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान कोंडली एसटीपी के फेज-I, II, III और IV तथा यमुना विहार एसटीपी के फेज-II से निकलने वाले शोधित पानी की गुणवत्ता से संबंधित डीपीसीसी की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की।
डीपीसीसी के अनुसार, इन पांचों संयंत्रों से निकलने वाला ट्रीटेड वाटर निर्धारित मानकों के अनुरूप था। हालांकि, यमुना विहार के फेज-I और फेज-III संयंत्र निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरे।
दिल्ली जल बोर्ड इन दोनों संयंत्रों की स्थिति सुधारने के लिए नया संयंत्र बनाने और मौजूदा संयंत्र की क्षमता बढ़ाने का काम कर रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शोधन के बाद निकलने वाला पानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा करे।
रिपोर्ट में दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की ओर से झुग्गी बस्तियों में सीवेज प्रबंधन के लिए की गई या प्रस्तावित कार्रवाई का भी उल्लेख है। इसमें संजय कॉलोनी, जनता मजदूर कॉलोनी और ताज कॉलोनी शामिल हैं।
ताज कॉलोनी की स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। यह बस्ती निचले इलाके में स्थित है, जिसके कारण वहां सामान्य गुरुत्वाकर्षण आधारित सीवर नेटवर्क बिछाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है।
दिल्ली जल बोर्ड ने इस समस्या के समाधान के लिए दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड से सुरक्षित सीवेज निपटान की कार्ययोजना प्रस्तुत करने का अनुरोध किया है।
कुल मिलाकर देखें तो यह मामला दिल्ली में सीवेज प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती को सामने लाता है। सीवर लाइनें बिछाने, शोधन संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने और घरों को नेटवर्क से जोड़ने के साथ-साथ उन बस्तियों के लिए भी व्यावहारिक समाधान जरूरी हैं, जहां भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य व्यवस्था को मुश्किल बनाती हैं। ऐसे में यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए इन सभी मोर्चों पर समयबद्ध कार्रवाई अहम है।