भारत में शहरों का गंदा पानी बना ‘सुपरबग’ का अड्डा: एंटीबायोटिक्स के बेअसर होने का बढ़ रहा खतरा

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता के सीवेज में कई ऐसे छिपे जीन मौजूद हैं, जो बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ मजबूत बना रहे हैं
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारतीय शहरों का गंदा पानी अब केवल प्रदूषण की समस्या नहीं रह गया, बल्कि यह एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ बढ़ते प्रतिरोध का एक बड़ा और छिपा हुआ स्रोत बनता जा रहा है।

  • दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के सीवेज पर किए गए एक व्यापक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसमें ऐसे जीन मौजूद हैं जो बैक्टीरिया को दवाओं के खिलाफ अधिक मजबूत बना रहे हैं।

  • यह अध्ययन सीएसआईआर के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया और नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।

  • 2022 से 2024 के बीच 447 नमूनों के विश्लेषण से पता चला कि भले ही हर शहर में बैक्टीरिया की संरचना अलग-अलग हो, लेकिन एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन लगभग पूरे शहरी भारत में समान रूप से फैले हुए हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि 53 से 70 प्रतिशत सूक्ष्मजीव ऐसे हैं, जिन्हें पहले कभी पहचाना ही नहीं गया, जो एक विशाल और अनदेखे माइक्रोबियल संसार की ओर इशारा करता है।

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ये प्रतिरोधी जीन तेजी से फैल सकते हैं, जिससे दवा-प्रतिरोधी संक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा है।

  • साथ ही, शोध में वेस्टवॉटर निगरानी को एक प्रभावी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के रूप में अपनाने की सिफारिश की गई है, ताकि इस बढ़ते सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे को समय रहते रोका जा सके।

भारत के दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में बहने वाला गंदा पानी अब महज प्रदूषण की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह खतरनाक रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) का बड़ा भंडार भी बनता जा रहा है। इस बारे में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि शहरी सीवेज में ऐसे छिपे जीन मौजूद हैं, जो बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ मजबूत बना रहे हैं।

यह अध्ययन सीएसआईआर के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इसके नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।

गौरतलब है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध तब पैदा होता है, जब रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया, कवक, वायरस, और परजीवी, एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। सरल शब्दों में कहें तो लगातार इन दवाओं के संपर्क में रहने के कारण यह रोगजनक अपने शरीर को इन दवाओं के अनुरूप ढाल लेते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

शरीर में आए इन बदलावों के चलते वो धीरे-धीरे इन दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। नतीजतन, यह एंटीबायोटिक दवाएं उन पर बेअसर हो जाती है। दुनिया में यह समस्या कितनी गंभीर है इसी से समझा जा सकता है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध हर साल करीब 13 लाख जिंदगियां निगल रहा है। वहीं दुनिया में होने वाली 50 लाख मौतों के लिए यह समस्या किसी न किसी रूप में जुड़ी है।

शहरों का सीवेज बना ‘सुपरबग’ का छिपा हॉटस्पॉट

बता दें कि यह पहला मौका है जब वैज्ञानिकों ने भारत के शहरी गंदे पानी में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) का विस्तृत और व्यापक नक्शा तैयार किया है। अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2022 से 2024 के बीच देश के चार बड़े शहरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई) के 19 स्थानों से लिए सीवेज के 447 नमूनों का विश्लेषण किया है।

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने शॉटगन मेटाजीनोमिक्स तकनीक का उपयोग किया, जो बैक्टीरिया के जीन को गहराई से समझने में मदद करती है। इन जीनों के विश्लेषण से यह पता लगाया जा सकता है कि बैक्टीरिया किस तरह दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी बन रहे हैं।

अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि हर शहर में बैक्टीरिया की संरचना अलग-अलग है, जो वहां के स्थानीय पर्यावरण और मानव गतिविधियों को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, चेन्नई और मुंबई में जीवाणु क्लेबसिएला न्यूमोनिया की अधिक मात्रा पाई गई, जबकि कोलकाता में स्यूडोमोनास एरुगिनोसा अधिक मात्रा में पाए गए।

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लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध वाले जीन करीब-करीब हर जगह समान रूप से फैले हुए हैं, यानी यह खतरा पूरे शहरी भारत में तेजी से फैल रहा है।

माइक्रोब्स की अनदेखी दुनिया: आधी प्रजातियां अब भी अज्ञात

सबसे गंभीर खुलासा यह हुआ कि 53 से 70 फीसदी तक माइक्रोब्स (सूक्ष्मजीव) ऐसे हैं, जिन्हें पहले कभी पहचाना ही नहीं गया। इसका मतलब है कि हमारे आसपास एक विशाल और अनजाना बैक्टीरिया संसार मौजूद है, जो भविष्य में और भी बड़े खतरे पैदा कर सकता है।

अध्ययन से पता चला है कि कुछ खास जीनों की वजह से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी बन जाते हैं। ये जीन बैक्टीरिया को अपनी कोशिका दीवार (सेल वॉल) इतनी मजबूत बनाने में मदद करते हैं कि दवा अंदर प्रवेश ही नहीं कर पाती। कई बार ये जीन बैक्टीरिया को दवा के अणुओं को तोड़ने, उन्हें बाहर निकालने या निष्क्रिय करने की क्षमता भी देते हैं।

खास बात यह है कि बैक्टीरिया इन जीनों को सिर्फ अपनी अगली पीढ़ी को ही नहीं, बल्कि आसपास मौजूद दूसरे बैक्टीरिया को भी बांट सकते हैं, जिससे प्रतिरोध तेजी से फैलता है।

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अध्ययन में यह भी पाया गया कि आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं, जैसे टेट्रासाइक्लिन और बीटा-लैक्टम, के खिलाफ प्रतिरोधी जीन बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। इनमें से कई जीन ऐसे “मोबाइल जेनेटिक एलिमेंट्स” से जुड़े पाए गए, जो डीएनए के ऐसे हिस्से होते हैं जो एक जीव से दूसरे जीव में आसानी से फैल सकते हैं।

इसका मतलब है कि बीमारी पैदा करने वाले ये जीव और ज्यादा ताकतवर बन सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे ये प्रतिरोधी जीन बैक्टीरिया की अलग-अलग प्रजातियों में तेजी से फैल सकते हैं, जो चिंता का विषय है।

एंटीबायोटिक दवाएं अलग-अलग रासायनिक वर्गों में आती हैं, जैसे टेट्रासाइक्लिन, बीटा-लैक्टम और मैक्रोलाइड्स। यह भी पाया गया कि बैक्टीरिया टेट्रासाइक्लिन और बीटा-लैक्टम के खिलाफ प्रतिरोधी जीन को आपस में ज्यादा आसानी से साझा कर लेते हैं, जबकि मैक्रोलाइड्स के मामले में यह प्रक्रिया कम होती है।

नेटवर्क विश्लेषण से यह भी पता चला कि कुछ खास सूक्ष्मजीव समुदाय प्रतिरोधी जीनों के भंडार में अधिक योगदान देते हैं। साथ ही, हर शहर की अपनी अलग पारिस्थितिक संरचना यह तय करती है कि ये जीन कैसे और कितनी तेजी से बैक्टीरिया के बीच फैलते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, सीवेज वह जगह बन गया है जहां इंसानी गतिविधियां, दवाओं का इस्तेमाल और सूक्ष्मजीव एक साथ मिलते हैं और यही मिलन एंटीबायोटिक प्रतिरोध को बढ़ावा देता है।

वेस्टवॉटर निगरानी: भविष्य की अर्ली वार्निंग सिस्टम

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शहरों के गंदे पानी की नियमित निगरानी की जाए, तो खतरनाक बैक्टीरिया और उनके जीन का जल्द से जल्द पता लगाया जा सकता है। इससे समय रहते नीतियां बनाकर इस बढ़ते खतरे को रोका जा सकता है।

खतरों की पहचान के साथ-साथ शोधकर्ताओं ने देश में वेस्टवॉटर-आधारित रोग निगरानी प्रणाली को बड़े पैमाने पर अपनाने की सिफारिश की है।

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यह तरीका, देश के अलग-अलग हिस्सों में बुनियादी ढांचे की चुनौतियों के बावजूद, स्वास्थ्य की निगरानी के लिए एक प्रभावी और व्यावहारिक समाधान बन सकता है।

सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के निदेशक डॉक्टर विनय के नंदिकोरी का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है “शोधकर्ताओं ने एक मानक संचालन प्रक्रिया विकसित और प्रमाणित की है, जिसके तहत सीवेज के नमूनों को 4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सात दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, और उनकी गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता।

इसके बाद इन नमूनों को सामान्य परीक्षण केंद्रों तक भेजा जा सकता है, जिससे संसाधन-संकट वाले क्षेत्रों में भी निगरानी संभव हो जाती है।“

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उनका कहना है कि "अगर वेस्टवॉटर निगरानी को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो इससे न सिर्फ संक्रमण के प्रकोप का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकेगा, बल्कि दवा-प्रतिरोधी रोगाणुओं के फैलाव पर भी रियल टाइम में नजर रखी जा सकेगी।"

यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि भारत के शहरों में गंदा पानी अब सिर्फ प्रदूषण की समस्या नहीं, बल्कि एक “छिपा हुआ जैविक नेटवर्क” बन चुका है, जहां एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध लगातार मजबूत हो रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अभी ठोस निगरानी और नीति-स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो आने वाले समय में साधारण संक्रमण भी इलाज से बाहर हो सकते हैं और एंटीबायोटिक्स की प्रभावशीलता गंभीर रूप से खतरे में पड़ सकती है।

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