दिल्ली: नालों का गंदा पानी रोकने की कवायद धीमी, कई जगह जमीन और मंजूरी का अड़ंगा

दिल्ली जल बोर्ड ने एनजीटी को बताया है कि 22 नालों में से पांच का काम पूरा हो चुका है, जबकि बाकी पर कार्रवाई जारी है। वहीं, झुग्गी बस्तियों से निकलने वाले सीवेज को रोकने में डीयूएसआईबी से जरूरी जगह और डिस्चार्ज प्वाइंट न मिलने के कारण अड़चन आ रही है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • दिल्ली में यमुना को नालों के सीवेज से बचाने की कोशिश अभी भी जमीन, मंजूरी और एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी में फंसी हुई है।

  • दिल्ली जल बोर्ड ने एनजीटी को बताया है कि चिन्हित 22 नालों में से पांच का सीवेज रोकने और उपचार व्यवस्था से जोड़ने का काम पूरा हो चुका है, लेकिन बाकी नालों पर कई स्तरों की अड़चनें बनी हुई हैं।

  • सबसे बड़ी चुनौती झुग्गी-बस्तियों से निकलने वाले सीवेज की है। आठ नालों के लिए जरूरी सिंगल डिस्चार्ज या ट्रैपिंग प्वाइंट अब तक उपलब्ध नहीं हो सके हैं। वहीं, कुछ जगह डीएसटीपी लगाने के लिए डीडीए, एमसीडी और वन विभाग से जमीन और मंजूरी का इंतजार है।

  • हौज खास और गौतम नगर में सीवेज का बहाव इतना अधिक मिला कि मौजूदा स्थानों पर संयंत्र लगाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। मानसून ने भी निर्माण की रफ्तार धीमी की है।

  • डीजेबी दिसंबर 2026 तक कई लंबित काम पूरे करने का लक्ष्य बता रहा है, लेकिन जब तक जमीन, मंजूरी और विभागीय तालमेल की बाधाएं नहीं हटतीं, नालों का गंदा पानी यमुना तक पहुंचने से रोकने की कोशिश अधूरी रहेगी।

दिल्ली के नालों से बहकर यमुना में पहुंचने वाले सीवेज को रोकने की कोशिशें अब भी कई अड़चनों में उलझी हुई हैं।

दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष दाखिल अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वह सभी चिन्हित नालों से सीवेज की पूरी तरह रोकथाम, डायवर्जन और उपचार के लिए तेजी से काम कर रहा है। हालांकि, कई जगह जरूरी जमीन, अनुमति और तकनीकी रूप से उपयुक्त डिस्चार्ज प्वाइंट उपलब्ध न होने से काम की रफ्तार प्रभावित हो रही है।

29 अगस्त 2026 को एनजीटी में दाखिल रिपोर्ट के मुताबिक, जल बोर्ड ने 22 नालों की पहचान की थी, जहां सीवेज को रोककर सीवर नेटवर्क या उपचार संयंत्र से जोड़ने की योजना है। इनमें पंत नगर और लाजपत नगर से जुड़े पांच नालों का काम पूरा हो चुका है।

कुछ नालों पर काम दिसंबर तक पूरा होने की उम्मीद

वसंत विहार के हिल व्यू एसपीएस से जुड़े केडी-1 नाले पर मॉड्यूलर डिसेंट्रलाइज्ड सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (डीएसटीपी) लगाने का काम जारी है। डीजेबी को उम्मीद है कि यह काम 31 दिसंबर 2026 तक पूरा हो जाएगा।

सफदरजंग डेवलपमेंट एरिया के एक नाले में सूखे मौसम के दौरान बहने वाले पानी की मात्रा का आकलन पूरा कर लिया गया है और लागत का अनुमान तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। यहां भी काम दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

हालांकि, डीएसटीपी के लिए जगह तय करने में एमसीडी, डीडीए और वन विभाग के साथ समन्वय किया जा रहा है, क्योंकि प्रस्तावित स्थान इनके अधिकार क्षेत्र में आता है।

झुग्गी बस्तियों के सीवेज पर सबसे बड़ी अड़चन

रिपोर्ट में सबसे गंभीर अड़चन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजे क्लस्टर) से निकलने वाले सीवेज को लेकर बताई गई है। ऐसे आठ नालों के मामले में डीजेबी ने दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) से बार-बार कहा है कि सीवेज को एक जगह एकत्र कर सीवर नेटवर्क से जोड़ने के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त सिंगल डिस्चार्ज प्वाइंट उपलब्ध कराया जाए।

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डीजेबी का कहना है कि जब तक ऐसे प्वाइंट उपलब्ध नहीं होते, इन नालों को पकड़कर सीवर नेटवर्क से जोड़ने का काम आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

यानी समस्या सिर्फ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की नहीं है। पहले यह तय होना जरूरी है कि बस्तियों से निकलने वाला गंदा पानी एक जगह कैसे पहुंचेगा और वहां से उसे उपचार के लिए कैसे भेजा जाएगा।

डीडीए से जमीन और एनओसी का इंतजार

दिल्ली जल बॉर्ड ने दो स्थानों पर मॉड्यूलर डीएसटीपी लगाने के लिए डीडीए के उद्यान विभाग से एनओसी और साइट की अनुमति मांगी है। इसके लिए करीब 100 वर्ग मीटर जगह की जरूरत है। डीजेबी ने संबंधित पार्कों में नाले के ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल बागवानी के लिए करने की कार्ययोजना भी मांगी है।

इससे साफ करने के बाद पानी का दोबारा उपयोग किया जा सकेगा और ताजे पानी पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

हौज खास और गौतम नगर में सीवेज की मात्रा ज्यादा

हौज खास गांव और गौतम नगर के दो नालों में पानी के बहाव का आकलन पूरा किया जा चुका है। जांच में सामने आया कि प्रस्तावित मौजूदा स्थानों पर सीवेज का बहाव इतना अधिक है कि वहां सीधे मॉड्यूलर डीएसटीपी लगाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है।

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अब डीजेबी बहाव को कम करने और किसी दूसरे तकनीकी विकल्प की तलाश कर रहा है, ताकि इन नालों के सीवेज को भी उपचार व्यवस्था से जोड़ा जा सके।

मानसून ने भी धीमी की रफ्तार

रिपोर्ट के मुताबिक बाकी नालों पर चल रहे कुछ काम मानसून के कारण प्रभावित हुए हैं। बारिश के मौसम में खुदाई और निर्माण से जुड़े दूसरे कामों पर प्रतिबंध या व्यावहारिक दिक्कतों के कारण साइट पर काम करना मुश्किल रहा।

इसके बावजूद डीजेबी का कहना है कि वह जरूरी काम और अनुमतियां हासिल करने की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ा रहा है और संशोधित समयसीमा के भीतर सभी काम पूरे करने की कोशिश की जा रही है।

डीयूएसआईबी से जमीन मिले तो डीएसटीपी लगाने को तैयार जल बॉर्ड

डीजेबी ने कहा है कि जहां जरूरत और तकनीकी रूप से संभव होगा, वहां संबंधित जेजे बस्तियों के भीतर उपयुक्त स्थान पर डीएसटीपी लगाने के लिए वह तैयार है। लेकिन इसके लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त जमीन डीयूएसआईबी को उपलब्ध करानी होगी, साथ ही सभी जरूरी मंजूरियां भी हासिल करनी होंगी। 

रिपोर्ट में डीजेबी ने साफ कहा है कि जेजे बस्तियों से जुड़े जिन नालों में एकल डिस्चार्ज या ट्रैपिंग प्वाइंट जरूरी हैं, वहां डीयूएसआईबी की ओर से ऐसे प्वाइंट उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण काम अटका हुआ है।

जल बोर्ड के अनुसार, एनजीटी के निर्देशों और संयुक्त समिति की सिफारिशों के बावजूद डीयूएसआईबी ने अब तक इन तकनीकी रूप से उपयुक्त प्वाइंट की पहचान और उपलब्धता सुनिश्चित करने में कोई ठोस प्रगति नहीं की है। डीजेबी का दावा है कि उसने इस संबंध में कई बार पत्र और रिमाइंडर भेजे हैं।

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गौरतलब है कि इससे पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष दाखिल नोट में आवेदक अभिषेक दत्त ने आरोप लगाया था कि दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) जेजे क्लस्टरों में सीवेज और ड्रेनेज की अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है। मामला बारापुला कैचमेंट की उन बस्तियों से जुड़ा है, जहां दिल्ली जल बोर्ड ने लगातार सीवेज बहने की समस्या बताई थी।

सीवेज रोकने की लड़ाई में तालमेल सबसे जरूरी

डीजेबी ने एनजीटी को यह भी बताया कि जेजे बस्तियों में नागरिक सुविधाओं और ड्रेनेज से जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास और सुधार की जिम्मेदारी डीयूएसआईबी के वैधानिक दायरे में आती है। इसलिए बचे हुए नालों से सीवेज रोकने का काम दोनों एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय पर निर्भर है।

फिलहाल तस्वीर यही है कि एक तरफ दिल्ली जल बोर्ड सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था खड़ी करने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीन, अनुमति और डिस्चार्ज प्वाइंट की कमी काम को रोक रही है। ऐसे में जब तक ये अड़चनें दूर नहीं होतीं, नालों का गंदा पानी यमुना तक पहुंचने से रोकने की दिल्ली की कोशिश अधूरी ही रहेगी।

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