दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में सीवेज-ड्रेनेज से पल्ला झाड़ रहा दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड: एनजीटी में लगा आरोप

कानून में डीयूएसआईबी की जिम्मेदारी स्पष्ट होने के बावजूद झुग्गी बस्तियों में सीवेज-ड्रेनेज व्यवस्था पर जवाबदेही का संकट बना हुआ है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में बहता सीवेज और बदहाल जल निकासी व्यवस्था अब केवल सफाई का नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही का सवाल बन गया है।

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष दाखिल नोट में आवेदक अभिषेक दत्त ने आरोप लगाया है कि दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) जेजे क्लस्टरों में सीवेज और ड्रेनेज की अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है। मामला बारापुला कैचमेंट की उन बस्तियों से जुड़ा है, जहां दिल्ली जल बोर्ड ने लगातार सीवेज बहने की समस्या बताई थी।

  • 8 जुलाई 2026 को एनजीटी ने डीयूएसआईबी अधिनियम की धारा 11 के तहत जल निकासी सुधार को डीयूएसआईबी की जिम्मेदारी माना था। इसके बावजूद डीयूएसआईबी ने ‘may’ शब्द का हवाला देते हुए इसे अनिवार्य जिम्मेदारी मानने से इनकार किया।

  • बोर्ड ने सीवर लाइन और एसटीपी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी डीजेबी पर डालने की बात कही है। वहीं, आवेदक ने स्लम एरियाज एक्ट, 1956 की धाराओं का हवाला देते हुए कहा है कि डीयूएसआईबी पर नालियों और सीवर की निगरानी की जिम्मेदारी भी है।

  • ऐसे में सवाल है कि बस्तियों में बहते सीवेज का स्थाई समाधान आखिर कौन करेगा?

राजधानी दिल्ली की झुग्गी-झोपड़पट्टियों (जेजे क्लस्टर) में बहते सीवर और बदहाल जल निकासी को लेकर एक बड़ी प्रशासनिक लापरवाही सामने आई है।

आरोप है कि दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में सीवेज और जल निकासी की व्यवस्था को लेकर दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है। यह आरोप आवेदक अभिषेक दत्त ने डीयूएसआईबी की स्थिति रिपोर्ट के जवाब में 24 अगस्त 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल नोट में लगाया है।

बहता सीवेज, जिम्मेदारी पर शुरू खींचतान

इससे पहले, 19 अगस्त 2025 को दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) ने एनजीटी में दायर अपने हलफनामे में कहा था कि बारापुला कैचमेंट की जेजे कॉलोनियों (जेजेसी) से सीवेज लगातार बहकर बाहर निकल रहा है। डीजेबी ने यह भी स्पष्ट किया था कि इन बस्तियों के रखरखाव की जिम्मेदारी दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के पास है।

इस पर एनजीटी ने 20 अगस्त 2025 को दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड को निर्देश दिया था कि वह दिल्ली जल बोर्ड द्वारा चिन्हित स्थानों पर सीवेज संग्रह की स्थिति स्पष्ट करे। इसके बाद डीजेबी, डूसिब, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) और अन्य विभागों के बीच जेजे कॉलोनियों तथा वन भूमि में सीवेज के लिए सिंगल-पॉइंट सीवेज संग्रह व्यवस्था विकसित करने के प्रयास शुरू किए गए।

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हालांकि, आरोप है कि 8 जनवरी 2026 से दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड लगातार जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगता रहा। आखिरकार 24 मार्च 2026 को उसने यह रुख अपनाया कि जेजे कॉलोनियों में सीवर लाइन और पाइप बिछाने की जिम्मेदारी दिल्ली जल बोर्ड की है।

एनजीटी ने साफ कहा—जिम्मेदारी से नहीं बच सकता डीयूएसआईबी

इसके बाद मामले में एनजीटी ने 1 अप्रैल और 8 जुलाई 2026 को आदेश जारी करते हुए विभिन्न एजेंसियों की भूमिका स्पष्ट की।

8 जुलाई 2026 को एनजीटी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड अधिनियम, 2010 (डीयूएसआईबी अधिनियम) की धारा 11 के तहत झुग्गी बस्तियों के सुधार के लिए योजना तैयार करना डीयूएसआईबी की जिम्मेदारी है। ऐसी योजना में जल निकासी व्यवस्था में सुधार का प्रावधान भी शामिल होना चाहिए।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि अधिनियम की धारा 11(1) के स्पष्ट प्रावधानों को देखते हुए डीयूएसआईबी का यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जेजे क्लस्टरों में जल निकासी की जिम्मेदारी उसकी नहीं है।

एनजीटी ने स्पष्ट किया कि दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड यह नहीं कह सकता कि जेजे क्लस्टरों में ड्रेनेज उसकी जिम्मेदारी नहीं है। ट्रिब्यूनल ने बोर्ड से यह भी बताने को कहा कि क्या जल निकासी में सुधार के लिए कोई योजना मौजूद है या नहीं और धारा 11(2) के तहत इस व्यवस्था को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

क्या शब्दों के हेर-फेर के सहारे जिम्मेदारी से बच सकता है बोर्ड?

ट्रिब्यूनल ने कहा कि 8 जुलाई 2026 के आदेश में डीयूएसआईबी अधिनियम की धारा 11 के तहत उसकी जिम्मेदारी स्पष्ट की गई थी, लेकिन डीयूएसआईबी ने इस आदेश को वापस लेने या इसमें बदलाव के लिए कभी कोई याचिका नहीं दायर की।

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एनजीटी ने डीयूएसआईबी के अपने सिटिजन चार्टर का भी संज्ञान लिया और उसे नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके बाद डीयूएसआईबी ने 7 अगस्त 2026 को नया हलफनामा दाखिल किया।

आवेदक के अनुसार, डीयूएसआईबी अब जल निकासी की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है। अपनी स्टेटस रिपोर्ट में डीयूएसआईबी ने अधिनियम की धारा 11 की अलग व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान में ‘may’ (कर सकता है) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए झुग्गी बस्तियों के सुधार की योजना तैयार करना उसके लिए अनिवार्य जिम्मेदारी नहीं है।

डीयूएसआईबी का तर्क है कि यदि वह किसी झुग्गी बस्ती के सुधार की योजना तैयार करता भी है, तो धारा 11(1) में बताए गए सभी प्रावधानों को लागू करना उसके लिए कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। बोर्ड के अनुसार, वह अपनी योजना में केवल बस्ती विकास केंद्र, पुस्तकालय, पार्क, शिशु वाटिका या सार्वजनिक जिम जैसी सुविधाएं शामिल कर सकता है।

इसका मतलब है कि डीयूएसआईबी ने यह रुख अपनाया है कि झुग्गी बस्तियों में जल निकासी व्यवस्था को सुधारना उसकी अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी नहीं है।

डीयूएसआईबी ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट के पैराग्राफ 15 में यह भी कहा कि एनजीटी के आदेशों पालन सुनिश्चित करने के लिए मामले को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखा जा रहा है।

इसके तहत डीयूएसआईबी अधिनियम की धारा 11(2) के अंतर्गत दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) को औपचारिक आदेश जारी करने पर विचार किया जा रहा है। इस प्रस्तावित आदेश के तहत डीजेबी को सीवर लाइन और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) उपलब्ध कराने के लिए कहा जाएगा।

दूसरे कानून में भी डीयूएसआईबी पर है सीवर की जिम्मेदारी

लेकिन आवेदक अभिषेक दत्त ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा है कि स्लम एरियाज (इम्प्रूवमेंट एंड क्लियरेंस) एक्ट, 1956 के तहत डीयूएसआईबी पर नालियां बनाने, कचरा हटाने और सीवर या जल निकासी चैनलों का निरीक्षण करने की जिम्मेदारी भी है।

इसलिए वह केवल “may” शब्द का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। इस कानून की धारा 23 के तहत डीयूएसआईबी को सीवर और जल निकासी चैनलों का निरीक्षण भी करना होता है।

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इसके अलावा, नोट में यह भी कहा गया है कि दिल्ली स्लम एवं झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति में डीयूएसआईबी को नोडल एजेंसी बनाया गया है। यह जिम्मेदारी दिल्ली नगर निगम (एमसीडी), दिल्ली सरकार और उसके विभागों/एजेंसियों की जमीन पर बसी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़ी है।

ऐसे में केंद्र सरकार से जुड़ी एजेंसियां जैसे रेलवे, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ), दिल्ली छावनी बोर्ड और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी), की जमीन पर बसी झुग्गी बस्तियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसी की है।

कौन उठाएगा झुग्गी बस्तियों के सीवेज का बोझ?

दिल्ली सरकार की नीति के अनुसार, संबंधित एजेंसी या तो खुद पुनर्वास और पुनर्स्थापन का काम कर सकती है या यह जिम्मेदारी डीयूएसआईबी को सौंप सकती है।

आवेदक का कहना है कि डीयूएसआईबी अधिनियम, 2010 और स्लम एरियाज एक्ट, 1956 को एक साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट है कि जेजे बस्तियों में जल निकासी और सीवेज ढांचे में सुधार की जिम्मेदारी डीयूएसआईबी की है और यह लगातार बनी रहती है। ऐसे में कानून की शब्दावली की तकनीकी व्याख्या कर जिम्मेदारी से बचने का उसका तर्क गलत है।

अब सवाल यह है कि दिल्ली की जेजे बस्तियों से लगातार बहते सीवेज और खराब जल निकासी की समस्या का जिम्मेदार कौन है, और कब तक एजेंसियां एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालती रहेंगी?

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